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राजनीतिः संभावनाओं का सागर

कुछ साल पहले, अंतरदेशीय जलमार्ग प्राधिकरण ने देश में साढ़े चौदह हजार किलोमीटर जलमार्ग का पता किया था। प्राधिकरण मानता है कि नदियों के माध्यम से बावन सौ किलोमीटर और नहरों के जरिए चार हजार किलोमीटर की यात्रा संभव है। पर नदियों का हाल देखकर यकीन नहीं होता कि इन जलमार्गों से भारी माल की ढुलाई संभव है।

Author April 15, 2016 02:15 am
(File Photo)

पुष्परंजन

शायद इस बार बहस हो कि क्यों भारत को चीन के समुद्री रेशम मार्ग (एमएसआर) का हिस्सा बनना चाहिए। मालदीव, म्यांमा, श्रीलंका, पाकिस्तान ने जिस तरह से चीन के इस समुद्री रेशम मार्ग का समर्थन किया है, उसमें कई सारे पेच हैं। दक्षिण चीन सागर (साउथ चाइना सी) से 2013 में यह सारा खेल शुरू हुआ था, जिसका धीरे-धीरे विस्तार हो रहा है। इससे दक्षिण चीन सागर में चीन की दावेदारी और मजबूत हो रही है। भारत में पहली बार समुद्री मार्ग शिखर बैठक हो रही है। मुंबई में 14 से 16 अप्रैल 2016 को हो रही शिखर बैठक में इस पर विमर्श जरूरी है कि चीन ‘समुद्री सिल्क रूटह्ण के बहाने क्या चाहता है, और भारत को किस तरह की रणनीति अपनानी चाहिए। इस सम्मेलन में चालीस देशों की सहभागिता हो रही है, जिसमें दुनिया भर के पैंतीस सीईओ शिखर बैठक का हिस्सा बनेंगे।

इस शिखर बैठक में बंदरगाहों का आधुनिकीकरण, अंतरराष्ट्रीय शिपिंग, नए बंदरगाहों की स्थापना, तटीय पोत परिवहन, क्रूज सेवा और लाइटहाउस टूरिजम, जहाजों का निर्माण, उनकी मरम्मत और शिप रिसाइकलिंग, बंदरगाह वाले इलाकों का उद्योगीकरण जैसे महत्त्वपूर्ण विषय हैं। समुद्री मार्ग शिखर सम्मेलन में मछुआरों को जलसीमा पार मछली पकड़ने जैसे विवादित विषय नहीं रखे गए हैं। उदाहरण के लिए, अक्सर सोमालिया की समुद्री सीमा से नौकाओं पर मछली का शिकार कर रहे वनवासियों को यूरोप वाले पकड़ लाते हैं, और उन्हें जल दस्यु घोषित कर देते हैं। उनसे यूरोप की अदालतें नहीं पूछतीं कि कौन-से अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत आप इन्हें वहां से उठा लाए हो। अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून यही कहता है कि जिस देश से ऐसे लोग पकड़े जाएं, उसी देश को उन्हें सौंपा जाना चाहिए। बावजूद इसके, पश्चिमी दबंगई बदस्तूर जारी है। ऐसे विषय पर समुद्री शिखर सम्मेलनों में कम ही बात होती है।

अरसे बाद हमारी सरकार जलमार्ग के प्रति गंभीर हुई है। जिस तरह इस विषय पर दुनिया के बाकी मुल्कों से सरकार संवाद कर रही है, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। नौ साल पहले, 30 अगस्त 2007 को जहाजों को जलमार्ग की सुविधाएं देने संबंधी संशोधन विधेयक जब संसद में पास हो रहा था, तब जानकारी दी गई कि देश भर में मात्र 0.17 प्रतिशत जलमार्ग इस्तेमाल में है। यह वही भारत है, जहां 12 लाख 60 हजार किलोमीटर तक जलमार्ग की सुविधा वाली सिंघु घाटी जैसी महान सभ्यता का जन्म हुआ था।

सिंधु घाटी की सभ्यता के दौर में अपने यहां सबसे अधिक व्यापार जल मार्ग से ही हुआ करता था। गुजरात के लोथल से लेकर सिंध-रावी नदी व गंगा-दोआब तक के व्यापारी जल मार्ग से ईरान, मध्य एशिया तक मसाले और कपास पहुंचाते थे। यह चीन के समुद्री सिल्क रूट से कई हजार साल पुराना जलमार्ग है। चीन का दावा है कि ईसा पूर्व 202 से 220 सदी में हान साम्राज्य के समय उसके समुद्री सिल्क रूट का विकास हुआ था। पर ध्यान से देखिए तो चीन के हान राजवंश से कोई तीन हजार साल पहले सिंधु घाटी सभ्यता का वह स्वर्णकाल था, जब भारत का समुद्री व्यापार अपने शबाब पर था। प्रधानमंत्री मोदी को चाहिए कि ‘सिंधु घाटी समुद्री मार्ग’ का प्रस्ताव इस शिखर बैठक में रखें, और इस अवसर पर आए अतिथियों से इसका अनुमोदन कराएं।

लेकिन इस प्रस्ताव के साथ-साथ देश के भीतर जलमार्ग को दुरुस्त करना जरूरी है। कुछेक साल पहले, भारतीय अंतरदेशीय जलमार्ग प्राधिकरण (आईडब्ल्यूएआई) ने देश में साढ़े चौदह हजार किलोमीटर जलमार्ग का पता किया था। जलमार्ग प्राधिकरण मानता है कि नदियों के माध्यम से बावन सौ किलोमीटर, और नहरों के जरिए चार हजार किलोमीटर की यात्रा संभव है। मगर गंदे नाले में परिवर्तित नदियों को देख कर यकीन नहीं होता कि अपने देश के जलमार्ग से भारी मशीनों या माल की ढुलाई संभव है। कई बार सरकार कितनी विवश हो जाती है, इसका उदाहरण 2002 की घटना है। चौदह साल पहले, उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद से फरक्का, बलिया से फैजाबाद और डालीगंज से गौघाट माल ढुलाई के लिए पानी जहाज चलाने की परियोजना तैयार की। बाद में इन जलमार्गों पर यात्री सेवाएं भी शुरू होनी थीं। इस योजना को तैयार करने में करदाताओं के करोड़ों रुपए खर्च कर दिए गए। 2002 के अंत में उत्तर प्रदेश सरकार ने बयान दिया कि नदियों में पानी नहीं है, इसलिए हम इस योजना पर अमल नहीं कर सकते।

यों, जलमार्ग ने भारतीय जन-जीवन को काफी-कुछ दिया है। पनिया के जहाज से पिया रंगून चले जाते थे, उनसे जुड़ी जुदाई व विछोह की असंख्य रचनाएं, हमारे साहित्य और संगीत को समृद्ध कर रही थीं। जल से जुड़े यात्रा वृत्तांत, माझी गीत अब बिरले ही लिखे जा रहे हैं। प्रदूषण के कारण नदियों से मछलियां गायब हैं, जिससे स्थानीय मछुआरों को दो जून भोजन नसीब होता था। स्थानीय लोगों के बीच ‘सोंस’ कही जाने वाली ‘गंगा डाल्फिन’ को देखना अब दुर्लभ है। हिमालय से मैदानी इलाके की जलधारा में जब घड़ियाल उतरते नहीं, तो नई पीढ़ी को क्या पता कि ‘गज और ग्राह की लड़ाई’ की चर्चा किस संदर्भ में होती रही है? घड़ियाल तो अब देश के चंद चिड़ियाघरों में नुमाइश वाले जंतु बनकर रह गए हैं।

यूरोप का जलमार्ग देख कर हसद (ईर्ष्या) और हसरत दोनों होती है। सैंतीस हजार किलोमीटर लंबे यूरोपीय जलमार्ग से यूरोप के सैकड़ों शहर जुड़े हुए हैं। यूरोपीय संघ के अट्ठाईस में से बीस सदस्य देशों के शहर और गांव, जलमार्ग से ही माल मंगाते हैं। लोगों का घूमना भी जलमार्ग से ज्यादा होता है। स्वच्छ हवा और नैसर्गिक सौंदर्य के कारण, यूरोप में सबसे महंगे मकान नदी के किनारे मिलते हैं। यूरोप में पचास प्रतिशत माल की ढुलाई रेल से होती है, और सत्रह प्रतिशत माल पानी वाले जहाज ढोते हैं। एशिया में इस समय चीन है, जो एक लाख दस हजार किलोमीटर जलमार्ग का इस्तेमाल कर रहा है। साढ़े इक्कीस हजार किलोमीटर जलमार्ग वाले इंडोनेशिया, और सत्रह हजार सात सौ दो किलोमीटर जलमार्ग वाले विएतनाम से भी ‘सारे जहां से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा’ क्यों पीछे है? इस पर विमर्श का समय आ गया है। न्यूयार्क नदी के किनारे बसा है, पेरिस और लंदन भी। मगर इन तीनों शहरों से यमुना के तीर पर बसी दिल्ली की तुलना नहीं हो सकती।

इससे भी अधिक चिंता का विषय भारत की समुद्री सुरक्षा है। शुरू में चीन ने समुद्री रेशम मार्ग (एमएसआर) के बारे में अपनी मुट्ठी बंद रखी थी। लेकिन 8 मई 2014 को एक नक्शा प्रकाशित कर चीन ने अपनी नीयत का खुलासा कर दिया। इस नक्शे में फुचियान प्रांत के छवांगचोऊ से मलक्का जलडमरूमध्य, क्वालालंपुर से कोलकाता, नैरोबी, केन्या, हार्न आॅफ अफ्रीका, (लाल सागर से मेडिटेरेनियन) और फिर उसे एथेंस से जोड़ कर चीन ने स्पष्ट कर दिया कि वह दुनिया के दो तिहाई समुद्री हिस्से पर अपने प्रभामंडल का विस्तार चाहता है। चीन ने समुद्री रेशम मार्ग के वास्ते दस अरब युआन (1.6 अरब डॉलर) की राशि आबंटित कर रखी है। एमएसआर के बहाने चीन हिंद महासागर, प्रशांत और बाल्टिक सागर में समुद्री संचार सुरक्षा (एसएलओसी) को अपने नियंत्रण में लेना चाहता है। इसे लेकर सिर्फ भारत नहीं, यूरोप और अमेरिका को भी चिंता है। दिएगोगार्सिया पर नियंत्रण के बहाने लंबे समय तक अमेरिका, ब्रिटेन हिंद महासागर की गतिविधियों को काबू करते रहे। अब उन्हें चीन के इस समुद्री रेशम मार्ग को लेकर एक नई चुनौती मिलनी शुरू हो गई है।

इस समय अमेरिका और यूरोपीय संघ के देश भी चाहते हैं कि भारत समुद्री मार्ग के नए प्रस्ताव रखे, और चीनी वर्चस्व को आगे बढ़ने से रोके। सोमवार को मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन अब्दुल गयूम से जो पांच समझौते भारत ने किए, उनमें सबसे अहम समझौता समुद्री सुरक्षा से संबंधित था। इससे और पहले, 2009 में तत्कालीन राष्ट्रपति नाशीद ने मालदीव के द्वीपों पर छब्बीस रडार स्टेशन लगाने की अनुमति दी थी। इसके अलावा मालदीव में भारतीय तटरक्षक बल चार‘इलेक्ट्रो आॅप्टिक सेंसर स्टेशन’ हमारी समुद्री सीमाओं की चौकसी कर रहे हैं। अमेरिका, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन की चिंता हिंद महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर भी है।

पिछले साल राष्ट्रपति शी के दौरे के समय मालदीव, चीन के समुद्री सिल्क रूट के लिए जब सहमत हुआ, तब पश्चिमी देश इससे चिंतित हो गए। ये देश हर हाल में चाहते रहे हैं कि भारत, मालदीव से संवाद न तोड़े। 2015 में भारत-मालदीव संबंध के पचास साल पूरे हुए हैं। पश्चिमी दबाव के कारण 10 से 11 अक्टूबर 2015 को विदेशमंत्री सुषमा स्वराज पांचवें संयुक्त आयोग की बैठक में मालदीव गर्इं। अब गाड़ी पटरी पर है। मालदीव ‘भारत निवेश फोरम-2016’ आयोजित कर रहा है। 2016 ‘विजिट मालदीव इयर’ के रूप में मनाया जा रहा है। अच्छा हो कि प्रधानमंत्री मोदी इस अवसर पर माले का दौरा करें, और ‘सिंधु घाटी समुद्री मार्ग’ के वास्ते मालदीव की सहमति लें। चीन के विरुद्ध इस तरह की व्यूह रचना जरूरी है। ‘सिंधु घाटी समुद्री मार्ग’ को पुनर्जीवित करने के वास्ते भारत को ईरान, तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमा और मध्य एशिया के देशों की जरूरत पड़ेगी। यह पक्की बात है कि पाकिस्तान, भारत के इस प्रस्ताव के आड़े आएगा। बल्कि पाकिस्तान के कई सारे नीति निर्माताओं, बुद्धिजीवियों को ‘हिंद महासागर’ और ‘भारतीय उपमहाद्वीप’ जैसे शब्दों तक पर आपत्ति है। अगर उन्हें एतराज है, तो हुआ करे। भारत को अपनी समुद्री महत्त्वाकांक्षा को बनाए रखना चाहिए!

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