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राजनीतिः बचाना होगा छोटे उद्योगों को

भारत की अर्थव्यस्था को नोटबंदी और जीएसटी सुधारों के कारण भारी झटके झेलने पड़े हैं। इनका प्रभाव लंबे समय तक बना रहेगा। अब देश कोरोना महामारी से जूझ रहा है। ऐसे में वित्त वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही के लिए घोषित जीडीपी की दर हतोत्साहित करने वाली है।

भारत की अर्थव्यस्था को नोटबंदी और जीएसटी सुधारों के कारण भारी झटके झेलने पड़े हैं।

राजकुमार भारद्वाज

रूस में लगभग छत्तीस हजार और अमेरिका में करीब बीस हजार गांव-शहर हैं। भारत में नगरों की बात छोड़ दें, तो अकेले गांवों की संख्या ही छह लाख से ज्यादा है। इसीलिए कहते हैं कि भारत गांवों में बसता है। भारत गांवों और खेती-किसानी का देश है और यही बात भारत को शेष विश्व से अलग करती है। कुछ सिद्धांत सनातन होने के कारण अपरिवर्तनीय होते हैं और कुछ काल, स्थान, खंड, परिवेश, परिस्थिति और पारिस्थितिकी के अनुसार परिवर्तनशील होते हैं। इसलिए जो सिद्धांत पूरे संसार में लागू होते हैं, वे ग्राम्य संख्या और जनसंख्या घनत्व के आधार पर भारत पर भी लागू हों, यह कहना उचित नहीं होगा। जब हम भारत के आर्थिक और सामाजिक विकास की चर्चा करते हैं, तो गुलाम मानसिकता के कारण तुरंत पश्चिम के विकास मॉडल की ओर ताकने लगते हैं, जिसे भारत में नेहरूवियन मॉडल कहा जाता है। यह कतई आवश्यक नहीं है कि विकास का जो सिद्धांत यूरोप और अमेरिका में सफल कहा जाता है, वह भारत पर भी लागू हो सकता है। हालांकि पश्चिम में अब तक भी यह चर्चा जारी है कि विकास का जो मॉडल वहां अपनाया है, वह मॉडल क्या सचमुच प्रकृति के सभी अर्थों में सफल भी है या नहीं। यूरोप और अमेरिका के विकास में सर्वजन की भागीदारी पर प्रश्नचिन्ह होने के कारण अंतर्द्वंद्व और अंतर्कलह निरंतर हैं। फिर भी उस मॉडल को यदि सफल मान लिया जाए, तो भी यह विचारणीय है कि भारत के संदर्भ में उसकी उपादेयता है या नहीं।

भारत के विकास के साथ यहां के 6.38 लाख गांवों के लगभग अस्सी करोड़ लोगों के जीवन-यापन का प्रश्न जुड़ा है। यूरोप में यांत्रिकीकरण का सिद्धांत उचित जान पड़ता है। वहां प्रति व्यक्ति संसाधन अधिक हैं और काम करने वाले हाथ कम हैं। इसलिए मशीनों की सहायता से अधिकाधिक उत्पादन कर श्रम लागत कम रखना उनका उद्देश्य हो सकता है। किंतु पहले तो बड़े कारखानों को बढ़ावा देना और फिर श्रम लागत कम करने के लिए मशीनीकरण को श्रेयस्कर मानना भारतीयों के लिए बड़ी भूल सिद्ध हुई है। इससे बेरोजगारी बढ़ी है। पश्चिमी सोच वाली नीतियों का ही परिणाम है कि आज भारत में खेती-किसानी घाटे का स्थापित सत्य हो गई है। खेतिहार मजदूर, किसान अब कृषि छोड़ बड़े शहरों में मजदूरी करने जाते हैं। कारण कि पश्चिम के विकास मॉडल के चलते हमारी कृषि आत्महत्या की खेती हो गई है। पश्चिम के इसी मॉडल के चलते बेतरतीब शहरीकरण की समस्या भी बढ़ी है।

दुनिया की दूसरी सर्वाधिक बड़ी जनसंख्या वाले भारत में विशालकाय अर्थव्यवस्था पर बहुत ध्यान दिया जाता है। उसके महत्त्व को भी कम करके नहीं आंका जा सकता। किंतु सबसे पहले सूक्ष्म अर्थव्यवस्था सुधारने की आवश्यकता है, जिसका सीधा संबंध बाजार खंड और उससे जुड़े आमजन से होता है। सूक्ष्म अर्थव्यवस्था का सपाट अर्थ है कि विभिन्न बाजार खंडों के उद्योग-धंधों के माध्यम से व्यक्तियों को जोड़ कर रोजगार और स्वरोजगार का सृजन करना। जब देश की सूक्ष्म अर्थ व्यवस्था सुदृढ़ हो जाएगी, तो विशाल अर्थव्यवस्था के मौद्रिक नीति, जीडीपी, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, गरीबी आदि बिंदुओं का समेकित आकलन और व्यवस्था अपने आप ही सहज और सरल हो जाएगी। भारतीय समृद्धि का आधार हमारे कुटीर और ग्रामोद्योग ही हो सकते हैं। महात्मा गांधी कहते थे, ‘अगर गांव नष्ट हो जाएं, तो हिंदुस्तान भी नष्ट हो जाएगा। आज शहर गांवों की सारी संपत्ति खरीद लेते हैं। इससे गांवों का नाश हो रहा है। ग्रामीण कर्ज के बोझ से दबे हैं। मैं जिस देहात की कल्पना करता हूं, वह देहात जड़ नहीं होगा। वह शुद्ध चैतन्य होगा।’

अंग्रेजों से पहले तक कुटीर उद्योगों के बूते भारत सोने की चिड़िया कहलाता था और भारत की साख आज के वाशिंगटन, मास्को, लंदन और पेरिस से कहीं ज्यादा थी। तब विदेशी भारत के विकास की गौरवगाथाएं सुन कर खिंचे चले आते थे। कुटीर उद्योगों पर सबसे बड़ा प्रहार अंग्रेजों के समय में ही हुआ। ईस्ट इंडिया कंपनी ने कपड़ा, चाय यहां तक कि नमक जैसी चीजों पर अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया था। उस समय भारतीयों को नमक बनाने का भी अधिकार नहीं था और इंग्लैंड से आने वाले नमक के लिए भारतीयों को कई गुना अधिक कीमत चुकानी पड़ती थी। तब 1930 में गांधी जी को नमक आंदोलन भी करना पड़ा था। अंग्रेज अपने हित के लिए बड़े कारखानों की संकल्पना लेकर आए, जिसमें कपड़ों की बड़ी मिलें लगाई गईं और जूतों के बड़े कारखाने लगाए गए। इससे हमारे शताब्दियों से चले आ रहे कपड़े और जूते जैसे व्यवसाय ठप हो गए।

अब जो हाल है, उसमें परिवार बढ़ने से जमीनों का बंटवारा हो गया और एक एकड़ से भी कम जमीन के किसानों की संख्या बढ़ गई है। उस जमीन से परिवार का पोषण असंभव हो गया है। परचून की दुकानों की जगह विशालकाय मॉल आ गए हैं। चमड़ा शोधन इकाइयां और उत्पाद गांव से निकल कर टेनरियों और जूता कंपनियों के अधीन हो गए हैं। कपड़ा उद्योग में कपास की कताई, बुनाई और सिलाई जैसे काम बड़ी मशीनों से होने लगे हैं। एक ओर किसान गुस्से में आलू-प्याज सड़कों पर फेंकते नजर आते हैं, तो कई स्थानों पर ये महंगे दामों पर बिक रहे होते हैं। वितरण प्रणाली हाशिए पर आ गई है। कुटीर उद्योग लगभग ठप हो गए हैं। कृषि यंत्र कभी गांव का लुहार गढ़ता था। अब खुर्पियां और फावड़े मशीनों से बनने लगे हैं, यहां तक कि चीन से आयात करते हैं। हम खरबों रुपए की विदेशी मुद्रा चीन में निर्मित मोबाइल फोनों पर गवां रहे हैं। प्रतिकार में चीन हमारा खाकर गलवान और पैंगोंग में हम पर ही गुरार्ने का दुस्साहस कर रहा है। हम आईसीबीएम और ड्यू की ओर तो बढ़ रहे हैं। किंतु हम मोबाइल फोन बनाने का नवाचार नहीं दिखा पाए। लीथियम बैटरी के अभाव में हमारा सौर ऊर्जा का कार्यक्रम पंगु बना हुआ है। ऐसे उदाहरण और भी हो सकते हैं।

सारांश यह है कि नवाचार के साथ सूक्ष्म अर्थव्यवस्था का अंतर पाटने की आवश्यकता है। देश में विशाल अर्थव्यवस्था, वैश्विक प्रतिस्पर्धा, विश्व व्यापार परिदृश्य, भूमंडलीकरण, विश्व समझौतों के दृष्टिकोण से बड़े उद्योगों की उपयोगिता, विवशता को अब नकारा तो नहीं जा सकता है। लेकिन बड़े उद्योगों की आपूर्ति शृंखला में लघु और कुटीर उद्योगों को दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ समाहित अवश्य किया जा सकता है। किंतु यह सावधानी रखनी होगी कि बड़े उद्योगों का विकास लघु और कुटीर उद्योगों की कीमत पर न हो, ताकि रोजगार के अवसर अधिकाधिक सृजित हो सकें। कृषि क्षेत्र में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। छोटी जोत के किसानों के लिए डेयरी पालन, फसल विविधीकरण, खाद्य प्रसंस्कण के प्रयोग लाभकारी सिद्ध हो रहे हैं। अब उन्हें व्यापक फलक की आवश्यकता है।

भारत की अर्थव्यस्था को नोटबंदी और जीएसटी सुधारों के कारण भारी झटके झेलने पड़े हैं। इनका प्रभाव लंबे समय तक बना रहेगा। अब देश कोरोना महामारी से जूझ रहा है। ऐसे में वित्त वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही के लिए घोषित जीडीपी की दर हतोत्साहित करने वाली है। हालांकि अगली तिमाही में इसके सुधार के संकेत मिलने शुरू हो गए हैं और सभी रेटिंग एजेंसियां 2021-22 में भारत की जीडीपी दस प्रतिशत के आसपास रहने की संभावना बता रही हैं। किंतु वर्तमान स्थिति में अर्थव्यवस्था को गति के लिए आवश्यक है कि सरकार ऐसे उपाय करे कि मांग में तेजी आए और पूर्णबंदी के दौरान रोजगार गंवा चुके लोगों को फिर से काम-धंधा मल सके। यह समय अर्थव्यवस्था में सुधारों और राहत प्रदान करने का है। स्थितियां सामान्य हो जाएं, तो पहले सूक्ष्म अर्थव्यवस्था की ओर ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि लघु और कुटीर उद्योगों को प्राणवायु मिल सके।

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