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परमाणु हथियारों का बढ़ता जखीरा

चीन अब ऐसी प्रतिस्पर्धा वाली नीति अपना रहा है जिससे दुनिया में परमाणु हथियारों को लेकर असंतुलन का खतरा बढ़ सकता है। न्यूनतम प्रतिरोध की परमाणु नीति से हटते हुए परमाणु हथियारों का जखीरा बढ़ाने की उसकी नीति न्यूक्लियर ट्रायड यानी जमीन, आसमान और समंदर से परमाणु हथियार दागने की क्षमता विकसित करने पर केंद्रित हो गई है।

Nuclear
सांकेतिक फोटो।
संजय वर्मा
हिरोशिमा-नागासाकी पर परमाणु बम हमले के बाद से दुनिया में इस सवाल पर विचार चलता रहा है कि आखिर परमाणु ऊर्जा का भविष्य क्या है। मसला यह है कि एक तरफ इससे पैदा की जाने वाली बिजली को जरूरी बताया जाता है, तो दूसरी तरफ परमाणु हथियारों की होड़ बढ़ती जा रही है। साफ-सुथरी बिजली की बात हो तो परमाणु ऊर्जा की वकालत करने वालों की कमी नहीं है। इस समय दुनिया में करीब दस फीसद बिजली नाभिकीय संयंत्रों (न्यूक्लियर रिएक्टरों) से ही पैदा हो रही है। इस ऊर्जा की वकालत की मूल वजह यह है कि परमाणु ऊर्जा को कार्बन उत्सर्जन घटाने का सबसे उम्दा विकल्प माना जाता है। लेकिन जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अगर परमाणु बिजली संयंत्र बनते हैं तो उनसे जुड़ा वह खतरा भी हमारे सामने आ जाता है कि कहीं दुनिया इसका इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने और उनके भंडारों में बढ़ोत्तरी के लिए न करने लगे। इधर, चीन के ऐसे ही बर्ताव ने इस संकट का साफ संकेत किया है।

कुछ समय पहले ही अमेरिकी अखबार- वॉशिंगटन पोस्ट में छपी एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चीन के पश्चिमी प्रांत गांझू के यूमेन शहर के पास रेगिस्तान में सौ से अधिक मिसाइल साइलोज (मिसाइल रखने के ठिकाने) बनाए जा रहे हैं। इन ठिकानों का इस्तेमाल तरल र्इंधन वाली अंतरमहाद्वीपीय मिसाइलों को रखने के लिए होगा। ऐसी मिसाइलें परमाणु हथियारों से लैस होती हैं। ये अत्यधिक ऊर्जा की मदद से लंबी दूरी तक मार कर सकती हैं। इन साइलोज का महत्त्व यह है कि इनमें रखी जाने वाली मिसाइलों की न सिर्फ देखभाल और मरम्मत आसानी से हो जाती है बल्कि यहीं से उन्हें निशाने पर दागा भी जा सकता है। इन ठिकानों के निर्माण को चीन की परमाणु नीति में उल्लेखनीय बदलाव के रूप में दर्ज किया गया है। एक ही बार में कई परमाणु हथियार ले जाने में समर्थ ये मिसाइलें अमेरिका तक मार कर सकती हैं। वैसे तो ऐसी मिसाइलों के निर्माण को परमाणु प्रतिरोध (डेटरेंट) का जरिया माना जाता है, यानी इनकी मौजूदगी के आधार पर या उनका भय दिखा कर कोई देश दुश्मन देशों से ऐसे हमलों को रोकने में कामयाब हो जाता है। लेकिन चीन के हालिया रुख को देख कर इसकी गारंटी नहीं रह गई है कि वह इन परमाणु मिसाइलों का उपयोग सिर्फ प्रतिरोध के लिए करना चाहता है।

चीन अब ऐसी प्रतिस्पर्धा वाली नीति अपना रहा है जिससे दुनिया में परमाणु हथियारों को लेकर असंतुलन का खतरा बढ़ सकता है। न्यूनतम प्रतिरोध की परमाणु नीति से हटते हुए परमाणु हथियारों का जखीरा बढ़ाने की उसकी नीति न्यूक्लियर ट्रायड यानी जमीन, आसमान और समंदर से परमाणु हथियार दागने की क्षमता विकसित करने पर केंद्रित हो गई है। यह उसके रुख में लगातार बढ़ रही आक्रामकता का स्पष्ट संकेत है। पेंटागन की एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन के पास फिलहाल लगभग दो सौ परमाणु हथियार हैं। अब चूंकि चीन अपनी सेना का आधुनिकीकरण कर रहा है, ऐसे में बहुत मुमकिन है कि उसके परमाणु हथियारों की संख्या मौजूदा संख्या के मुकाबले दोगुनी हो जाए। उल्लेखनीय है कि हाल में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के सौ साल पूरे होने पर दिए गए भाषण में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा था कि चीन को डराने का प्रयास करने वाली विदेशी ताकतों का सिर कुचल दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा था कि चीन अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाएगा। ऐसे बयानों और कार्रवाइयों से चीन के इरादों पर संदेह होता है।

पर सवाल है कि परमाणु हथियारों की होड़ पैदा करने में क्या सिर्फ चीन की ही भूमिका रही? इसका एक गंभीर पक्ष यह है कि विकसित देशों से लेकर विकासशील और पाकिस्तान जैसे कट्टर राष्ट्रों में परमाणु हथियारों की भूख बढ़ती जा रही है। आकलन कहता है कि अमेरिका के पास आज भी तीन हजार आठ सौ परमाणु हथियार हैं। इनमें से साढ़े सत्रह सौ हथियार विभिन्न मोर्चों पर तैनात हैं। ध्यान रहे कि दुनिया में सबसे पहले परमाणु शक्ति संपन्न होने वाला अमेरिका अकेला ऐसा मुल्क है, जिसने पहली और आखिरी बार परमाणु हथियारों का इस्तेमाल (हिरोशिमा-नागासाकी में) किया था। सत्तर के दशक में एक दौर ऐसा आया था जब अमेरिका के परमाणु हथियारों की संख्या इकतीस हजार पार कर गई थी।

ऐसा दावा है कि पिछले पचहत्तर वर्षों में अमेरिका ने कुल छियासठ हजार पांच सौ परमाणु हथियार बनाए, जिनमें से कई हजार परमाणु हथियार विभिन्न संधियों के तहत नष्ट किए गए। इसके अलावा करीब दो हजार परमाणु हथियारों को अमेरिका खत्म कर चुका है। तत्कालीन सोवियत संघ (आज का रूस) भी परमाणु हथियारों के मामले में अमेरिका से पीछे नहीं रहा। दूसरे विश्वयुद्ध के खात्मे के बाद हर मामले में अमेरिका से होड़ लेने वाले रूस ने अमेरिका से चार साल बाद 1949 में अपना पहला परमाणु परीक्षण कर लिया था और फिर बाद के वर्षों में हजारों परमाणु हथियार जमा कर लिए। वर्ष 1986 में रूस भी चालीस हजार से अधिक परमाणु हथियारों के जखीरे पर बैठा था। हालांकि शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद रूस ने भी इन हथियारों की संख्या घटाई और इन्हें छह हजार तीन सौ तक ले आया। फिलहाल दावा है कि रूस ने करीब सोलह सौ परमाणु हथियार तैनात कर रखे हैं और सत्ताइस सौ हथियार भंडारों में सुरक्षित रखे हैं।

चीन ने पहला परमाणु परीक्षण 1964 में किया था। उसके बाद से उसने पैंतालीस परमाणु परीक्षण किए हैं। हालांकि चीन ने व्यापक परमाणु प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी) पर दस्तखत किए हैं, फिर भी उसके पास तीन सौ बीस परमाणु हथियार बताए जाते हैं। इनमें से सौ के करीब लंबी दूरी की मिसाइलों पर लगे हैं। वर्ष 1974 में पहला परमाणु परीक्षण करने वाले भारत ने अब तक सीटीबीटी या परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) का अनुमोदन भले नहीं किया है, लेकिन वह अपने परमाणु हथियारों का किसी देश पर पहले इस्तेमाल नहीं करने (नो फर्स्ट यूज) की नीति पर कायम है। भारत की नीति दुनिया में भरोसेमंद मानी जाती है, लेकिन 1998 में परमाणु परीक्षण करने वाले पड़ोसी देश पाकिस्तान की मंशा पर किसी को यकीन नहीं है।

बात-बात पर पाकिस्तान के मंत्री पाव-पाव भर के एटमी हथियारों के इस्तेमाल की धमकी देते रहे हैं। यही नहीं, आशंका यह भी है कि पाकिस्तान अगले दस वर्षों में और परमाणु हथियार जमा करने की नीति पर चल रहा है और वह प्लूटोनियम और यूरोनियम आधारित परमाणु हथियार तैयार करने में जुटा है। पाकिस्तान और चीन जैसे परमाणु संपन्न पड़ोसियों को देखते हुए भारत की परमाणु नीति वक्त की जरूरत प्रतीत होती है। हालांकि चीन की नजरों में उसका मुकाबला अब अमेरिका-रूस से है। चीनी शासक कहते भी रहे हैं कि उनके पास रूस-अमेरिका से काफी कम संख्या में परमाणु हथियार हैं। शायद यही वजह है कि वह अमेरिका के दबाव के बावजूद रूस के साथ नए हथियार नियंत्रण समझौते में शामिल नहीं हो रहा है। इस दबाव को खारिज करते हुए चीन के सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स में लिखा जाता रहा है कि चीन को पश्चिमी देशों की राय की परवाह किए बिना अपनी सुरक्षा जरूरतों के हिसाब से हथियार बनाने चाहिए।

चूंकि ज्यादातर देश शक्ति संतुलन साधने के लिए परमाणु हथियारों की जरूरत की व्याख्या अपने मन मुताबिक करते रहे हैं, इसलिए निकट भविष्य में इसकी संभावना कम ही है कि इस सिलसिले में कोई प्रभावी रोक लग सकेगी। इसलिए न्यूनतम प्रतिरोध और जवाबी कार्रवाई करने के लिए विश्वसनीय परमाणु क्षमता हासिल करने की इस भूख का अंत कूटनीतिक स्तर पर ही संभव है। संकट यह है कि अगर किसी छोटी सी वजह से भी दुनिया के किसी कोने में एक बार परमाणु अस्त्र चलने लगे, तो शायद अब कोई जंग दुनिया के सर्वनाश के साथ ही खत्म होगी।

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