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राजनीति: जानलेवा बनता सूक्ष्म प्लास्टिक

लाल व श्वेत रक्त कोशिकाओं के संपर्क में आने के बाद माइक्रो व नैनो प्लास्टिक एक विशेष प्रकार की रासायनिक प्रक्रिया उत्पन्न करते हैं, जिससे रक्त कोशिकाएं मर जाती हैं और इनके मरने के बाद यह जहर धीरे-धीरे शरीर में अन्य कोशिकाओं को भी मारता जाता है।

Author Updated: January 13, 2021 4:14 AM
plasticसांकेतिक फोटो।

योगेश कुमार गोयल

माइक्रो प्लास्टिक और नैनो प्लास्टिक के खतरों पर भारत सहित कई देशों में अध्ययन हो रहे हैं। ऐसे ही अध्ययनों के नतीजों में पाया गया है कि प्लास्टिक के अत्यंत सूक्ष्म कण मानव शरीर के लिए जानलेवा बनते जा रहे हैं, जो शरीर में जमा हो कर रक्त प्रवाह में बाधा उत्पन्न करते हैं। कुछ समय पूर्व अमेरिकन केमिकल सोसायटी के एक अध्ययन में ऐसे सैंतालीस नमूनों की जांच करने पर वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक संदूषण पाया था। अध्ययन में फेफड़ों, यकृत, गुर्दे आदि से लिए गए नमूनों में माइक्रो प्लास्टिक और नैनो प्लास्टिक मिला था। इन सभी नमूनों में बीपीए (बिस्फेनॉल ए) रसायन भी पाया गया, जिसका इस्तेमाल तमाम स्वास्थ्य चिंताओं के बावजूद खाद्य पैकेजिंग में किया जा रहा है।

हाल में ‘एनवायरमेंट इंटरनेशनल’ पत्रिका में छपे एक शोध में इस बात का खुलासा हुआ है कि पृथ्वी के प्रत्येक कोने तक पहुंच चुका माइक्रो प्लास्टिक पहली बार अजन्मे शिशुओं के नाल में भी मिला है। अजन्मे बच्चे की नाल का निर्माण गर्भवस्था के दौरान गर्भाशय में होता है और इस नाल के जरिये ही बच्चे को पेट के अंदर आॅक्सीजन और भोजन मिलता है व अपशिष्ट पदार्थ बाहर निकलते हैं। अजन्मे बच्चे की नाल तक माइक्रो प्लास्टिक का पहुंचना असाधारण चिंता का विषय है।

इस शोध के दौरान अठारह से चालीस वर्ष आयु की छह महिलाओं में गर्भनाल का विश्लेषण करने पर चार में माइक्रो प्लास्टिक के कण मिले थे। महिलाओं में पांच से दस माइक्रोन आकार के बारह माइक्रो प्लास्टिक के टुकड़े मिले, जिनमें से पांच टुकड़े भ्रूण में और चार माताओं के शरीर में और तीन कोरियोएम्नियोटिक झिल्ली में पाए गए।

नाल में मिले माइक्रो प्लास्टिक सिंथेटिक यौगिकों से युक्त थे और इन बारह टुकड़ों में से नौ टुकड़ों में सिंथेटिक पेंट सामग्री थी, जिसका इस्तेमाल क्रीम, मेकअप या नेलपॉलिश बनाने में होता है और तीन की पहचान पॉलीप्रोपाइलीन के रूप में की गई, जिसका प्रयोग प्लास्टिक की बोतलें बनाने में किया जाता है। हालांकि शोधकर्ताओं ने नाल के केवल चार फीसद हिस्से का ही अध्ययन किया था। दस माइक्रोन तक के ये सभी कण आसानी से रक्त के जरिए बच्चे के शरीर में जा सकते थे। शोधकर्ताओंं के मुताबिक ये कण मां की सांस और मुंह के जरिए ही भ्रूण में पहुंचे होंगे।

वैज्ञानिकों का मानना है कि माइक्रो प्लास्टिक कण ऐसे जहरीले पदार्थों के संवाहक के रूप में कार्य कर सकते हैं, जो बच्चे की प्रतिरोधक प्रणाली को नुकसान पहुंचा सकते हैं और इस कारण उनमें रोगों से लड़ने की क्षमता घट सकती है। माइक्रो प्लास्टिक कणों में पैलेडियम, क्रोमियम, कैडमियम जैसी जहरीली भारी धातुएं शामिल होती हैं।

प्लास्टिक का यह प्रदूषण बेहद खतरनाक इसलिए है, क्योंकि ये कण इतने सूक्ष्म होते हैं, जिन्हें सामान्य आंखों से देख पाना संभव नहीं है। प्लास्टिक के ये कण बड़ी आसानी से रक्त के जरिये शरीर में पहुंच सकते हैं। प्लास्टिक के एक माइक्रोमीटर से पांच मिलीमीटर के टुकड़ों को माइक्रो प्लास्टिक कहा जाता है। इन सूक्ष्म कणों के बढ़ते खतरे को इसी से समझा जा सकता है कि माइक्रो प्लास्टिक अब पृथ्वी पर हर जगह मिलने वाले कणों में से एक हैं। दुनिया के सबसे ऊंचे ग्लेशियर हों या गहरे समुद्र, हर जगह प्लास्टिक ये अतिसूक्ष्म कण मौजूद हैं।

कुछ समय पूर्व एक शोध में यह तथ्य सामने आया था कि वर्षभर में हर मनुष्य में करीब दस हजार माइक्रो या नैनो प्लास्टिक के टुकड़े भोजन या पेय पदार्थों या सांस के जरिए शरीर में पहुंच जाते हैं। कनाडा के वैज्ञानिकों ने भी अपने एक शोध के दौरान माइक्रो प्लास्टिक की मौजूदगी को लेकर आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पाया था कि सालभर में एक व्यस्क व्यक्ति माइक्रोप्लास्टिक के करीब बावन हजार टुकड़े केवल भोजन और पानी के जरिए ही शरीर में पहुंचा चुका होता है और अगर इसमें वायु प्रदूषण को भी शामिल कर लिया जाए तो प्रतिदिन करीब तीन सौ बीस यानी सालभर में सवा लाख माइक्रो प्लास्टिक के टुकड़े खान-पान और सांस के जरिये शरीर में समा सकते हैं। यह भी सामने आ चुका है कि बोतलबंद पानी में भी प्लास्टिक के ये सूक्ष्म कण मौजूद रहते हैं।

ब्रिटेन में हैरियट वॉट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता भी अपनी एक रिपोर्ट में खुलासा कर चुके हैं कि हम हर बार जब भी खाना खाने बैठते हैं तो भोजन के साथ सौ से भी ज्यादा सूक्ष्म कण हमारे पेट में पहुंच जाते हैं। दरअसल एक बार इन शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में इस्तेमाल होने वाली पैंट्री डिश में प्लास्टिक के सूक्ष्म कण देखे तो उन्होंने विचार किया कि प्रयोगशाला की पैंट्री डिश में अगर प्लास्टिक के इतने सूक्ष्म कण हैं तो घर में भोजन की थाली में ऐसे कितने कण होते होंगे, जो अपेक्षाकृत इससे बड़ी होती है।

यही जानने के लिए उन्होंने भोजन की थाली में प्लास्टिक के सूक्ष्म कणों की मौजूदगी का पता लगाने के लिए शोध किया और पाया कि भोजन की एक बड़ी थाली में औसतन प्लास्टिक के एक सौ चौदह सूक्ष्म कण होते हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में एक व्यक्ति प्रतिवर्ष इसी प्रकार भोजन के जरिये प्लास्टिक के 68415 सूक्ष्म कण निगल लेता है।

प्लास्टिक के ये सूक्ष्म कण आज हर जगह मौजूद हैं, चाहे वह दरी या कालीन हों, कुर्सी, सोफा और यहां तक कि हमारे कपड़ों में भी इन कणों की मौजूदगी हो सकती है, जिन्हें हम देख नहीं पाते और न चाहते हुए भी ये सांस के जरिये हमारी दैनिक खुराक का हिस्सा बनते रहते हैं।

कार के टायरों, निर्माण मलबे और सौंदर्य प्रसाधन सामग्री में मौजूद रबर के घर्षण से भी माइक्रो प्लास्टिक आ सकता है। पेय पदार्थों की बोतलों और प्लास्टिक की टूटी-फूटी थैलियों से माइक्रो और नैनो प्लास्टिक दुनिया के हर कोने में पर्यावरण को दूषित करने के जिम्मेदार पाए गए हैं। मानव शरीर पर इनके प्रभावों को जानने के लिए दुनियाभर में इस पर गहन शोध हो रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इनके दुष्प्रभावों के शुरुआती संकेत तो यही हैं कि प्लास्टिक रसायनों या कणों के कारण होने वाली सूजन से पाचन अंगों को नुकसान हो सकता है।

हम कितनी भी सावधानी बरतें, लेकिन हवा में तैरते प्लास्टिक के ये सूक्ष्म कण सांस के जरिये अपने भीतर प्रवेश करने से हम नहीं रोक सकते। वैज्ञानिकों का कहना है कि माइक्रो प्लास्टिक को इंसान के शरीर में जाने से रोकने के लिए सबसे बेहतर और कारगर तरीका सिर्फ यही है कि प्लास्टिक का निर्माण और उपयोग न्यूनतम किया जाए।

माइक्रो प्लास्टिक के कण हवा और भोजन के अलावा लिपिस्टिक, शैंपू और पानी की बोतलों के जरिये भी हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं और खून के प्रोटीन के साथ चिपकते जाते हैं, जिससे शरीर में रक्त प्रवाह रुकने लगता है और रक्त में मौजूद प्रोटीन काम करना बंद कर देते हैं। शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि लाल व श्वेत रक्त कोशिकाओं के संपर्क में आने के बाद माइक्रो व नैनो प्लास्टिक एक विशेष प्रकार की रासायनिक प्रक्रिया उत्पन्न करते हैं, जिससे रक्त कोशिकाएं मर जाती हैं और इनके मरने के बाद यह जहर धीरे-धीरे शरीर में अन्य कोशिकाओं को भी मारता जाता है।

अमेरिकन केमिकल सोसायटी के चार्ल्स रोलस्की कहते हैं कि आप अब दुनिया के हर स्थान पर प्लास्टिक को पर्यावरण को दूषित करते हुए पा सकते हैं और कुछ ही दशकों में हम प्लास्टिक को एक अद्भुत लाभ के रूप में देखने के बजाय बड़े खतरे के रूप में देखने लगे हैं।

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