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राजनीतिः सीवेज जल की समस्या और उपयोग

भारत की सरकार भी मानती है कि केवल शहरी क्षेत्रों में लगभग बासठ फीसद सीवेज यानी मल-जल सीधे स्थानीय जल प्रणालियों या जल स्रोतों में डाल दिया जाता है। कहीं-कहीं यह सत्तर फीसद तक हो सकता है। इससे जल स्रोत प्रदूषित हो जाते हैं। तीन साल पहले तक देश में ऐसे राज्य भी थे, जहां एक भी सीवेज उपचार संयंत्र नहीं लगा था। हमारे देश में पिचहत्तर से अस्सी फीसद सतही जल का प्रदूषण घरेलू सीवेज के कारण होता है। कुल मिलाकर तीन चौथाई जल स्रोतों का प्रदूषण सीवेज के कारण होता है।

Author August 7, 2018 3:21 AM
भारतीय शहरी क्षेत्रों से रोजाना छप्पन अरब लीटर गंदा पानी सीवेज में बह जाता है। जब पानी की हर बूंद बचाने का मिशन हो तो देश में केवल शहरी घरों और कारखानों से अरबों लीटर प्रदूषित पानी का बेकार जाना पीड़ादायक बात है।

वीरेंद्र कुमार पैन्यूली

सामान्यतया देश में जैसे-जैसे नदियां आगे बढ़ती हैं, उनमें सीवेज यानी गंदे पानी की मात्रा भी बढ़ती जाती है। नतीजतन, रास्ते में पड़ने वाले बाद के शहरों को प्रदूषित जल मिलता है। इसे लेकर विवाद भी खड़े होते हैं। कावेरी जल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तुरंत बाद तामिलनाडु ने आरोप लगाया था कि कर्नाटक कावेरी जल को प्रदूषित कर तमिलनाडु को भेजता है। ऐसे ही, इस साल जून में प्रधानमंत्री की उपस्थिति में ही नीति आयोग की बैठक में हरियाणा के मुख्यमंत्री ने दिल्ली पर पानी को गंदा करने का आरोप लगाया था। निस्संदेह सीवेज नदियों में जा रहा है तभी हरिद्वार में गंगा का पानी आचमन या नहाने लायक भी नहीं बचा है। यमुना की स्थिति तो और भी चिंतनीय है। पवित्र नदियों का भी गंदा होना उनके उदगम से ही शुरू हो जाता है। हालात इतने खराब हैं कि बदरीनाथ और केदारनाथ तक में आश्रमों के गंदे नाले नदी में छोड़े जा रहे हैं।

इस समय पूरे विश्व में, विशेषरूप से विकासशील देशों में अस्सी से नब्बे फीसद सीवेज बिना उपचार के जल स्रोतों में डाल दिया जाता है। भारत की सरकार भी मानती है कि केवल शहरी क्षेत्रों में लगभग बासठ फीसद सीवेज यानी मल-जल सीधे स्थानीय जल प्रणालियों या जल स्रोतों में डाल दिया जाता है। कहीं-कहीं यह सत्तर फीसद तक हो सकता है। इससे जल स्रोत प्रदूषित हो जाते हैं। तीन साल पहले तक देश में ऐसे राज्य भी थे, जहां एक भी सीवेज उपचार संयंत्र नहीं लगा था। हमारे देश में पिचहत्तर से अस्सी फीसद सतही जल का प्रदूषण घरेलू सीवेज के कारण होता है। कुल मिलाकर तीन चौथाई जल स्रोतों का प्रदूषण सीवेज के कारण होता है। हमारे रहे-सहे जल स्रोत भी इस हद तक प्रदूषित हो रहे हैं कि वहां न नहाने की भी सलाह दी जाती है। जलीय जीवों पर जो बीतती है, वह तो अलग ही बात है।

चूंकि सीवेज में निन्यानवे फीसद जल और करीब एक फीसद भाग कार्बनिक या अकार्बनिक ठोस का होता है इसलिए कई देश सीवेज जल को ज्यादा से ज्यादा प्रदूषण रहित करने की तकनीक को विकसित करने में लगे हैं। जर्मनी, इजराइल, अमेरिका ऐसे देशों में अग्रणी हैं। व्यावसायिक स्तर पर वे इन तकनीकों का निर्यात भी कर रहे हैं। कृषि और औद्योगिक कार्यों में तो प्राथमिक व द्वितीय स्तर तक उपचारित सीवेज जल को उपयोग में लाना हो ही रहा है। इजराइल इस संदर्भ में अग्रणी कार्य कर रहा है। वहां कृषि क्षेत्र में आधी सिंचाई उपचारित जल से हो रही है। यही नहीं, विश्व में ऐसे भी देश हैं जो जल संकट से जूझ रहे हैं और इस समस्या से निपटने के लिए सीवेज जल को पीने के स्तर तक शुद्ध कर रहे हैं। नामीबिया ऐसा ही एक अफ्रीकी देश है, जहां राजधानी विंडहॉक के लाखों निवासियों के सीवेज को गोरेनगाब सीवेज उपचार संयंत्र में इस स्तर तक शुद्ध किया जा रहा है कि उससे पेयजल आपूर्ति हो रही है। सन 1968 से शुरू हुआ यह काम आज तक जारी है। बढ़ती जनसंख्या के चलते अब इसी तरह के और भी संयंत्र लगाए गए हैं। इस व्यवस्था को देखने के लिए दुनिया भर से लोग वहां पहुंचते हैं।

भारतीय शहरी क्षेत्रों से रोजाना छप्पन अरब लीटर गंदा पानी सीवेज में बह जाता है। जब पानी की हर बूंद बचाने का मिशन हो तो देश में केवल शहरी घरों और कारखानों से अरबों लीटर प्रदूषित पानी का बेकार जाना पीड़ादायक बात है। अनुमानित आंकड़ों के मुताबिक भारत में जितना पानी घरों में आता है, कहीं-कहीं उसका सत्तर फीसद से ज्यादा सीवेज में चला जाता है। इसमें वह साफ पानी भी होता है जो नल खुला छोड़ने से या दाड़ी बनाते समय नल चालू रखने से बह जाता है। घरों से बहता पानी चाहे वह शौचालय में प्रवाह के लिए ही हो, अधिकांश में वह जल होता है जो हमारे घरों में पीने लायक बन कर पहुंचता है।

शहरीकरण के साथ में बढ़ते सीवेज और इससे होने वाले जल प्रदूषण की गंभीरता देख संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास के स्वच्छ जल और स्वच्छता से संबंधित छठा लक्ष्य बिना उपचारित अपशिष्ट जल का अनुपात विश्व में आधा करने और उसे पुन: चक्र में डाल उसका उपयोग बढ़ाने का है। वैश्विक जल सुरक्षा व सीवेज जल उपचार का सीधा संबंध है। इसके दो बड़े कारण हैं। एक तो उपचारित जल का उपयोग परोक्ष रूप से विभिन्न कार्यों के लिए जल की उपलब्धता बढ़ा रहा है। इसे नए उपयोगों के लिए नए जल की उपलब्धता भी कहा जा रहा है। दूसरा है कि तृतीय चरण तक उपचारित सीवेज जल को जल स्रोतों में छोड़ने पर जल स्रोतों के प्रदूषित होने के जोखिम को कम किया जा सकता है। उपचारित सीवेज जल स्वत: ही जल स्रोतों में पहुंचने के बाद पुन: उपयोग चक्र में आ जाता है।

निर्विवाद है कि बेकार जल जो सीवर में डाल दिया गया है, उसका उपचार व उपयोग वांछित है। इससे पर्यावरण संरक्षण भी होगा। लेकिन जमीनी यथार्थ यह भी है कि गीले कचरे को ठिकाने लगाने की समस्या ठोस कचरे से कम नहीं है। जमीन के बढ़ते दाम उसकी उपलब्धता में कमी, महंगी बिजली, महंगी प्रौद्योगिकी के साथ महंगे होते सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों के कारण उपचार संयंत्रों को लगाना भी आसान नहीं है। समस्या यह भी है कि स्लज-कीचड़ नुमा अवशेष के कारण भी जनता अपने आसपास ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लगाने देती है। तथाकथित उपचारित सीवर जल भी नदियों में बेखौफ पूर्ण संतुष्टि से प्रदूषण रहित मान कर नहीं छोड़ा जा सकता है। बेहतर है कि हर इकाई ही अपने अपशिष्ट जल का ज्यादा से ज्यादा उपयोग ढूंढ़े जिससे सीवर लाइनों व उपचार संयंत्रों पर कम से कम भार पड़े। वरना सीवर लाइनों के भीतर जितना गंदा जल मल जा रहा है, वह ऐसे ही बहता रहेगा।

यह भी देखा गया है कि नगरों-महानगरों के आसपास के किसान सिंचाई के पानी की उपलब्धता की कमी के कारण भी (खासकर सब्जी उगाने वाले) गंदी नालियों का पानी खेती में लगा रहे हैं। कुछ जगहों पर इन्हें खरीदा भी जा रहा है। यही नहीं, सब्जियां भी ऐसे पानी से धोई जा रही हैं। ऐसी उगी सब्जियों को खाने से गंभीर बीमारियां हो रही हैं। इसलिए भारत जैसे कृषि प्रधान देश में सीवेज जल का उपचार यदि द्वितीय चरण तक ही हो रहा हो तो इस चरण के बाद इसे कृषि कार्यों के लिए उपयोग में लाया जा सकता है।

हालांकि यदि यह भी मानकों के अनुसार न हो तो कच्चे खाने वाले फल-सब्जियों में प्रदूषण का असर ज्यादा हानिकारक हो सकता है। सही मानक की बात इसलिए आवश्यक है कि भारत में लगभग एक तिहाई उन सीवेज प्लांटों से जो नदियों के सफाई कार्यक्रम में लगाए गए हैं, जो उपचारित प्रवाह निकलता है, वह भी नदियों में डालने लायक नहीं होता है। फिर हम समझ लें जल-मल उपचार संयंत्रों का मुख्य लक्ष्य यह होता है कि जो भी प्रवाह व स्लज बाहर निकले, वह पर्यावरण को, जिसमें जमीन भी है व पानी भी है, नुकसान न पहुंचाए। इसमें बचे हुए प्रदूषण का स्तर इतना भर हो कि प्रकृति स्वयं अपनी प्राकृतिक प्रक्रियाओं से उनसे उबरने की क्षमता रखे। सीवेज जल को भी पुन: उपयोग करने की तकनीकियों पर युद्धस्तर पर काम किया जाना वांछित है।

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