ताज़ा खबर
 

बड़े सुधार की जरूरत

बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में महामारी सब पर भारी पड़ रही है। सरकार की ओर से प्रयास तेज जरूर किए गए हैं, मगर जिस तरीके से स्वास्थ्य सामग्री और संसाधनों की मांग के अनुपात में आपूर्ति का अभाव है और लगातार बड़ी अदालतों की फटकार पड़ रही है, उसे देखते हुए तो यही लगता है कि स्वास्थ्य के सुशासन के मामले मेंं शासन-प्रशासन हाशिए पर है।

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में COVID-19 Vaccine पाने के लिए अपनी-अपनी बारी का इंतजार करते लाभार्थी। (फोटोः पीटीआई)

सुशील कुमार सिंह

ढांचागत सुधार की अपनी कसौटी होती है। मजबूत ढांचे के बूते ही समस्याओं को समाधान देने के लिए प्रक्रियागत दृष्टिकोण और व्यावहारिक परिप्रेक्ष्य का निर्वहन होता है। देश इन दिनों महामारी से जूझ रहा है। समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है। दृष्टिकोण और परिप्रेक्ष्य दोनों इस ओर इशारा कर रहे हैं कि स्वास्थ्य जनित इस समस्या ने सरकार और व्यवस्था को हाशिए पर ला दिया है। गौरतलब है कि समस्या से निपटने के लिए मजबूत संरचना होनी चाहिए। विगत वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि समस्याओं के साथ देश ढांचागत सुधार के उस स्तर को हासिल नहीं कर पाया, जैसा समय के साथ होना चाहिए।

हालांकि मौजूदा दौर सवाल उठाने का नहीं है, लेकिन इस बात की खोज का जरूर है कि आखिर जब हम बड़ा देश चलाते हैं, बड़े शासन और सुशासन की हुंकार भरते हैं, तो फिर बीमारी के आगे घुटने क्यों टेकने पड़ जाते हैं? आजादी के साढ़े सात दशक बाद भी चिकित्सा के क्षेत्र में पर्याप्त सुविधाओं का घोर अभाव है। भारत तीसरी दुनिया का देश है और अनेक बीमारियां यहां अभी भी व्याप्त हैं, मसलन तपेदिक, मलेरिया, कालाजार, डेंगू, चिकनगुनिया, जल जनित बीमारियां जैसे हैजा, डायरिया आदि।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्टों से लेकर तमाम सर्वेक्षणों से पता चलता है कि सार्वजनिक चिकित्सा व्यवस्था के क्षेत्र में सुशासन के संदर्भ लचीले ही रहे हैं। हालांकि सरकार ने साल 2021-22 के स्वास्थ्य बजट में एक सौ सैंतीस फीसद की वृद्धि करते हुए यह जताने का प्रयास किया है कि स्वास्थ्य को लेकर उसकी चिंता बढ़ी है। मगर कोरोना काल में इतना व्यापक धन भी ऊंट के मुंह में जीरे जैसा ही है। गौरतलब है कि स्वास्थ्य बजट के मामले में दुनिया की बड़ी और मझोली अर्थव्यवस्था वाले देश भारत से कहीं आगे हैं। भारत में स्वास्थ्य और शिक्षा का जितना बजट होता है, दक्षिण अफ्रीका जैसे देश कमोवेश उतना बजट स्वास्थ्य पर ही खर्च कर देते हैं। ऐसे ही कई उदाहरण मिल जाएंगे जो स्वास्थ्य बजट के मामले में भारत से कोसों आगे हैं। वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा सूचकांक (2019) के अनुसार एक सौ पनचानवे देशों में भारत सत्तावनवें स्थान पर है।

सूचकांक से यह भी पता चलता है कि अधिकतर देश किसी भी बड़े संक्रामक रोग या महामारी से निपटने के लिए तैयार नहीं हैं। इस सूची में केवल तेरह देश ऐसे हैं जो शीर्ष पर रहे और इनमें अमेरिका पहले स्थान पर है। हालांकि अमेरिका में कोरोना से मरने वालों की तादाद दुनिया में सबसे ज्यादा है जो यह दशार्ती है कि बड़े ढांचागत वाले देश भी कोरोना के आगे पस्त हो गए। इसके अलावा कई यूरोपीय देश भी महामारी संकट में ऐसे फंसे कि उनकी स्वास्थ्य सेवाओं के मजबूत ढांचे भी ढह गए।

यह ध्यान देने वाली बात कि वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा सूचकांक वैश्विक स्तर पर महामारी के खतरों का पहला व्यापक मूल्यांकन होता है। लैंसेट द्वारा साल 2018 में किए गए एक अध्ययन के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता और लोगों तक उनकी पहुंच के मामले में भारत विश्व के एक सौ पनचानवे देशों में एक सौ पैंतालीसवें पायदान पर है। चौंकाने वाला पक्ष यह भी है कि इस सूची में भारत अपने पड़ोसियों चीन, बांग्लादेश, श्रीलंका और भूटान से भी पीछे रहा। तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य यह भी है कि साल 2016 में स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच और गुणवत्ता के मामले में भारत को 41.2 अंक मिले थे, जबकि साल 1990 में केवल 24.7 अंक थे। जाहिर है, समय के साथ उत्थान तो हुआ, मगर जितना होना चाहिए था उतना नहीं।

महामारी के इस दौर में जिस तरह अस्पतालों के भीतर और बाहर स्वास्थ्य सामग्री और संसाधनों की भारी कमी देखने को मिली है, उससे लगता है कि ढांचागत कमियां बाकायदा विद्यमान हैं और कमजोरी दोनों जगह व्याप्त है। संक्रमित अस्पताल के अंदर हो या बाहर, इलाज में कोताही का स्तर समान ही है। आॅक्सीजन सिलेंडर, जीवन रक्षक प्रणाली और जरूरी दवाइयों सहित बिस्तरों तक को लेकर जो मारामारी देखने को मिल रही हैं, उससे साफ है कि स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा बेदह बदतर हालत में है।

चिकित्सा व्यवस्था भारी दबावों और संकटों से गुजर रही है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में ग्यारह हजार से अधिक व्यक्तियों पर एक डॉक्टर है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार एक हजार व्यक्तियों पर एक चिकित्सक होना चाहिए। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि चिकित्सकों की उपलब्धता के मामले में हम कहां खड़े हैं। बिहार में तो स्थिति और खराब है वहां अट्ठाईस हजार से ज्यादा लोगों पर एक चिकित्सक है।

उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी हालात कमोबेश यही हैं। मेडिकल काउंसिल आॅफ इंडिया के अनुसार भारत में वर्ष 2017 में करीब दस लाख इकतालीस हजार डॉक्टर पंजीकृत थे, जिसमें सवा लाख डॉक्टर ही सरकारी अस्पतालों में काम करते हैं, जबकि बाकी चिकित्सक निजी अस्पतालों में सेवाएं देते हैं। इससे इतना तो साफ है कि देश में डॉक्टरों की भारी कमी है। दूसरी मुश्किल यह है कि अधिकतर डॉक्टर का निजी अस्पतालों में काम कर रहे हैं। जाहिर है, ऐसे में चिकित्सा महंगी ही होगी। भारतीय चिकित्सा क्षेत्र में यह बड़ा असंतुलन है।

भारत की आबादी एक सौ चालीस करोड़ के लगभग हो गई है। देश में बीस हजार के आसपास सरकारी अस्पताल हैं, जिनकी बिस्तर क्षमता करीब आठ लाख होगी। मौजूदा स्थिति को देखते हुए कई सरकारी और निजी चिकित्सालयों के साथ कई अन्य प्रारूपों में चिकित्सीय व्यवस्था को अब मजबूती देने के प्रयास शुरू होने लगे हैं। जाहिर है, पिछले आंकड़ों की तुलना में अब स्वास्थ्य क्षेत्र में ढांचागत सुधार थोड़ा सुधरा हुआ जरूर दिखेगा। गौरतलब है कि भारत की पैंसठ फीसद से ज्यादा आबादी गांवों में रहती है।

इस आबादी के इलाज के लिए स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र व अनेक स्वास्थ्य उपकेंद्र हैं। मगर ये भी कम हैं और जो हैं, वहां बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव है। यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत में स्वास्थ्य सेवा अभिजात्य वर्ग के लिए ही रह गई है। सरकारी चिकित्सालय गरीबों की उम्मीद होते हैं, मगर सुविधा के अभाव में आस टूटती रहती है और निजी उसके बूते में नहीं है। हालांकि कोरोना महामारी ने गरीब और अमीर किसी को नहीं बख्शा है।

बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में महामारी सब पर भारी पड़ रही है। सरकार की ओर से प्रयास तेज जरूर किए गए हैं, मगर जिस तरीके से स्वास्थ्य सामग्री और संसाधनों की मांग के अनुपात में आपूर्ति का अभाव है और लगातार बड़ी अदालतों की फटकार पड़ रही है, उसे देखते हुए तो यही लगता है कि स्वास्थ्य के सुशासन के मामले में शासन-प्रशासन हाशिये पर है। भारत की मौजूदा दशा को देखते हुए दुनिया के तमाम देशों ने सहायता के लिए हाथ बढ़ाए हैं। जाहिर है, इससे राहत तो मिलेगी।

वैसे इसे वैश्विक बीमारी या आपदा का नाम देकर साफगोई से व्यवस्था या सरकार को बचाया जा सकता है। मगर सुशासन को अपनी दिनचर्या समझने वाली सरकार की जिम्मेदारी यहां कम नहीं हो सकती। सुशासन एक लोक प्रवर्धित अवधारणा है, जिसका एकमात्र उद्देश्य जन विकास है और यह जन विकास भूख से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य के मार्ग से गुजरते हुए उस फलक तक जाता है, जहां से एक सभ्य समाज और विकसित देश का निर्माण होता है। देश इन दिनों जीवन बचाने की होड़ में है। जनता इसमें बुरी तरह फंसी है और सरकार इस महामारी से बाहर निकलने की तमाम कोशिशें कर रही है। ऐसे में पूरी जिम्मेदारी केवल सरकार पर डाल कर पल्ला झाड़ लेना सही नहीं होगा। समस्या बढ़ी है तो सभी को मिल कर इसका हल निकालना होगा।

Next Stories
1 आग की लपटों से निकलते सवाल
2 असंगठित क्षेत्र का संकट
3 ऑनलाइन शिक्षण की चुनौतियां
ये पढ़ा क्या?
X