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राजनीतिः संकट में वैज्ञानिक नजरिया

प्रारंभिक विज्ञान में भौतिक, रसायन और जीव विज्ञान विषय की मूलभूत अवधारणाओं को शामिल किया जाता है। जीव विज्ञान में विद्यार्थी जंतुओं में श्वसन का अध्ययन करते हैं। ऐसा कहीं पर विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में नहीं लिखा है कि श्वसन में गाय या कि कोई और जीव आक्सीजन छोड़ता है। विज्ञान विषय का मकसद विद्यार्थियों में वैज्ञानिक नजरिए को विकसित करना है।

Author January 25, 2017 3:01 AM

कालू राम शर्मा

राजस्थान के शिक्षामंत्री ने हाल ही में बयान दिया है कि गाय सांस में आक्सीजन लेती है और आक्सीजन छोड़ती है। क्या यह वैज्ञानिक कसौटी पर सच है? गाय को लेकर आस्था होना एक पहलू है, मगर अवैज्ञानिक तथ्यों की बात करना कहां तक उचित है? एक तरफ हम वैज्ञानिक नजरिए की दुहाई देते नहीं थकते, वहीं दूसरी ओर अवैज्ञानिक हुए जा रहे हैं। जबकि भारतीय संविधान आम जन में वैज्ञानिक नजरिए को विकसित करने की बात करता है। भारत के स्कूली शिक्षातंत्र में छठी कक्षा से विज्ञान की शिक्षा विधिवत रूप से प्रारंभ होती है। प्रारंभिक विज्ञान में भौतिक, रसायन और जीव विज्ञान विषय की मूलभूत अवधारणाओं को शामिल किया जाता है। जीव विज्ञान में विद्यार्थी जंतुओं में श्वसन का अध्ययन करते हैं। ऐसा कहीं पर विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों में नहीं लिखा है कि श्वसन में गाय या कि कोई और जीव आक्सीजन छोड़ता है। विज्ञान विषय का मकसद विद्यार्थियों में वैज्ञानिक नजरिए को विकसित करना है। आइए, इस पर विचार करें कि आखिर क्या गाय आक्सीजन लेती है और आक्सीजन छोड़ती है? दरअसल गाय, बिल्ली, बकरी, सांप, चिड़िया, बंदर, इंसान आदि, ये सब के सब न तो आक्सीजन लेते हैं और न ही आक्सीजन छोड़ते हैं। इसे समझने की जरूरत है। जब हम कहते हैं कि हम सांस लेते हैं तो हम नाक के द्वारा हवा लेते हैं और हवा ही छोड़ते हैं। इस दिलचस्प मामले को हम और थोड़ा विस्तार से समझते हैं।

वास्तव में वातावरण की हवा के संघटन को देखें तो पता चलता है कि हवा में आक्सीजन की प्रतिशत मात्रा 20.9, नाइटोजन 78.1, कार्बन डाइआक्साइड 0.03 और अक्रिय गैसें 0.94 होती हैं। जब हम सांस लेते हैं तो हवा का यह मिश्रण नाक के जरिए फेफड़ों में जाता है। सजीव जगत में कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है जिसकी नाक हवा में से आक्सीजन को छान कर ले सके। यह काम तो फेफड़े या गलफड़े ही कर सकते हैं। या यों कहें कि हमारी नाक में यह क्षमता नहीं होती कि वह हवा में से आक्सीजन को अलग कर उसे ग्रहण कर सके। लिहाजा, नाक के जरिए गाय भी सांस अंदर खींचती है और फेफड़ों में हवा जाती है जहां फेफड़े हवा में से आक्सीजन को ग्रहण करते हैं और बदले में कार्बन डाइआक्साइड छोड़ देते हैं।
हम जो सांस छोड़ते हैं उसमें आक्सीजन का प्रतिशत कम हो जाता है। हवा में से आक्सीजन फेफड़े लेते तो हैं मगर पूरी की पूरी आक्सीजन नहीं ले पाते। लगभग पांच प्रतिशत ही लेते हैं और उस हवा में कार्बन डाइआक्साइड की लगभग चार प्रतिशत मात्रा छोड़ते हैं। इस प्रकार से सांस में छोड़ी जाने वाली हवा में कार्बन डाइआक्साइड की प्रतिशत मात्रा 0.3 प्रतिशत से बढ़ कर 4 प्रतिशत हो जाती है। यह बात अमूमन सभी स्तनधारियों पर लागू होती है। गाय एक स्तनधारी है और उसके द्वारा छोड़ी गई सांस और ली गई सांस में आक्सीजन की प्रतिशत मात्रा उल्लिखित ही होगी। इस आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि गाय आक्सीजन लेती है और आक्सीजन छोड़ती है। यहां यह जिक्र करना प्रासंगिक होगा कि हम जो हवा छोड़ते हैं उसमें आक्सीजन की प्रतिशत मात्रा काफी होती है। इसीलिए चिकित्सा शास़्त्र कहता है कि अगर किसी को सांस की तकलीफ हो तो उसे माउथ-टू-माउथ रेस्पिरेशन देना जीवनदान दे सकता है।

बहरहाल, यह तथ्य विज्ञान में आमतौर पर विद्यार्थी हाई स्कूल तक आते-आते पढ़ लेते हैं और इस मामले में वे सामान्यीकरण भी कर लेते हैं। वैसे जीव विज्ञान में कहीं-कहीं अपवाद भी मिलते हैं, मगर गाय के मामले में ऐसा कोई अपवाद नहीं है कि वह श्वसन की प्रक्रिया में आक्सीजन बनाती है। जब हम कहते हैं कि श्वसन की प्रक्रिया हो रही है तो फिर आक्सीजन के निर्माण की बात गलत की श्रेणी में भी नहीं आती। यह तथ्य बेसिर-पैर का है। गाय एक स्तनधारी प्राणी है जो पूर्णतया शाकाहारी या कहें कि घासाहारी है। गाय की जैविकीय प्रकियाएं अनेक विचित्रताएं लिए हुए है जिसमें उसका जुगाली करना एक है। यहां स्पष्ट करने की जरूरत है कि गाय ही क्या, कोई भी जीव, चाहे वह जंतु हो या वनस्पति, श्वसन में आक्सीजन नहीं छोड़ता। वास्तव में, श्वसन की प्रक्रिया में भोजन का आक्सीकरण यानी कि दहन होता है जिसमें कि ऊर्जा शरीर को मिलती है। भोजन का दहन आक्सीजन की मौजूदगी में होता है और कार्बन डाइआक्साइड मुक्तहोती है।

पीपल के बारे में भी कह दिया जाता है कि यह रात में भी आक्सीजन छोेड़ता है। उल्लेखनीय है कि वनस्पतियों में दिन में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया होती है जिसमें आक्सीजन का निर्माण होता है। मगर श्वसन की प्रक्रिया तमाम जीवधारियों में एक जैसी ही होगी। पीपल अगर दिन में आक्सीजन छोड़ता है तो यह प्रकाश संश्लेषण का परिणाम है। वैसे दिन में पीपल में श्वसन की क्रिया भी साथ-साथ चलती है जिसमें कार्बन डाइआक्साइड बनती है। हां, रात में चूंकि प्रकाश संश्लेषण की क्रिया नहीं चलती, इस वजह से आक्सीजन नहीं बनती है। इस दौरान केवल श्वसन की क्रिया होगी और वह कार्बन डाइआक्साइड ही मुक्त करेगा। अगर हम इंटरनेट के जंगल में घुसें तो हमें इस प्रकार की मान्यताओं को बल देने वाली पोस्ट मिलती है। पीपल के बारे में इंटरनेट की एक साइट पर बताया गया है कि पीपल का वृक्ष दुनिया का सबसे ज्यादा मात्रा में आक्सीजन छोड़ने वाला पेड़ है जो कि कार्बन डाइआक्साइड लेकर प्राणवायु छोड़ता है। पीपल समेत अमूमन समस्त वनस्पति की बात की जाए तो इनमें एक अनूठी प्रक्रिया होती है जिसे हम प्रकाश संश्लेषण के नाम से जानते हैं। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया में वनस्पति वातावरण से कार्बन डाइआक्साइड सोखती है और बदले में आक्सीजन छोड़ती है। पीपल को लेकर यह कहना कि यह श्वसन में आक्सीजन छोड़ता है, निराधार है।
यह विडंबना ही है कि शिक्षातंत्र में भी इन मान्यताओं को जांचने की गुंजाइश विज्ञान शिक्षण नहीं दे पा रहा है। विज्ञान शिक्षण में विद्यार्थी महज तथ्यों, सूत्रों और समीकरणों आदि को रटते रहते हैं।

जब मध्यप्रदेश में होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम चलाया जा रहा था तब की एक घटना याद आती है। घटना यह थी कि बरसात के दिनों में पत्तियों पर नाग-नागिन की आकृतियां उभर रही थीं। बड़ी सहजता के साथ इस घटना को जोड़ दिया गया कि कहीं पर नाग-नागिन का जोड़ा सड़क दुर्घटना में मारा गया और वह अब पत्तियों पर उभर रहा है। इस घटना का पदार्फाश वैज्ञानिक नजरिए से मिडिल स्कूल की छात्राओं द्वारा किया गया। दरअसल, वह एक कृमि है जो पत्तों के हरे पदार्थ को खाता है और वृद्धि करता जाता है। भारत में गणेशजी द्वारा दूध पीने की घटना पर भी मिडिल स्कूल के बच्चों द्वारा काम किया गया और पाया गया कि यह तो विज्ञान के कुछ नियमों के तहत होता है।
उल्लेखनीय है कि होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण एक ऐसा कार्यक्रम बन कर उभरा था जिसने सरकारी स्कूली तंत्र में मिडिल स्कूल के बच्चों को वैज्ञानिक प्रक्रिया से गुजरने के भरपूर अवसर दिए और वे वैज्ञानिक नजरिए से मान्यताओं और घटनाओं को देखते थे। जहां बच्चे स्वयं ही प्रयोग करते थे और निष्कर्ष निकालते थे। बच्चों को प्रयोगों के निष्कर्ष सीधे-सीधे बता देने के बजाय उन्हें निष्कर्ष निकालने को प्रेरित किया जाता था। कार्यक्रम को मध्यप्रदेश सरकार ने पैसा बंद कर दिया। जो कार्यक्रम विद्यार्थियों में वैज्ञानिक नजरिए के बीजारोपण का एक औजार था उसे ही सरकार उखाड़ने की कोशिश करती है!

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