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अच्छाई का दायरा

मनुष्य हर समय कुछ न कुछ सीखता और सिखाता रहता है। दुनिया में सब तरह के लोग होते हैं।

Author Updated: February 22, 2021 4:18 AM
Grunanak deoसांकेतिक फोटो।

राजेंद्र प्रसाद

कुछ अच्छे तो कुछ बुरे। कुछ ऐसे भी होते हैं, जो संपर्क में आने वाले लोगों की तरह के हो जाते हैं और उनका अपना कुछ खास नहीं होता। दरअसल, पैदा होते ही हम माता-पिता और परिवार से संस्कार लेते हैं और बड़े होने पर आसपास के कारक हमारी मनोदशा पर प्रभाव डालते हैं।

जीव के अपने भी गुण-धर्म होते हैं, जो पैदा होने से पूर्व पुनर्जन्म की अवधारणा के अनुसार संचित रहते हैं और फिर निरंतर विकसित होते चले जाते हैं। हमारे सोचने और अंगीकार करने का ढंग हमारे व्यक्तित्व के निर्माण में सहायता करता है। इसलिए हम जिस परिवेश में वास करते हैं, उसके दूरगामी प्रभाव हमारे व्यक्तित्व पर पड़ना स्वाभाविक है।

सृष्टि के आदिकाल से ही अच्छे और बुरे में संघर्ष रहा है। यह भी सही है कि बुरा कोई कहलाना नहीं चाहता, हर कोई अच्छा नाम चाहता है। सवाल है कि जब खुद को कोई बुरा नहीं कहलाना चाहता तो बुरा क्यों बन जाता है! इस पर गहराई से विचार करें तो पाएंगे कि कर्म अच्छा या बुरा बनाता है और व्यक्ति अपने स्वभाव और परिवेश के अनुसार उन्हें करता है।

अंतर्मन में कितनी समझ है, कैसा चिंतन है, मनोवृत्ति कैसी है आदि के माध्यम से व्यक्ति के कर्म झलकते हैं। आमतौर पर हम चार प्रकार से कर्म करते हैं- विचारों के माध्यम से, जैसे किसी के बारे में कुछ सोचना। शब्दों के माध्यम से, जैसे किसी को कुछ कहना। क्रिया के माध्यम से, जैसे जो हम करते हैं, और क्रियाओं के माध्यम से, जो हमारे निर्देश पर दूसरे करते हैं।

अच्छे सोच-विचार के लिए अच्छी बातें सुनने-समझने-सीखने की जरूरत होती है। एक विचार के अनुसार अच्छी बातें पढ़ने की आदत हो, तो अच्छी बात करने की आदत लग जाती है। यह सही है कि अच्छी किताबें और अच्छे लोग तुरंत समझ में नहीं आते, उन्हें पढ़ना पड़ता है। अच्छे व्यक्ति को समझने के लिए अच्छा हृदय चाहिए। दिमाग हमेशा तर्क करेगा और हृदय हमेशा प्रेमभाव देखेगा।

व्यक्ति मन-मस्तिष्क में जैसा-कुछ सोचता-विचारता है, वैसा ही कुछ करने के लिए आगे बढ़ता है। तभी कहा गया है- सोचोगे अच्छा तो करोगे अच्छा। अच्छा करोगे तो होगा अच्छा। अच्छे मित्र, रिश्तेदार और विचार जिसके पास होते हैं, उसे दुनिया की कोई भी ताकत हरा नहीं सकती। इसलिए बस वही करना चाहिए जो अच्छा और सच्चा है।

पर सवाल यह भी है कि हमें अच्छे या बुरे का पता होना चाहिए, तभी उसके अनुरूप काम किया जाएगा। बहुत-से लोग तभी तक अच्छे रहते हैं, जब तक वे सोचते हैं कि दूसरे भी अच्छे हैं। कुछ लोग मानते हैं कि बुरे कर्म करने नहीं पड़ते, हो जाते हैं और अच्छे कर्म होते नहीं, करने पड़ते हैं। फिर भी दुनिया को आप सबसे अच्छा देने का प्रयास करें तो निश्चित ही सबसे अच्छा आपके पास वापस आ जाएगा।
हमारे जीवन में अच्छे लोगों का महत्त्व उतना है, जितना दिल की धड़कन का।

हालांकि यह दिखाई नहीं देती, लेकिन हमारे जीवन को चुपचाप चलाती रहती है। भीड़ में गलत काम के लिए चलने के बजाय अच्छा है अकेले चलने का जज्बा रखा जाए। भाग्यशाली वे नहीं होते, जिन्हें सब कुछ अच्छा मिलता है, बल्कि वे होते हैं जिन्हें जो मिलता है, उसे वे अच्छा बना लेते हैं। आकर्षण का नियम कहता है कि आप जैसा सोचते हैं, वैसे लोग, मौके, हालात और जिंदगी आपको मिलने लगती है। संसार में अच्छे लोगों की बहुत जरूरत है। इस क्षेत्र में विकास की अच्छी संभावनाएं हैं और प्रतियोगिता भी ज्यादा नहीं है।

गुरु नानक देव कहते हैं कि कर्मभूमि पर कुछ अच्छा पाने के लिए मेहनत सबको करनी पड़ती है। इसलिए हमेशा अच्छे बीज बोएं, ताकि फसल अच्छी हो। अच्छा कर्म करें और भूल जाएं। वे समय आने पर फलेंगे जरूर। आपके अच्छे काम अदृश्य प्रतीत हो सकते हैं, लेकिन वे अपनी छाप छोड़ते हैं जो लोगों के हृदय पर अंकित होते हैं। अच्छे कर्मों की हरियाली बड़ा सुकून देती है, कभी एक पौधा अच्छे कर्म का लगा कर देखें।

ध्यान रखना चाहिए कि अच्छे के साथ अच्छा बना जाए, पर बुरे के साथ बुरा नहीं। हीरे से हीरा तो तराशा जा सकता है, लेकिन कीचड़ से कीचड़ साफ नहीं किया जा सकता। सच्चाई और अच्छाई की तलाश में चाहे पूरी दुनिया घूम ली जाए, अगर वह खुद में नहीं तो कहीं भी नहीं मिलती। अच्छाई एक न एक दिन अपना असर जरूर दिखाती है, भले थोड़ा वक्त ले। बस सब्र का दामन पकड़ कर रखना चाहिए। अगर हम वास्तव में कुछ करना चाहते हैं तो रास्ता मिल जाएगा और नहीं चाहते हैं तो बहाना मिल जाएगा। सच यह है कि कर्म एक ऐसा भोजनालय है, जहां हमें कुछ आदेश देने की जरूरत नहीं। यहां वही मिलता है जो हमने पकाया होता है।

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