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राजनीतिः आइंस्टीन की अवधारणा का सच

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में आइंस्टीन की कृतियों और विचारों ने न केवल भौतिकी की धारणा में आमूल क्रांति ला दी, बल्कि उनसे रीति-विधान तथा ज्ञान मीमांसा के भी ऐसे नए सिद्धांत कायम हुए, जो प्राकृतिक-विज्ञानों के क्षेत्र में वर्तमान और भावी अनुसंधान के लिए बुनियादी महत्त्व रखते हैं।
Author February 18, 2016 04:09 am
आइंस्टीन

बीसवीं सदी के महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन के सिद्धांत आज भी प्रयोगों की कसौटी पर खरे उतर रहे हैं। दुनिया उनकी गुरुत्वाकर्षण और ब्रह्मांड संबंधी मान्यताओं को सौ साल बाद इक्कीसवीं सदी में भी सही सिद्ध होती हुई देख रही है। पिछले दिनों वैज्ञानिकों ने आइंस्टीन की दो धारणाओं के पक्ष में ठोस प्रयोगिक निष्कर्ष निकाले हैं। लगभग पचास बरस से वैज्ञानिक ऐसा प्रयोग करने की कोशिश कर रहे थे, जिससे गुरुत्वाकर्षण से संबंधित आइंस्टीन का एक सिद्धांत सिद्ध हो सके।
सौ साल पहले आइंस्टीन ने गुरुत्वीय तरंगों के अस्तित्व की भविष्यवाणी की थी। हालांकि इस बारे में कोई प्रायोगिक निष्कर्ष मौजूद नहीं था। अब लुसियाना स्थित उन्नतशील ‘लिगो डिटेक्टर’ ने अंतरिक्ष में ऐसे संकेतों को पहचाना और दर्ज किया है, जिनसे गुरुत्वीय तरंगों के अस्तित्व की पुष्टि होती है। इतिहास में पहली बार लिगो साइंटिफिक कोलाबरेशन के वैज्ञानिकों ने इन तरंगों से पैदा होनी वाली लहरों को सीधे तौर पर अनुभव किया।
गुरुत्वीय तरंगें अंतरिक्ष में होने वाले खिंचाव की माप हैं। ये बड़े पिंडों की गतियों के ऐसे प्रभाव को दर्शाती हैं, जो अंतरिक्ष और समय की संरचना को स्पष्ट करते हैं। इन तरंगों के जरिए अंतरिक्ष और समय को एक साथ देखा जा सकता है। ये प्रकाश की गति से चलती हैं। इन्हें रोका या बाधित नहीं किया जा सकता है। इससे एक नए विज्ञान गुरुत्वाकर्षण खगोल शास्त्र का जन्म हुआ है।
आइंस्टीन ने गुरुत्वीय तंरगों के अस्तित्व की भविष्यवाणी की थी और यह भी कहा था कि वैज्ञानिकों का इसे पकड़ पाना असंभव होगा। ब्रिटिश विज्ञानी प्रोफेसर रोनाल्ड ड्रेवर का योगदान इस खोज में सबसे अहम इसलिए है कि अमेरिका स्थित लुसियाना में जिस प्रयोगशाला लिगो (द लेजर इंटरफेरोमीटर गे्रविटेशनल वेव आॅब्जरवेटरी) में गुरुत्व तरंगों को पहचाना और दर्ज किया गया, उसकी स्थापना में उनका विशेष योगदान रहा। इस खोज में भारत सहित सोलह देशों के वैज्ञानिकों ने योगदान किया। 1.3 अरब वर्ष पहले दो ब्लैक होलों की टक्कर से उत्पन्न गुरुत्व तरंगें पिछले वर्ष 14 सितंबर को लिगो वेधशाला में पहचानी और दर्ज की गई थीं।
आइंस्टीन का सामान्य सापेक्षिता का सिद्धांत गुरुत्व के ढांचे की व्याख्या करता है। इसी से ब्लैकहोल के अस्तित्व का पता चलता है और ब्रह्मांड के निर्माण के रहस्य भी इससे खुलते हैं। ब्रह्मांड अंतरिक्ष और काल की चार दिशाओं में फैला हुआ है। अंतरिक्ष काल की गुरुत्वीय तरंगों को पकड़ने के लिए एक सेंटीमीटर के अरबवें हिस्से तक नापने वाली मशीन का निर्माण किया गया। कई दशकों की मेहनत और शोध के बाद यह संभव हो पाया।
आइंस्टीन का मत था कि अंतरिक्ष और काल में सारा ताना-बाना इन्हीं गुरुत्वीय तरंगों का बुना हुआ है। आइंस्टीन का सिद्धांत यह है कि काल और अंतरिक्ष (टाइम ऐंड स्पेस) में किसी भी भारी पिंड की वजह से जो झोल पड़ जाता है, वही गुरुत्वाकर्षण है, जैसे किसी कपड़े में कोई गेंद डाल दी गई हो। इसी सिद्धांत का एक हिस्सा यह है कि चूंकि ब्रह्मांडीय पिंड, सितारे, ग्रह वगैरह लगातार घूमते रहते हैं, इसलिए उनके आसपास का गुरुत्वाकर्षण कुछ लहरदार होना चाहिए। इस सिद्धांत को साबित करने के लिए वैज्ञानिक ऐसे उपकरण बनाने की कोशिश में थे, जो गुरुत्वाकर्षण में इन सिलवटों या खिंचावों को नाप सके। ये उपकरण बेहद सही और सूक्ष्म जांच करने वाले होने चाहिए। बरसों की मेहनत के बाद जो आंकड़े इकट््ठे किए गए, उनसे यह निष्कर्ष निकला कि पृथ्वी के आसपास सचमुच गुरुत्वाकर्षण में अनियमित सिलवटें पाई जाती हैं।
आइंस्टीन के सिद्धांतों में ‘डार्क एनर्जी’ की भी जगह थी, हालांकि वह खुद इसके बारे में सशंकित थे। वे इसे अपनी एक ‘ब्लंडर’ मानते थे। ‘डार्क एनर्जी’ ऐसी अनजानी ऊर्जा है, जिसकी वजह से ब्रह्मांड तेजी से फैल रहा है और आकाशीय पिंड एक-दूसरे से दूर जा रहे हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि हमारे ब्रह्मांड का सत्तर प्रतिशत इससे बना है, हालांकि यह ऊर्जा क्या है किसी को नहीं पता। कई वैज्ञानिक हजारों-लाखों प्रकाशवर्ष दूर की आकाश गंगाओं का अध्ययन करके डार्क एनर्जी और इसके गुणों को जांचने की कोशिश कर रहे हैं। जो तथ्य और आंकड़े मिले हैं, उनसे साबित होता है कि जिसे आइंस्टीन ‘ब्लंडर’ मानते थे, वह भी उनकी प्रतिभा का एक कमाल था जो आज सच साबित हो रहा है।
कुछ वर्ष पहले उनके सिद्धांत की पुष्टि के लिए अमेरिका की ‘नेशनल रेडियो स्ट्रॉनामिकल आब्जर्वेटरी’ ने वृहस्पति ग्रह से पृथ्वी की ओर आती एक प्रकाश किरण की गति और उसके मार्ग की नाप-जोख की। तब यह देखा गया कि यह प्रकाश (जो लाखों प्रकाश वर्ष दूर स्थित एक क्वासर तारे से चला था) जब वृहस्पति के पास से गुजर रहा था तो उसने अपनी दिशा बदल दी और पृथ्वी की ओर मुड़ गया। आइंस्टीन ने कहा था कि पदार्थ और ऊर्जा दोनों एक ही हैं। इसलिए जब कोई किरण किसी ग्रह के पास से गुजरती है तो ग्रह के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण उसकी दिशा बदल जाती है। इस प्रयोग से उनकी यह बात सिद्ध हो गई है।
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में आइंस्टीन की कृतियों और विचारों ने न केवल भौतिकी की धारणा में आमूल क्रांति ला दी, बल्कि उनसे रीति-विधान तथा ज्ञान मीमांसा के भी ऐसे नए सिद्धांत कायम हुए, जो प्राकृतिक-विज्ञानों के क्षेत्र में वर्तमान और भावी अनुसंधान के लिए बुनियादी महत्त्व रखते हैं। उनकी बुनियादी खोजों ने आधुनिक भौतिक द्वंद्वात्मक विश्व-दृष्टिकोण के विकास पर भी जबर्दस्त प्रभाव डाला है। लेकिन इसके बावजूद अलबर्ट आइंस्टीन हमारे युग के केवल महान भौतिकविद नहीं थे, वे एक प्रतिबद्ध मानवतावादी और सामाजिक नैतिकता को मानने वाले थे।
अल्बर्ट आइंस्टीन पहले एक बुर्जुआ शांतिवादी थे, लेकिन साम्राज्यवादी प्रथम विश्व युद्ध के बाद वे जर्मन मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी आंदोलन के निकट आए। जब जर्मनी में फासीवादी तानाशाही कायम की गई तो वे उन प्रथम शांतिवादियों में से एक थे, जिन्होेंने शांति के संघर्ष के बारे में नए सिरे से विचार करने की जरूरत समझी। वे एक उदार शांतिवादी से बदल कर लड़ाकू फासिस्ट विरोधी बन गए। दूसरे विश्व युद्ध के बाद वे शांति और शांतिपूर्ण सहजीवन के सक्रिय समर्थक बने। इसका कारण था आज के प्राकृतिक विद्वानों, खासकर नाभिकीय भौतिकी में आज की तकनीकी प्रगति के (भयावह) नतीजों की जानकारी और उनका पूर्ण ज्ञान।
विज्ञान के क्षेत्र में किस वैज्ञानिक का स्थान सर्वोच्च है यह विवाद का विषय हो सकता है, लेकिन यह सत्य है कि जैसा आघात भौतिकी और दर्शन पर न्यूटन की खोजों के कारण हुआ था, उससे भी शक्तिशाली आघात आइंस्टीन के ‘आपेक्षिकता सिद्धांत’ ने किया है। एक शताब्दी पूर्व उन्होंने आपेक्षिकता सिद्धांत की जो व्याख्या की थी उससे सारा संसार स्तब्ध रह गया था। उनके सिद्धांत के परिपे्रक्ष्य में मनुष्य को काल और दूरी की दृष्टि से अपनी कल्पना को इतनी दूर तक ले जाना पड़ता है, जिसकी पिछले जमाने में कोई मिसाल नहीं मिलती है। 1905 में आइंस्टीन ने जब अपना विशिष्ट आपेक्षिकता का सिद्धांत प्रकाशित किया, तब भौतिकी में स्थिरता आ गई थी।
सर आइजक न्यूटन के दिक-काल (स्पेस ऐंड टाइम) से संबद्ध यांत्रिकी के नियम नई-नई समस्याओं का जवाब नहीं दे पा रहे थे। ये समस्याएं नए-नए प्रयोगों के कारण उठ रही थीं। पर आइंस्टीन के सिद्धांत से अनेक समस्याएं हल हो गर्इं। उनके सिद्धांतों ने ऐसा आधार तैयार किया, जिससे विस्तारशील ब्रह्मांड का सिद्धांत प्रतिपादित हुआ। इस ‘बिग-बैंग’ सिद्धांत के अनुसार हमारा ब्रह्माण्ड दस अरब वर्ष पहले एक महाविस्फोट से बना।
आइंस्टीन ने अपने आपेक्षिकता के सिद्धांत से पदार्थ और ऊर्जा को एक सूत्र से संबद्ध कर दिया, जबकि इससे पूर्व पदार्थ ऊर्जा को एक-दूसरे से सर्वथा भिन्न सत्ता के रूप में माना गया था। उनके इस सूत्र के आधार पर ही परमाणु ऊर्जा के रहस्य का उद्घाटन हो सका। उनका यह सूत्र आपेक्षिकता के विशिष्ट सिद्धांत का परिणाम है। मैक्स बोर्न नामक भौतिक शास्त्री ने आइंस्टीन के विषय में कहा है, मेरी राय में अगर आइंस्टीन आपेक्षिकता पर एक पंक्ति भी नहीं लिखते तो भी वे भौतिकशास्त्र के बहुत बड़े सिद्धांतवादी होते।
अन्य भौतिकशास्त्रियों का कहना है कि आइंस्टीन का आपेक्षिकता के सिद्धांत से भी अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य ‘क्वांटम सिद्धांत का विकास’ है। आपेक्षिकता के सिद्धांत ने प्रकृति के उन तत्त्वों का भी सूक्ष्म विवेचन बड़ी कुशलता से किया, जिनकी ओर पहले के वैज्ञानिकों का ध्यान ही नहीं गया था। उनकी खोज के फलस्वरूप विज्ञान में जो प्रगति हुई है वह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। उनका विश्वास था कि गुरुत्वाकर्षण बल, विद्युत चुंबकीय बल और नाभिकीय बल मूलत: भिन्न नहीं हैं, जबकि ये विभिन्न रूप से भौतिक विज्ञान में व्यक्त किए जाते हैं। आइंस्टीन ने अपने अंतिम तीस वर्ष ऐसे ही ‘एकीकृत क्षेत्र सिद्धांत’ का निर्माण करने के प्रयत्न में बिताए, पर उन्हें इसमें सफलता नहीं मिल पाई। उनका जन्म जर्मनी के उल्म में 14 मार्च, 1879 को हुआ था। 18 अप्रैल, 1955 को छिहत्तर वर्ष की आयु में इस संसार से वे विदा हो गए।

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  1. A
    amit yadav
    Feb 18, 2016 at 6:42 am
    2 smart phone pls
    (0)(0)
    Reply