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राजनीतिः आभासी दुनिया की विकृतियां

पिछले कुछ वर्षों में दुनियाभर में करोड़ों लोग सोशल मीडिया की लत के शिकार हो गए हैं। हालात ऐसे हो चले हैं कि किसी भी तरह की ऑफलाइन गतिविधियों में लोगों की रुचि ही नहीं दिखती। न तो घरेलू और आपसी संबंधों में संवाद बचा है, न कार्यस्थल पर सार्थक वार्तालाप। इसकी वजह भी साफ है कि फेसबुक, वाट्सएप, ट्विटर, स्नैपचेट, इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म से लगातार जुड़े रहने पर इंसानी दिमाग कुछ खास दिशाओं में सोच ही नहीं पाता।

कुछ ही समय पहले मुंबई में एक एनजीओ ने दो सौ से ज्यादा लोगों पर एक सर्वे किया था। इसमें यह सामने आया कि सोशल मीडिया पर दिखने वाला जुड़ाव असली नहीं, बल्कि केवल दिखावा मात्र है।

कभी भीड़ को कातिल बनातीं अफवाहें, तो कभी फर्जी तस्वीरों से किसी भी चेहरे की छवि बिगाड़ डालना। कभी किसी जीते-जागते सितारे की मौत की खबर फैला देना, तो कभी स्पष्टता से विचार साझा करने पर महिलाओं को ट्रोल किया जाना। सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर अब ऐसा आक्रामक, अराजक और लापरवाहीपूर्ण रवैया अपनाया जा रहा है जो असल दुनिया के सौहार्द को छीनने और उसे रक्तरंजित करने की बड़ी वजह बन रहा है। सोशल मीडिया की लत ने इन मंचों के सार्थक इस्तेमाल की उम्मीदों को बुरी तरह ध्वस्त कर दिया है। मन और जीवन पर गहरा असर डाल रहा आभासी संसार अब बदलाव नहीं, बीमारियां ला रहा है। यह अर्थपूर्ण अभिव्यक्ति के बजाय सामाजिक मानसिक विकृतियों को माध्यम बना रहा है। आए दिन हो रही ऐसी घटनाएं इस बात की तसदीक करती हैं कि सोशल मीडिया इंसान के बदलते व्यवहार और खो रही समझ का बड़ा कारण बनता जा रहा है।

इस संदर्भ में हाल में शोध पत्रिका ‘न्यूरो रेग्यूलेशन’ में छपा एक अध्ययन चेताने वाला है। शोध के मुताबिक सोशल मीडिया से बहुत ज्यादा जुड़ाव रखना इंसान के व्यवहार में बदलाव की वजह बना रहा है। डिजिटल माध्यमों की लत हमारी जैविक प्रतिक्रियाओं पर गहरा असर डाल रही है। समाज और परिवेश से अलग-थलग कर देने वाली यह लत कई मानसिक और दैहिक बीमारियों की वजह बन रही है। कुछ समय पहले कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने भी कहा था कि सोशल मीडिया से किशोरों का जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। इस शोध के परिणामों में यह सामने आया कि सोशल मीडिया का प्रभाव वास्तविक जीवन में इस कदर बढ़ रहा है कि ऑफलाइन होने पर घरों में झगड़े होते हैं। स्कूलों में समस्याएं सामने आती हैं। पूर्वी यूरोपीय देश हंगरी में ‘सोशल मीडिया एडिक्शन स्केल’ नाम का पैमाना भी ईजाद किया गया है, जिसके माध्यम से यह पता लगाया जाता है कि उपयोगकर्ता को सोशल मीडिया की कितनी लत है। इस पैमाने के मुताबिक हंगरी के साढ़े चार फीसद लोगों को सोशल मीडिया की लत पड़ गई है जिसके चलते ऐसे लोगों में खुद पर भरोसे की कमी साफ नजर आती है। ये अवसाद के शिकार हो चुके हैं। नतीजतन, ऐसे लोगों को बाकायदा सलाह दी गई कि वे स्कूल-कॉलेज में सोशल मीडिया डिएडिक्शन क्लास में जाएं और खुद का इलाज करवाएं। सामान्य जीवन जीने की ओर लौटें।

वैश्विक स्तर पर हुए ज्यादातर अध्ययनों में इस बात का खुलासा हुआ है कि विचार और व्यवहार पर गहरा असर डाल रहे आभासी संसार में बढ़ती मौजूदगी असामान्य व्यवहार और जीवनशैली संबंधी बदलावों के लिए जिम्मेदार है। उम्र और वर्ग के अनुसार ये प्रभाव अलग-अलग हैं। युवाओं में इस आभासी संसार में मौजूदगी के कारण शिक्षा और व्यक्तिगत संबंधों पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है, तो पारिवारिक जीवन में रिश्तों में दरार आ रही है। बच्चे आत्मकेंद्रित और आक्रामक बन कम उम्र में ही दिशाहीन हो रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में दुनियाभर में करोड़ों लोग सोशल मीडिया की लत के शिकार हो गए हैं। हालात ऐसे हो चले हैं कि किसी भी तरह की ऑफलाइन गतिविधियों में लोगों की रुचि ही नहीं दिखती। न तो घरेलू और आपसी संबंधों में संवाद बचा है, न कार्यस्थल पर सार्थक वार्तालाप। इसकी वजह भी साफ है कि फेसबुक, वाट्सएप, ट्विटर, स्नैपचेट, इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म से लगातार जुड़े रहने पर इंसानी दिमाग कुछ खास दिशाओं में सोच ही नहीं पाता।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने ‘इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ डिजीजेज’ के मसौदे के ग्यारहवें संशोधन में ‘गेमिंग डिसआर्डर’ को भी शामिल किया है। सोशल मीडिया की लत को सिगरेट या शराब के नशे की तरह माना जा रहा है। लाइक-कमेंट न मिलने या कम मिलने और स्मार्ट गैजेट की बैटरी खत्म होने की स्थितियां मन में बेचैनी पैदा करने लगी हैं। ऐसे लती लोगों के व्यवहार में भय और आत्ममुग्धता का अजीबोगरीब मेल दिखता है जो कहीं न कहीं औरों से पीछे छूट जाने की चिंता लिए है। यह चिंता आधारहीन और यह बेचैनी गैर-जरूरी है। यह भावनात्मक फिक्र और डर उन बातों के लिए है जिनके असल में कोई मायने ही नहीं हैं।

कुछ ही समय पहले मुंबई में एक एनजीओ ने दो सौ से ज्यादा लोगों पर एक सर्वे किया था। इसमें यह सामने आया कि सोशल मीडिया पर दिखने वाला जुड़ाव असली नहीं, बल्कि केवल दिखावा मात्र है। इसमें न तो अपनापन है और न ही किसी से कोई भावनात्मक लगाव। इतना ही नहीं, ट्रोलिंग, गाली-गलौज, बदसलूकी वाला बर्ताव भी इन मंचों से जुड़े लोगों के लिए तनाव और अवसाद का कारण बन रहा है। बावजूद इसके लोग इन माध्यमों के लती बन रहे हैं। दरअसल, सोशल मीडिया का विवेकपूर्ण इस्तेमाल न हो तो यह माध्यम न केवल समय और ऊर्जा खपाने वाला, बल्कि सोच-समझ की दिशा खो देने वाला मंच भी है। भारत में फेसबुक इस्तेमाल करने वाले चौबीस करोड़ से ज्यादा लोग हैं। बीस करोड़ से ज्यादा लोग वाट्सऐप का इस्तेमाल करते हैं। देश में स्मार्टफोन और इंटरनेट के विस्तार से सोशल मीडिया की पहुंच गांव-कस्बों तक हो गई है। आंकड़े बताते हैं कि सोशल मीडिया पर फोन से मौजूदगी रखने वालों की तादाद छप्पन फीसद की दर से बढ़ रही है। अब सोशल मीडिया के इन मंचों के जरिये भ्रमित करने वाली खबरें साझा करने से लेकर धार्मिक-राजनीतिक उन्माद तक फैलाया जा रहा है। इसमें फर्जी तस्वीरें साझा करना बड़ी समस्या बना गया है। यहां जिम्मेदार अभिव्यक्ति के बजाय असामाजिक और अविश्वसनीय सामग्री को साझा किए जाने का चलन चल पड़ा है। नतीजतन, आभासी दुनिया के इस गैर जिम्मेदार व्यवहार का असर अब आम जीवन पर भी दिखने लगा है।

यह विचारणीय प्रश्न है कि सब कुछ जानते-समझते हुए भी लोग इसके चक्रव्यूह से निकल क्यों नहीं पा रहे हैं। अध्ययन बताते हैं कि सोशल मीडिया की लत के शिकार लोग चिड़चिड़े, गुस्सैल और आलसी हो जाते हैं। उनकी निजी और सामाजिक जिंदगी बुरी तरह से प्रभावित होती है। इस आभासी दुनिया को लोगों ने अपनी व्यक्तिगत परेशानियां साझा करने का माध्यम भी बना लिया है। जबकि असली रिश्तों की जगह आभासी दुनिया के अनजाने चेहरे नहीं ले सकते। मानवीय व्यवहार में कई तरह के विरोधाभासी बदलाव लाने वाले सोशल मीडिया की लत इस कदर हावी हो गई है कि दुनियाभर में लोग मनोवैज्ञानिकों और चिकित्सकों की सलाह लेने लगे हैं। विशेषज्ञ भी इस मानसिक व्याधि से जूझ रहे लोगों को अपनों-परायों से घुलने-मिलने और वास्तविक जीवन से जुड़ने की सलाह दे रहे हैं। स्क्रीन में झांकने के बजाय अपने परिवेश को जीने की राह सुझा रहे हैं।

अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में तो बाकायदा डिजिटल डिटॉक्स की सुविधाएं देने वाले स्टार्टअप शुरू हो चुके हैं। मोटी फीस वसूल कर लोगों को सोशल मीडिया की लत से छुटकारा दिलाया जा रहा है। उन शारीरिक-मानसिक व्याधियों का इलाज किया जा रहा है, जो इन माध्यमों के हद से ज्यादा इस्तेमाल की बदौलत उपजी हैं। हमारे यहां हालात ऐसे हो रहे हैं कि एम्स के राष्ट्रीय व्यसन उपचार केंद्र ने ऐसे लोगों की काउंसलिंग करने की शुरुआत की है जो सोशल मीडिया और इंटरनेट की लत के शिकार हैं। कैसी विडंबना है कि आभासी सामाजिकता के इस दौर में वास्तविक जीवन का सुखद मेल-मिलाप, औरों के साथ ही नहीं खुद अपने आप के साथ भी नहीं बचा है। हम व्यस्त हैं या अस्त-व्यस्त खुद नहीं समझ पा रहे हैं।

सामाजिक रूप से सक्रिय रहना इंसान को तनाव, अवसाद और नकारात्मकता से दूर रखता है। मौजूदा समय में हर उम्र के लोगों का काफी समय ऑनलाइन बीत रहा है। नतीजतन, न तो हम कुछ नया सीख रहे हैं और न ही अपने परंपरागत परिवेश और संबंधों को संभाल पा रहे हैं। ऐसे में आभासी दुनिया में अपनी मौजूदगी के मायनों के संदर्भ में जरूरत और लत का अंतर समझना आवश्यक है, ताकि सोशल मीडिया बीमारियों का नहीं बल्कि बदलाव का माध्यम बने।

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