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राजनीति: गरीबी नापने के नए मापदंड

आज गरीबी रेखा से नीचे जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति के लिए भी शिक्षा, स्वास्थ्य और मकान की सुविधाएं अगर आसानी से उपलब्ध नहीं हैं, तो इन्हें भी आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं की टोकरी में शामिल किया जाना चाहिए। इससे गरीबी रेखा उच्च स्तर पर निर्धारित होगी और इस सीमा से कम आय वाले व्यक्तियों को भी सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का लाभ मिल सकेगा।

गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने को मजबूर लोग। फाइल फोटो।

प्रह्लाद सबनानी

भारत में गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे लोगों की संख्या में कमी तो आई है, पर क्या उन्हें स्वास्थ्य, शिक्षा और मकान की सुविधाएं ठीक से उपलब्ध हो पा रही हैं? क्या सरकार इन मदों में उपलब्ध कराई जा रही सुविधाओं को गरीबी आंकने के पैमाने में शामिल करती है या केवल उनकी आय में हुई वृद्धि के चलते ही उन्हें गरीबी रेखा के स्तर से ऊपर मान लिया जाता है?

भारत में 1947 में सत्तर प्रतिशत लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे थे, जबकि अब देश की कुल आबादी का लगभग बाईस फीसद हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे है। 1947 में देश की आबादी पैंतीस करोड़ थी, जो आज बढ़ कर एक सौ छत्तीस करोड़ हो गई है। देश में गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे लोगों की आय में वृद्धि के साथ-साथ केंद्र सरकार द्वारा वित्तीय समावेशन को सफलतापूर्वक लागू करने के कारण यह कमी देखने में आई है।

उसके पीछे मुख्य कारण विभिन्न वित्तीय योजनाओं को डिजिटल माध्यमों पर ले जाना है। केंद्र्र सरकार द्वारा शुरू की गई जन-धन योजना ने इस संदर्भ में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। इस योजना के अंतर्गत लगभग इकतालीस करोड़ खाते विभिन्न बैंकों में खोले गए हैं। खासकर महिलाओं के बाईस करोड़ से अधिक खाते खोले गए हैं, जिनके खातों में आज सीधे सब्सिडी का पैसा केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा हस्तांतरित किया जा रहा है। इससे बिचौलियों की भूमिका समाप्त हो गई है, पूरा का पूरा पैसा हितग्राहियों के खातों में सीधे जमा हो रहा है।

भारत उन अग्रणी देशों में रहा है, जिन्होंने गरीबी रेखा को सबसे पहले परिभाषित किया। 1960 से ही भारत और विश्व बैंक की इस संबंध में परस्पर चर्चा चलती आई है, और भारत में गरीबी रेखा की जो परिभाषा दी गई थी, उसी के इर्द-गिर्द विश्व बैंक ने भी एक डॉलर प्रतिदिन प्रति व्यक्ति की आय को गरीबी रेखा के रूप में परिभाषित किया था, जो बाद में बढ़ते-बढ़ते दो डॉलर तक पहुंच गई।

विश्व बैंक ने समय-समय पर गरीबी रेखा की परिभाषा में सुधार किया है। इसलिए कि विभिन्न देशों के निवासियों द्वारा उपभोग की जाने वाली वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि के साथ उनकी आय में भी वृद्धि होना आवश्यक है।

भारत में भी शुरू-शुरू में प्रति व्यक्ति कैलोरी (शहरी और ग्रामीण इलाकों में रह रहे लोगों के लिए अलग-अलग कैलोरी की आवश्यकता निर्धारित की गई थी) खपत, यानी कितनी कैलोरी के लिए किस खाद्य सामग्री का उपभोग करना होगा और उस खाद्य सामग्री को खरीदने के लिए प्रति व्यक्ति कितनी आय आवश्यक होगी, उस आय को ही गरीबी रेखा माना गया था।

उस समय सोचा गया था कि चूंकि अस्पताल और स्कूलों की व्यवस्था सरकार की ओर से की जाती है, इसलिए स्वास्थ्य और बच्चों की पढ़ाई के लिए गरीब व्यक्तियों को कुछ भी खर्च करने की जरूरत नहीं है। इसलिए उपभोक्ता वस्तुओं की टोकरी में स्वास्थ्य और बच्चों की पढ़ाई पर खर्च को शामिल नहीं किया गया था।

पर आज की स्थिति में गरीबी रेखा निर्धारित करते समय खाद्य सामग्री और उपभोक्ता वस्तुओं के अलावा कुछ अन्य बिंदुओं पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। मसलन, देश में शिक्षा का स्तर कितना है, इस संबंध में विशेष सुविधाएं किस प्रकार उपलब्ध हैं और इसका कितना विकास हुआ है। दूसरे, देश में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति कैसी है और क्या ये सुविधाएं सभी नागरिकों को आसानी से उपलब्ध हैं।

तीसरे, लोगों को मकान की सुविधाएं किस स्तर पर उपलब्ध हैं। आज गरीबी रेखा से नीचे जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति के लिए भी शिक्षा, स्वास्थ्य और मकान की सुविधाएं अगर आसानी से उपलब्ध नहीं हैं, तो इन्हें भी आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं की टोकरी में शामिल किया जाना चाहिए। इससे गरीबी रेखा उच्च स्तर पर निर्धारित होगी और इस सीमा से कम आय वाले व्यक्तियों को भी सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का लाभ मिल सकेगा। गरीबी रेखा का आकलन करने के तरीके को अब बदलने का समय आ गया है।

वैश्विक स्तर पर गरीबी रेखा का निर्धारण सामान्यतया कम आय आधारित देशों को ध्यान में रख कर किया जाता है, जहां आवश्यक उपभोग वाली वस्तुएं तुलनात्मक रूप से कुछ सस्ते दामों पर उपलब्ध हो जाती हैं। इस प्रकार गरीबी रेखा भी कम आय के साथ जुड़ जाती है। जबकि मध्यम आय श्रेणी के देशों में इतनी आय में शायद आवश्यक उपभोग वाली वस्तुएं उपलब्ध न हो पाएं। भारत भी पहले कम आय श्रेणी के देशों में गिना जाता था, पर अब कम मध्यम आय श्रेणी के देशों में गिना जाता है।

वैश्विक स्तर पर अब चार डॉलर प्रतिदिन प्रति व्यक्ति आय को गरीबी रेखा का पैमाना बनाए जाने की चर्चाएं होने लगी हैं। हालांकि यह परिभाषा कम आय वाले देशों के लिए समस्या खड़ी कर सकती है, क्योंकि इन देशों में प्रति व्यक्ति आय के स्तर को इतने ऊंचे स्तर पर ले जाना शायद मुश्किल होगा, इसलिए इन देशों में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों की संख्या बढ़ जाएगी। पर अगर सभी देश एक जैसी परिभाषा को लागू नहीं करते हैं तो फिर विभिन्न देशों की बीच, गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे लोगों के संबंध में, आपस में तुलना करना कठिन हो जाएगा।

एक और बात पर विचार किया जा सकता है कि क्या विश्व बैंक और विभिन्न देशों द्वारा निर्धारित की जा रही गरीबी रेखा अलग-अलग नहीं हो सकती है? विभिन्न देश ही क्यों, एक ही देश के ग्रामीण और शहरी इलाकों में अलग-अलग खर्च और आय का स्तर है। साथ ही, सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं का भी देश में गरीबी के स्तर पर प्रभाव पड़ता है।

अगर इस प्रकार की योजनाएं ग्रामीण इलाकों में अधिक मुस्तैदी से चलाई जाती हैं, तो वहां गरीबी का स्तर कम देखने को मिलेगा। जैसे भारत में ग्रामीण इलाकों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली बहुत मजबूत हो गई है, जहां अनाज सस्ती दरों पर उपलब्ध कराया जा रहा है। इसके चलते ग्रामीण इलाकों में वास्तविक गरीबी कम हो गई है। शिक्षा क्षेत्र में भी काफी सुधार देखने में आ रहा है, स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की दर में काफी कमी आई है।

भारत में तीन चीजें विश्व के अन्य देशों की तुलना में एकदम अलग हैं। एक, हमारे देश के गावों में निवास करने वाले लोगों की संख्या बहुत अधिक है। दूसरे, कृषि पर आश्रित लोगों की संख्या भी बहुत अधिक है। तीसरे, अनौपचारिक क्षेत्र में बहुत बड़ी तादाद में लोग कार्यरत हैं, जहां कार्यरत लोगों की आय नियमित नहीं है। कृषि क्षेत्र में भी आय बदलती रहती है।

इसलिए सही तरह से अन्य देशों से तुलना नहीं हो पाती है। आय को तो सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि से आंका जा सकता है, रोजगार बढ़ेगा तो प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ेगी, पर अन्य सुविधाएं जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा और मकान आदि, किस स्तर पर उपलब्ध हैं, यह भी देखना होगा। इनमें शहरी और ग्रामीण इलाकों के अंतर का भी ध्यान रखना होगा।

हालांकि भारत में अनौपचारिक क्षेत्र में कार्य कर रहे लोगों के लिए न्यूनतम मजदूरी का प्रावधान हाल ही में किया गया है। साथ ही कृषि मजदूरों के लिए ग्रामीण स्तर पर ही रोजगार के अवसर जुटाने का प्रयास किया जा रहा है। फिर भी उक्त मानदंडों को शामिल करते हुए अगर गरीबी रेखा की परिभाषा बदली जाती है, तो देश में विशेष योजनाएं बना कर गरीबी को तेजी से दूर किया जा सकता है।

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