ताज़ा खबर
 

राजनीति: शहरों को ठंडा रखने का सबक

लू और गर्मी के हालात राजस्थान और बुंदेलखंड क्षेत्र में सदियों से रहे हैं। बुंदेलखंड के कई हिस्सों का पारा हर साल पचास डिग्री को छू जाता है। बुंदेलखंड के बांदा जिले में तो लगभग हर साल ही इतना तापमान पहुंचता है। इसलिए वहां के इतिहास में झांक कर देखा जाना चाहिए कि बुंदेलखंड के प्राचीन शासकों ने इस समस्या से निपटने के लिए क्या उपाय किए थे।

उत्तर भारत में गर्मी का असर दिखने लगा। तापमान में लगातार इजाफा हो रहा है।

सुविज्ञा जैन
इस बार देश के कई इलाके भीषण गर्मी और लू से ज्यादा ही बेहाल रहे। राजधानी दिल्ली में मई महीने में तापमान का अठारह साल का रिकॉर्ड टूट गया। गौरतलब है कि दुनिया का सबसे ज्यादा गर्म शहर भारत में ही दर्ज हुआ है। पिछले हफ्ते राजस्थान के चुरू जिले में पारा पचास डिग्री के पार चला गया। याद यह भी रखा जाना चाहिए कि हर साल भारत में लू और तपस से सैकड़ों जानें जाती हैं। गर्मी की चपेट में ज्यादातर गरीब और बेघर लोग आते हैं। हालांकि इस बार कोरोना के भयावह संकट के कारण गर्मी की आपदा पर उतना ध्यान गया नहीं। बहरहाल, पिछले कुछ साल के रूझान पर गौर करें तो गर्मी की त्रासदी साल दर साल बढ़ती जा रही है। हर साल सैकड़ों जानें जा रही हैं।

बेशक तात्कालिक उपाय हर साल किए जाते हैं, लेकिन क्या इससे बचाव का कोई स्थायी समाधान भी संभव है? बहरहाल, साल दर साल बढ़ती गर्मी और लू का रुझान देख कर हमें अब मान लेना चाहिए कि जलवायु परिवर्तन ने पूरे विश्व में मौसम की कुदरती चाल बदल डाली है। चाहे बेमौसम बारिश हो या सूखे की बढ़ती बारंबरता, या फिर तूफानों की बढ़ती आवृति और जंगलों में लगती आग हो, इन सभी आपदाओं को जलवायु परिवर्तन का ही असर माना जा रहा है। गौर करें तो पिछले सालों में कई देशों में तापमान का रिकॉर्ड टूटा है। विश्व के कई शहरों से उष्णलहर की त्रासदी की तस्वीरें दिखाई गई थीं। कई जगह परामर्श जारी करने पड़े कि घरों से न निकलें। सरकारें ऐसी विपत्तियों को आमतौर पर आसमानी आपदाएं ही मानती हैं। लेकिन यह सवाल भी उठता है कि सरकारों की तरफ से क्या ऐसी आपदाओं के प्रभाव को कम करने का कोई इतंजाम नहीं किया जा सकता?

आमतौर पर ताप लहर (हीट वेव) यानी लू कुछ दिनों में खत्म हो जाती है। ऐसा कम ही होता है कि लगातर कई हफ्ते लू चली हो। लेकिन भारत जैसे देश में कई इलाके ऐसे हैं जहां गर्मी के मुख्य महीनों में पारा पचास डिग्री के पास हर साल पहुंच जाता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि तापमान का बढ़ना और लू प्राकृतिक घटनाएं हैं। लेकिन इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि मानव के पास प्रकृति से तालमेल बैठाने का भी हुनर है। खासतौर पर संपन्न और समृद्ध वर्ग ने अपने लिए लू और गर्मी से बचाव के उपाय भी कर लिए हैं। लेकिन भारत जैसे देश में एक वर्ग ऐसा भी है जो रोज कमाने खाने वालों है।

सड़क, फुटपाथ के किनारे बसे बेघर गरीबों, निर्माण मजदूरों या रिक्शा खींचने वालों या ठेलों पर सामान बेचने वालों को गर्मी से बचाव के वैसे उपाय सुझाना बेमानी है। झुलसाती धूप में बाहर निकलना उनकी मजबूरी है। इसीलिए सवाल उठता है कि क्या वाकई उनके लिए गर्मी से बचाव का कोई उपाय नहीं सोचा जा सकता? जवाब ढूंढ़ने निकलें तो पता चलेगा कि ऐसा बिल्कुल नहीं है कि भारतीय पारंपरिक ज्ञान में इस बारे में कोई उपाय सुझाया न गया हो।

पिछले हफ्ते जैसे लू और गर्मी के हालात राजस्थान और बुंदेलखंड क्षेत्र में सदियों से रहे हैं। बुंदेलखंड के कई हिस्सों का पारा हर साल पचास डिग्री को छू जाता है। बुंदेलखंड के बांदा जिले में तो लगभग हर साल ही इतना तापमान पहुंचता है। इसलिए वहां के इतिहास में झांक कर देखा जाना चाहिए कि बुंदेलखंड के प्राचीन शासकों ने इस समस्या से निपटने के लिए क्या उपाय किए थे। बांदा जिले के पास ही एक जिला है महोबा। वहां के राजाओं ने आज से एक हजार साल पहले भी अपनी प्रजा को भीषण गर्मी से बचाने का इंतजाम कर रखा था।

नौंवी से तेहरवीं सदी तक बुंदेलखंड पर राज करने वाले चंदेल राजाओं ने अपनी प्रजा को गर्मी से बचाने के लिए पानी की चादरें बिछाने का काम किया था। पानी की ये लंबी चैड़ी चादरें तालाबों के रूप में थीं। जब भी बुंदेलखंड में सूखा पड़ता है तब चंदेलों के बनवाए हजारों तालाबों को जरूर याद किया जाता हैं। लेकिन इस तरफ कम ही घ्यान जाता है कि चंदेलों ने ये तालाब अपनी राजधानी महोबा को ठंडा रखने के मकसद से भी बनाए थे।

चंदेलकालीन तालाबों पर शोध करने वाले आज के विद्वान यही समझते आए हैं कि चंदेलों ने महोबा में सात विशाल तालाब जल प्रबंधन के लिए बनवाए। लेकिन इन तालाबों का आकार इतना बड़ा है और इनकी जल भंडारण क्षमता इतनी ज्यादा है कि वे तब की पानी की जरूरत से काफी बड़े थे। गौरतलब है कि बीसवी सदी में अंग्रेज अफसरों ने अपने दस्तावेजों में इन तालाबों को कई बार वाटर शीट यानी पानी की चादर कहा है।

दुनिया के दूसरे देशों में पानी के जरिए गर्मी या लू से बचाव के उदाहरण कम नहीं हैं। पिछले साल जब पूरे विश्व में कई जगह गर्मी के पुराने रिकॉर्ड टूट गए थे, तब फ्रांस जैसे कई देशों की सरकारों ने शहर के बीच में छोटे-छोटे अस्थायी जलाशय बनाए थे। सड़क के किनारे की जगहों और पट्टियों में पानी भरा गया था। कई फव्वारे और जल पट्टियां जो सिर्फ सौंदर्यीकरण के लिए थीं, वे आम जनता के इस्तेमाल के लिए खोल दी गई थीं। पिछले साल फ्रांस के कई इलाकों की तस्वीरें आई थीं, जिनमें लोग पानी में पैर डाले दिखाई दे रहे थे। वे जहां-तहां पानी में डुबकी लगा रहे थे।

प्राकृतिक रूप से तापमान कम करना हमारे लिए भले मुमकिन न हो, लेकिन बड़े शहरों में महोबा जैसी पानी की चादरें बिछा देना मुश्किल काम नहीं है। खासतौर पर ऐसा सोचना तब और ज्यादा उपयोगी हो सकता है जब देश भूजल के गिरते स्तर का भी सामना कर रहा हो। चाहे देश या प्रदेशों की राजधानियां हों या दूसरे बड़े नगर महानगर, वहां अगर तालाबों में बारिश का पानी भर कर रखने का इंतजाम हो तो भूजल स्तर गिरने की समस्या तो कम होगी ही, साथ ही पत्थर के जंगल बनते जा रहे शहरों को ठंडा रखने का इंतजाम भी हो सकता है।

कोई सवाल उठा सकता है कि लू और झुलसाती गर्मी से बचाव के लिए भारी-भरकम खर्च वाली तालाबों की यह व्यवस्था आर्थिक रूप से व्यावहरिक नहीं है। इसका जबाव नगर नियोजन और वास्तुकारों से लिया जा सकता है। जिस बेदर्दी से भू उपयोग को सघन किया जा रहा है, उसे देखते हुए आज नहीं तो कल, हमें सोचना ही पड़ेगा कि रिहाइशी इलाकों में आबादी का घनत्व कम कैसे किया जाए। हाल फिलहाल करोना विश्व को जैसा पाठ पढ़ा रहा है, उसमें पहला सबक यही है कि ज्यादा सट कर न बसा जाए।

बहुत संभव है कि निकट भविष्य के वास्तुकार और नगर नियोजक भी इस तरह सोचने को मजबूर हो जाएं कि भूदृश्य सिर्फ सौंदर्य की वस्तु नहीं है, बल्कि उसका कोई उपयोगी पक्ष भी देखा जाना चाहिए। वास्तुकार अगर पानी की चादर का उपयोगी पक्ष देखेंगे तो उसके सौदर्यशास्त्र को वे नकार नहीं पाएंगे। वैसे भी अभी वास्तुशिल्पी गुंजाइश मिलते ही छोटे छोटे फव्वारे लगवाते हैं। उसकी बजाय उससे ज्यादा बड़ी जल संरचनाएं बनवाने का उपाय आजमा कर क्यों नहीं देखा जा सकता। नगरों, महानगरों और राजधानियों के बीचों बीच तालाबों की व्यवस्था सिर्फ उन्हें ठंडा रखने में ही नहीं, बल्कि जल प्रबंधन में भी बड़ी भूमिका निभा सकती है।

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 राजनीति: नशे के बढ़ते खतरे
2 राजनीतिः चिकित्सा के वैकल्पिक माध्यम
3 राजनीति: बचाना होगा तालाबों को