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राजनीति: प्रगति के लिए जरूरी है चुनाव सुधार

बार-बार चुनाव के कारण राज्यों को बार-बार आचार संहिता का पालन करना पड़ता है, जिससे उनके विकास कार्य बाधित होते हैं। इससे शिक्षा क्षेत्र अत्यधिक प्रभावित होता है। अलग-अलग चुनाव से काले धन का प्रवाह बढ़ जाता है। अगर लोकसभा और विधानसभा का एक साथ चुनाव होगा, तो काले धन के प्रवाह पर निश्चित ही रोक लग सकेगी।

Amendmentनिर्वाचन आयोग का कार्यालय।फाइल फोटो।

लालजी जायसवाल

पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने गुजरात के केवड़िया में पीठासीन अधिकारियों के अखिल भारतीय सम्मेलन के समापन सत्र में कहा कि एक देश एक चुनाव सिर्फ चर्चा का विषय नहीं है। यह भारत की जरूरत है, क्योंकि देश में हर महीने कहीं न कहीं बड़े चुनाव हो रहे होते हैं। इससे विकास कार्यों पर जो प्रभाव पड़ता है, उससे देश भली-भांति वाकिफ है। ऐसे में अब एक राष्ट्र एक चुनाव पर गहन मंथन की आवश्यकता है।

उनका कहना था कि बार-बार चुनाव होने से प्रशासनिक काम पर भी असर पड़ता है। अगर देश में सभी चुनाव एक साथ होते हैं, तो पार्टियां भी देश और राज्य के विकास कार्यों पर ज्यादा समय दे पाएंगी। इसलिए आज सरकार के एक देश, एक चुनाव के एजेंडे को जल्द से जल्द प्रभावी बनाने की दरकार है, क्योंकि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने का प्रस्ताव निश्चित ही राष्ट्र के विकास के पक्ष में होगा। इसीलिए लगातार सरकार इस पर मंथन भी कर रही है। अनेक राजनीतिक दलों ने भी अपना मत व्यक्त किया है, क्योंकि देश का विकास तभी संभव होगा, जब ऐसी उन सभी बातों पर ध्यान दिया जाए, जो विकास कार्यों में बाधा बनते हैं।

हालांकि एक राष्ट्र एक चुनाव कोई नई बात नहीं है। पहले 1952, 1957, 1962 तथा 1967 में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ हो चुके हैं। लेकिन वर्ष 1967 के बाद कुछ ऐसी स्थितियां बनीं, जिसमें लोकसभा और विधानसभा अलग-अलग समय पर भंग होती रहीं। इ+सका प्रमुख कारण विश्वासमत खो देना और गठबंधन का टूट जाना जैसे मामले थे। मगर आज एक देश एक चुनाव अपरिहार्य हो गया है। 1999 में विधि आयोग ने अपनी एक सौ सत्तरवीं रिपोर्ट में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का समर्थन किया था।

लेकिन इसके लिए संविधान में संशोधन करने की जरूरत होगी, क्योंकि यह देखा गया है कि पहले विधानसभाएं समय रहते ही भंग होती रही हैं। जाहिर है कि कई विधानसभाओं की समय सीमा भी कम करना होगा और कई की समय सीमा बढ़ानी भी पड़ेगी। यही समस्या लोकसभा में भी हो सकती है। इसलिए इन तमाम मुश्किलों का समाधान पाने के लिए अनुच्छेद 83, 85, 172 और 174 के साथ अनुच्छेद 356 में संशोधन करना होगा। साथ में लोक प्रतिनिधित्व कानून में भी बदलाव की दरकार होगी।

एक देश एक चुनाव के अनेक फायदे हैं, जो देश की प्रगति को नई दिशा प्रदान करेंगे। इससे बार-बार चुनावों में खर्च होने वाला धन बचेगा, जिसका उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य और जल संकट निवारण आदि ऐसे कार्यों में हो सकेगा, जिससे लोगों के जीवन स्तर में सुधार संभव हो सकेगा।

लोगों के आर्थिक जीवन के साथ सामाजिक जीवन में सुधार सुनिश्चित हो सकेगा। कई देशों ने विकास को गति देने के लिए एक देश एक चुनाव का फार्मूला अख्तिआर कर रखा है। जैसे- स्वीडन में पिछले साल आम चुनाव, काउंटी और नगर निगम के चुनाव एक साथ कराए गए थे। इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, जर्मनी, स्पेन, हंगरी, स्लोवेनिया, अल्बानिया, पोलैंड, बेल्जियम में भी एक बार चुनाव कराने की परंपरा है।

एक साथ चुनाव होने से आर्थिक बोझ काफी कम होगा। गौरतलब है कि 2009 के लोकसभा चुनाव में कुल ग्यारह सौ करोड़ रुपए और 2014 में चार हजार करोड़ रुपए खर्च हुए। 2019 में प्रति व्यक्ति बहत्तर रुपए खर्च हुए। विधानसभाओं के चुनावों में भी यही स्थिति नजर आती रही है। बार-बार चुनाव के कारण राज्यों को बार-बार आचार संहिता का पालन करना पड़ता है, जिससे उनके विकास कार्य बाधित होते हैं। इससे शिक्षा क्षेत्र अत्यधिक प्रभावित होता है।

अलग-अलग चुनाव से काले धन का प्रवाह बढ़ जाता है। अगर लोकसभा और विधानसभा का एक साथ चुनाव होगा, तो काले धन के प्रवाह पर निश्चित ही रोक लग सकेगी। साथ ही आपसी सौहार्द बढ़ेगा, क्योंकि चुनाव में बार-बार जाति-धर्म के मुद्दे नहीं उठेंगे और आम लोगों को भी तमाम परेशानियों से मुक्ति मिल सकेगी।

नतीजन, एक साथ चुनाव देश के हित में विकास को परिलक्षित करता है। निश्चित ही एक साथ चुनाव से कुछ समस्याओं का सामना भी करना पड़ेगा, लेकिन सदा के लिए इससे मुक्ति हेतु एक देश एक चुनाव जरूरी है। इससे क्षेत्रीय पार्टियों पर संकट आ सकता है और उनके क्षेत्रीय संसाधन सीमित हो सकते हैं। क्षेत्रीय मुद्दे खत्म हो सकते हैं और चुनाव परिणाम में देरी भी हो सकती है। साथ ही अतिरिक्त केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की आवश्यकता होगी।

इसलिए भारी संख्या में इनकी नियुक्ति करनी पड़ेगी। एक साथ चुनाव कराने के लिए ईवीएम की पर्याप्त आवश्यकता पड़ेगी, क्योंकि फिलहाल बारह से पंद्रह लाख ईवीएम का उपयोग किया जाता है। लेकिन जब एक साथ चुनाव होंगे तो उसके लिए तीस से बत्तीस लाख ईवीएम की जरूरत होगी। इसके साथ वीवीपैट भी लगाने होंगे। इन सबको पूरा करने के लिए चार से पांच हजार करोड़ रुपए की अतिरिक्त आवश्यकता होगी। निश्चित ही इससे पूंजीगत खर्च बढ़ेगा, क्योंकि एक साथ तीस से बत्तीस लाख ईवीएम की जरूरत को पूरा करना होगा और प्रति पंद्रह साल में इनको बदलना भी होगा, क्योंकि इनका जीवनकाल पंद्रह साल तक ही होता है।

मगर एक साथ चुनाव से अनेक फायदे भी होंगे। एक देश-एक चुनाव से सार्वजनिक धन की बचत के अलावा प्रशासनिक ढांचे और सुरक्षा बलों पर भार भी कम होगा। सरकार की नीतियों का समय पर कार्यान्वयन सुनिश्चित हो सकेगा और प्रशासन तंत्र चुनावी गतिविधियों में संलग्न रहने के बजाय विकास कार्यों में लगा रहेगा।

एक रिपोर्ट के अनुसार, आम चुनाव में राजनीतिक दल साठ हजार करोड़ रुपए खर्च करते हैं और विधानसभा चुनाव में भी करीब इतना ही खर्च होता है। यानी दोनों को मिला कर 1.20 लाख करोड़ रुपए राजनीतिक दलों द्वारा खर्च किए जाते हैं। एक बार चुनाव होगा तो प्रचार भी एक ही बार करना होगा, इसलिए खर्च घट कर आधा रह जाएगा। निश्चित ही पर्याप्त धन की बचत होगी, जिससे देश कि दशा और दिशा का निर्धारण हो सकेगा, लोगों का जीवन स्तर बेहतर हो सकेगा। इसलिए निश्चित ही देश में एक चुनाव देश की प्रगति में तेजी ला सकता है।

एक देश, एक चुनाव की अवधारणा में कोई बड़ी खामी नहीं दिखती है, पर राजनीतिक पार्टियों द्वारा जिस तरह इसका विरोध किया जाता रहा है, उससे लगता है कि इसे निकट भविष्य में लागू कर पाना संभव नहीं होगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत हर समय चुनावी चक्रव्यूह में घिरा नजर आता है। चुनावों के इस चक्रव्यूह से देश को निकालने के लिए एक व्यापक चुनाव सुधार अभियान चलाने की आवश्यकता है।

सरकार की प्रतिबद्धता से ही यह कार्य संभव हो सकेगा। सरकार के विकासात्मक एजेंडे का एक हिस्सा एक देश एक चुनाव भी है। यही देश के हित में है। प्रधानमंत्री लंबे समय से लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने पर जोर देते रहे हैं। मगर इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों की राय बंटी हुई रही है।

पिछले साल जब विधि आयोग ने इस मसले पर राजनीतिक पार्टियों से सलाह की थी, तब समाजवादी पार्टी, तेलंगाना राष्ट्र समिति, शिरोमणि अकाली दल जैसी पार्टियों ने एक देश, एक चुनाव की सोच का समर्थन किया था। अब समय आ गया है कि देश के सभी राजनीतिक दल एकजुट होकर एक देश, एक चुनाव के मुद्दे पर चर्चा कर इसे लागू कराने पर अपनी सहमति दें, जिससे सरकार सभी की सहभागिता के साथ इस नीति को कार्यान्वित कर सके। एक देश, एक चुनाव राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि विकास का मुद्दा है।

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