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राजनीति: ज्ञान-विज्ञान की जननी संस्कृत

प्राचीन भारत के ही एक प्रसिद्ध गणितज्ञ और ज्योतिषी भास्कराचार्य द्वितीय ने गुरुत्वाकर्षण शक्ति की खोज की थी, कालांतर में जिसे पूरी दुनिया ने जाना। संस्कृत की दर्शन परंपरा में संसार में सर्वाधिक चिंतन मनन हुआ। इसी दर्शन परंपरा में महान दार्शनिक कपिलमुनि ने सांख्य दर्शन का प्रतिपादन किया। ऋषि कणाद वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक थे। उन्होंने भौतिक विज्ञान पर भी काम किया और उनका परमाणु आविष्कार प्रसिद्ध है।

Author Published on: March 17, 2020 10:46 PM
राजनीतिसंस्कृत भाषा विश्व की प्राचीनतम भाषा है। इससे कई अन्य भाषाएं निकली हैं।

रमेश पोखरियाल ‘निशंक’
संस्कृत विश्व की सबसे प्राचीन भाषा है और यह भारत की संस्कृति का मूल आधार भी है। इसीलिए संस्कृत को भारत की आत्मा कहा जाता है। यह भाषा ही समस्त भारतवर्ष को एकसूत्र में बांध कर रखती है। संस्कृत दुनिया की प्राचीनतम भाषा ही नहीं, अपितु संसार के ज्ञान-विज्ञान और अनुसंधान का अक्षय स्रोत है। जो विपुल ज्ञान भंडार संस्कृत में है, उसे देश की प्रगति और मानवता के कल्याण के लिए उपयोग में लाया जा सकता है। संस्कृत के बारे में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पुस्तक ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में लिखा कि ‘यदि कोई मुझसे पूछता है कि भारत के पास बहुमूल्य खजाना क्या है और इसके पास सबसे बड़ी धरोहर क्या है, तो मैं बेहिचक कह सकता हूं कि वह खजाना संस्कृत भाषा और उसमें निहित समस्त वांगमय है। यह एक महत्त्वपूर्ण विरासत है। यह जब तक सक्रिय रहेगी और हमारे सामाजिक जीवन को प्रभावित करेगी, तब तक भारत की आधारभूत बुद्धिमत्ता बनी रहेगी।’

संस्कृत के बारे में इंग्लैंड के विद्वान और एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल के फोर्ट विलियम के न्यायाधीश सर विलियम जोन्स ने 1786 में कहा था कि संस्कृत भाषा की प्राचीनता जो भी हो, यह एक अद्भुत संरचना है। यह ग्रीक भाषा से अधिक परिपूर्ण, लैटिन भाषा से अधिक समृद्ध और इन दोनों की अपेक्षा अधिक शुद्ध और मनोहारी है। संस्कृत भाषा के विषय में इसी प्रकार से विश्व के महान विद्वानों ने अपने उद्गार व्यक्त किए हैं और इसके ज्ञान-विज्ञान को संपूर्ण विश्व के लिए विशेष उपकारी अमूल्य धरोहर माना है।

विश्व में भारत की संस्कृत परंपरा विशिष्ट एवं प्राचीनतम है। संस्कृत की इसी परंपरा में प्राचीन भारत के विख्यात चिकित्सक आयुर्वेदाचार्य चरक ऋषि हुए, जिन्होंने ईसा के तीन सौ वर्ष पूर्व रक्त प्रभाव आदि के संबंध में अपनी विशिष्ट व्याख्याएं प्रस्तुत की हैं। इसका मतलब यह है कि सदियों पहले जो ज्ञान और विज्ञान दुनिया में फैला या ज्ञात हुआ, वह प्राचीनतम काल से हमारी संस्कृत परंपरा में विद्यमान था। विलियम हार्वे को विश्व इसका प्रथम प्रस्तोता कहता है। वैदिक युग की विशिष्ट उपलब्धि चिकित्सा के क्षेत्र में रही है। संस्कृत के आयुर्वेदाचार्यों ने शरीर का सूक्ष्म से सूक्ष्म अध्ययन अपने ग्रंथों में प्रस्तुत किया है, जिसे अभी ‘पोस्टमार्टम’ कहा जाता है। शरीर में सूक्ष्म जीवों की उपस्थित तथा रोग पैदा करने वाले आनुवंशिक कारकों के सिद्धांत का उन्हें विशिष्ट ज्ञान था। संपूर्ण दुनिया में सुश्रुत को ‘शल्य-चिकित्सा’ का जनक माना जता है। उन्होंने ही त्वचारोपण (प्लास्टिक सर्जरी) की शल्य क्रिया का विकास किया। प्राचीन भारत की जो चिकित्सा संपदा है, उसी को चरक ऋषि ने आयुर्वेद कहा है और इसी को उन्होंने अपनी ‘चरक-संहिता’ में विस्तृत रूप से प्रतिपादित किया है।

वैदिक ऋषियों द्वारा प्राकृतिक वातावरण पर विस्तृत चिंतन किया गया है, जिसमें प्रकृति संवर्धन, संरक्षण, प्रकृति के साथ समन्वय, मौसम परिवर्तन की चुनौतियां आदि विशेष सम्मिलित हैं। दुनिया में जो गणित है, जो रेखा गणित और ज्यामिति है, इसका पर्याप्त विकास सबसे पहले यदि दुनिया में हुआ तो वह वैदिक युग में भारत में हुआ। वैदिक काल के लोग खगोल-विज्ञान का पर्याप्त ज्ञान रखते थे और संस्कृत भाषा से यह ज्ञान पूरी दुनिया ने लिया। वैदिक भारतीय वैज्ञानिकों को सत्ताईस नक्षत्रों का ज्ञान था। उनमें वर्ष, महीने और दिन के रूप में समय का विभाजन करने की पूरी ताकत और क्षमता थी। आचार्य लगध नाम के ऋषि वैज्ञानिक ने लगभग 1352 ईसा पूर्व में ‘ज्योतिष वेदांग’ में तत्कालीन खगोलीय ज्ञान को व्यवस्थित किया था। भारत के प्राचीन गणितज्ञ बोधायन ने लगभग 1200 ईसा पूर्व में जिस प्रमेय की व्याख्या की है, उसको आज सारी दुनिया स्वीकार करती है। महान ज्योतिर्विद और गणितज्ञ आर्यभट्ट भी इसी धरती पर पैदा हुए और संस्कृत-संस्कृति को उन्नत किया। आर्यभट्ट ने 400 ईस्वी में दशमलव दिया।

महर्षि भारद्वाज ने विश्व में सर्वप्रथम विमान विद्याविषयक ग्रंथ की रचना की थी, जिस पर दुनिया की विशिष्ट संस्थाओं द्वारा बहुत सारे अनुसंधान और शोध किए जा चुके हैं। वैदिक काल में भारत में बीजगणित, ज्यामिति, रेखागणित, भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र और खगोल शास्त्र आदि का विकास उत्कर्ष पर था। भारत के ऋषि-मुनि और आचार्य उस समय के महान वैज्ञानिक थे। प्राचीन भारत के ही एक प्रसिद्ध गणितज्ञ और ज्योतिषी भास्कराचार्य द्वितीय ने गुरुत्वाकर्षण शक्ति की खोज की थी, कालांतर में जिसे पूरी दुनिया ने जाना। संस्कृत की दर्शन परंपरा में संसार में सर्वाधिक चिंतन मनन हुआ। इसी दर्शन परंपरा में महान दार्शनिक कपिलमुनि ने सांख्य दर्शन का प्रतिपादन किया। ऋषि कणाद वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक थे। उन्होंने भौतिक विज्ञान पर भी काम किया और उनका परमाणु आविष्कार प्रसिद्ध है। इससे प्राचीन भारतीय वैज्ञानिकों की दूरदर्शिता परिलक्षित होती है। आचार्य चाणक्य द्वारा प्रतिपादित ‘अर्थशास्त्र’ दुनिया का सर्वोत्तम ग्रंथ है, जिस पर दुनियाभर में शोध हुए और आज भी हो रहे हैं।

संस्कृत ज्ञान-विज्ञान और अनुसंधान की भाषा है। विद्वानों के मतानुसार भारत में विज्ञान का उदय लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व माना जाता है। सिंधु घाटी सभ्यता, हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई से सिंधु घाटी के लोगों की वैज्ञानिक दृष्टि और वैज्ञानिक उपकरणों के प्रयोगों के प्रमाणों से संस्कृत भाषा की प्राचीनता और समृद्धता का पता चलता है। अनेक खोजें, आविष्कार न केवल देश में, बल्कि पूरी दुनिया में संस्कृत में ही हुए हैं। संस्कृत भाषा से ही विश्व की अनेक भाषाओं की उत्पत्ति हुई है। विश्व की अधिकांश भाषाओं में संस्कृत भाषा के शब्द मिश्रित हैं, जो उनके व्यावहारिक प्रयोग को सरल करने में सहायक हैं। संस्कृत भाषा हमारी भारतीय भाषाओं को भी बहुत सशक्त करती है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 251 में स्पष्टत: उल्लेख है कि ‘हम भारतीय भाषाओं को सशक्त करेंगे और भारतीय भाषाओं के विकास और समृद्धि के लिए संस्कृत अहम भूमिका निभाएगी।’

यह संस्कृत की ही विशिष्टता और सुंदरता है कि यदि संस्कृत में ‘आकाशम’ बोलते हैं, तो हिंदी में ‘आकाश’, तेलुगु में ‘आकाशमु’ और कन्नड़ में ‘आकाशवु’ बोलते हैं। इसी प्रकार संस्कृत में यदि ‘भूमि:’ बोलते हैं, तो हिंदी, तेलुगु और कन्नड़ में भी ‘भूमि’ ही बोलते हैं। यदि संस्कृत में ‘नमस्कार:’, तो हिंदी में ‘नमस्कार’ तेलुगु में ‘नमस्कारमु’, कन्नड़ में ‘नमस्कार’ और उड़िया में भी ‘नमस्कार’ ही बोलते हैं। यदि संस्कृत में ‘प्रसाद:’ बोलते हैं, तो हिंदी में ‘प्रसाद’, तेलुगु में ‘प्रसादमु’, कन्नड़ और उड़िया में भी ‘प्रसाद’ ही बोलते हैं। इस प्रकार से सभी भारतीय भाषाओं में साठ से सत्तर फीसद तक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से संस्कृत समाहित है। उड़िया भाषा में जो क्रिया-पद हैं, वे मूलत: संस्कृत भाषा मूलक हैं। संस्कृत में यदि ‘कुर्वन्ति’ बोलते हैं, तो उसी को उड़िया में ‘करुद्धन्ति’ बोलते है। संस्कृत में यदि ‘धरन्ति’ बोलते हैं तो उड़िया में ‘धरुद्धन्ति’ बोलते हैं। संस्कृत में ‘कथयन्ति’ बोलते हैं तो उड़िया में ‘कहूद्धन्ति’ बोलते हैं। इस प्रकार अनुसंधान पूर्वक देखने पर संस्कृत भाषा का विपुल शब्द भंडार भारतीय भाषाओं में दृष्टिगोचर होता है।

संस्कृत से अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना करने पर अनेक मौलिक समानताओं को देखा जा सकता है। इस तथ्य को वैश्विक संदर्भ में देखने पर संस्कृत की अनेक पाश्चात्य भाषाओं में अंत: समानताएं ज्ञात होती हैं। तुलनात्मक भाषा विज्ञान के अध्ययन में विद्वानों ने संस्कृत की ग्रीक, लैटिन आदि भाषाओं से समानता को प्रदर्शित किया है और संस्कृत भाषा को ही तुलनात्मक भाषा विज्ञान का जनक माना है। अंग्रेजी और संस्कृत में भी की अनेक समानताएं स्पष्टत: दिखाई देती हैं, जिनके आधार पर संस्कृत से अंग्रेजी की उत्पत्ति मान सकते हैं। जैसे मां को संस्कृत में ‘मातर’ बोलते हैं तो अंग्रेजी में उसी को ‘मदर’ बोलते हैं। बेटी को संस्कृत में ‘दुहितर’ बोलते हैं, तो अंग्रेजी में ‘डॉटर’ बोलते हैं। इस प्रकार से देखा जाए, तो दुनिया की दर्जनों भाषाओं में संस्कृत का विपुल शब्द भंडार व्याप्त है।
(लेखक केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री हैं।)

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