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भगत सिंह के अधूरे सपने

भगत सिंह के तमाम विचार और उद्देश्य वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ज्यादा प्रासंगिक हो रहे हैं। सांप्रदायिक घटनाएं आए दिन समाचार पत्रों की सुर्खियां बनती हैं।

Author March 23, 2017 05:31 am
भगत सिंह की एक पेंटिंग।( Express archive photo)

केसी त्यागी

भगत सिंह से जुड़ी स्मृतियां आज भी हमें राष्ट्र के लिए कुछ कर गुजरने को प्रोत्साहित करती हंै। चौबीस वर्ष से भी कम उम्र में राष्ट्र के लिए फांसी पर चढ़ना और इससे भी अहम कि अपने बचाव के लिए दया अर्जी तक न देना उनके अदम्य साहस का परिचायक है। भगत सिंह का मानना था ‘मेरा नाम हिंदुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुरबानियों ने मुझे बहुत ऊंचा उठा दिया है- इतना ऊंचा कि जीवित रहने की स्थिति में मैं इससे ऊंचा हर्गिज नहीं हो सकता।’ फांसी के तख्ते की ओर बढ़ते समय वरिष्ठ कांग्रेसी नेता भीमसेन सच्चर द्वारा अपना बचाव न किए जाने के सवाल पर भगत सिंह का जबाव था- ‘क्रांतिकारी अपनी जान इसलिए देते हैं कि उनके उद्देश्य बलिदान से मजबूत होंगे, न कि अदालत में अपनी जान बचाने की अर्जी से।’ मतलब यह नहीं कि उनमें जीने की इच्छा समाप्त हो चुकी थी। फांसी से एक दिन पहले उन्होंने अपने साथियों के नाम पत्र लिखा था- ‘जीने की इच्छा मुझमें भी होनी चाहिए, मैं इसे छिपाना नहीं चाहता, लेकिन मैं कैद होकर या पाबंद होकर जीना नहीं चाहता।’

उनके तमाम ऐसे प्रसंगों में सबसे अहम यह कि वे साहस और बुद्धि के अत्यंत धनी व्यक्ति थे। आमतौर पर भगत सिंह को वीर, साहसी, क्रांतिकारी और बाद में बलिदानी के रूप में जाना जाता रहा है। इस दिशा में उनके कई अहम और मजबूत पक्षों को उतना प्रचारित नहीं किया गया, जितना होना चाहिए था। वे धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद के बड़े विचारक भी थे। बतौर दार्शनिक और चिंतक उन्हें समाज के विभिन्न वर्गों के साथ-साथ देश की समसामयिक समस्याओं की पूरी जानकारी होती थी। आर्थिक-सामाजिक समस्याओं पर गहरा विचार-मंथन उनके स्वभाव का हिस्सा बन चुका था। जहां तक क्रांति की बात है, इसके लिए वे वैज्ञानिक विचारों को आवश्यक मानते थे। क्रांति करने की उनकी प्रवृत्ति में आजादी प्राप्ति के तय कार्यक्रम और सुनिश्चित विचार समाहित होते थे। निचली अदालत द्वारा एक बार ‘क्रांति’ शब्द से उनका तात्पर्य पूछे जाने पर उनका तर्क था- ‘क्रांति के लिए खूनी संघर्ष की जरूरत नहीं है। इसका अभिप्राय यह कि वर्तमान व्यवस्था जो खुले तौर पर अन्याय पर टिकी है, उसमें बदलाव होना चाहिए।

हमारा क्रांति का उद्देश्य एक ऐसी व्यवस्था की स्थापना है, जिसको घातक खतरों का सामना न करना पड़े और जिसमें सर्वहारा वर्ग की प्रभुसत्ता को मान्यता हो, साथ ही एक विश्वसंघ मानव जाति को पूंजीवाद के बंधन से और साम्राज्यवादी युद्धों से उत्पन्न होने वाली बर्बादी और मुसीबतों से बचा सके।’ बचपन के दिनों में भी उनके खून में देशभक्ति का प्रवाह तेज था। 13 अप्रैल, 1919 को घटित जालियांवाला बाग हत्याकांड का भगत सिंह पर गहरा असर पड़ा। बारह वर्ष की अल्पायु में ही इस घटना से विचलित होकर उन्होंने अगले दिन स्कूल के बजाय घटना स्थल जाकर निर्दोष-निहत्थों के खून से सनी मिट्टी इकट्ठा कर शायद बदले का पहला प्रण लिया था। इन्हीं दिनों भगत सिंह ने समाजहित और ‘हक की लड़ाई’ के लिए कई बार अंग्रेजी हुकूमत के आदेशों के खिलाफ अपनी नन्ही आवाज बुलंद की। उनकी दसवीं की पढ़ाई भी पूरी नहीं हुई थी, जब वे स्कूल छोड़ कर गांधीजी के असहयोग आंदोलन में सक्रिय हो गए थे। हालांकि, असहयोग आंदोलन को वापस लेने के निर्णय से वे काफी निराश भी हुए थे।

उनकी ऐसी अनंत गाथाएं उनके दस्तावेजों में उपलब्ध हैं। शादी के दबाव में उन्होंने सोलह वर्ष की अवस्था में ही घर छोड़ कर कानपुर में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का दामन थामा। इस दौरान वे यूपी और बिहार के क्रांतिकारियों की संगत में थे। गणेश शंकर विद्यार्थी के मार्गदर्शन में उन्हें पत्रकारिता सीखने और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय विषयों पर विचार करने का अवसर मिला। शायद यही दौर था, जब भगत सिंह लेखन और वाद-विवाद के गुण मजबूत कर रहे थे। इंकलाब जिंदाबाद अपने देश का सबसे मशहूर और प्रेरणादायक नारा है। इसी नारे के साथ 8 अप्रैल, 1929 को केंद्रीय लेजिस्लेटिव असेंबली में उन्होंने बम धमाका किया था। इसकी प्रवृत्ति अहिंसक थी। उन्होंने स्वयं अपनी गिरफ्तारी देकर अदालत में बड़ी निडरता के साथ कहा- ‘हमारा मकसद किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं था। इसी कारण मारक क्षमता वाले बम नहीं फेंके गए थे।’ उनका मकसद ‘बहरी’ हुकूमत को आगाह करना मात्र था।

समाजवाद से प्रेरित भगत सिंह समानता के बड़े पुरोधा रहे हैं। बम कांड के बाद जेल में भारतीय राजनीतिक बंदियों के साथ हो रहे बर्ताव से वे काफी दुखी हुए। चंूकि भारतीय और अंग्रेज कैदियों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया जा रहा था, भगत सिंह और उनके साथी वीके दत्त ने समानता और बर्ताव में सुधार हेतु भूख हड़ताल शुरू की, जिसे देश के अन्य कैदियों का समर्थन भी प्राप्त हुआ था। धर्म और समाज के प्रति उनके विचार बहुत खुले और यथार्थवादी थे। यह उनके लिए निजी विषय था। सांप्रदायिक विद्वेष की भावना, जो अब तक शांत नहीं हो पाई है, भगत सिंह ने इसका परिणाम लगभग दस दशक पहले ही भांप लिया था। लाहौर दंगे के बाद भगत सिंह इस बात का संकेत दे रहे थे कि यह तेजी से फैलने वाला विष है, जो भारत को अंधकार की ओर ले जाएगा। ‘इन धर्मों ने हिंदुस्तान का बेड़ा गर्क कर रखा है और पता नहीं ये धार्मिक दंगे भारतवर्ष का पीछा कब छोड़ेंगे?’

उनके अनुसार इन दंगों का इलाज आर्थिक संपन्नता थी। उनका मानना था कि भारतीयों की असली लड़ाई पूंजीपतियों से है, न कि धार्मिक-जातिगत संगठनों से। चंूकि कार्ल मार्क्स को वे अपना गुरु मानते थे, आजादी और आर्थिकी उनके लिए सहचर थी। इस बारे में उनका स्पष्ट मत था कि आजादी की लड़ाई का मुख्य उद्देश्य आर्थिक सुदृढ़ता का संचार है, साथ ही आर्थिक आजादी के बिना राजनीतिक आजादी का कोई औचित्य नहीं रह जाता। भगत सिंह के तमाम विचार और उद्देश्य वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ज्यादा प्रासंगिक हो रहे हैं। सांप्रदायिक घटनाएं आए दिन समाचार पत्रों की सुर्खियां बनती हैं। दलगत फायदे के लालच में धार्मिक-जातिगत तनाव पर अंकुश नहीं लग पाया है। गरीबी-अमीरी के बीच की खाई कम होने की बजाय और चौड़ी हुई है। विकास और आधुनिक उपलब्धियों के तमाम दावों के बावजूद लाखों लोगों को दो वक्त की रोटी नसीब नहीं है। किसान तब गरीब और साधनहीन थे, अब आत्महत्या को मजबूर हो रहे हैं। जातिगत छुआछूत का दंश देश आज भी झेल रहा है। लगभग दो लाख से ज्यादा परिवार आज भी सिर पर मैला ढोने को बाध्य हैं।

देश की एक फीसद आबादी के पास साठ प्रतिशत धन है। इससे स्पष्ट है कि भगत सिंह के सपने अभी पूरे नहीं हुए हैं। जिस तरह का सामाजिक सद््भाव, आर्थिक-सामाजिक आजादी और शासन व्यवस्था भगत सिंह की कल्पना में थी, अब तक की सरकारें उसे धरातल पर उतारने में नाकाम रही हैं। केंद्र और राज्य सरकारें देश के महापुरुषों की विरासत का श्रेय लेने की दिशा में विभिन्न कार्यक्रमों में लाखों-करोड़ रुपए खर्च करती हैं। निश्चित रूप से इनका लाभ भी होता है, लेकिन उनके सिद्धांतों का अनुसरण करने में अब तक नरमी बरती गई है। भगत सिंह अब इतिहास बन चुके हैं, लेकिन उनकी कुरबानी करोड़ों युवाओं को प्रेरित करती है। दुनिया के छोटे-बड़े कई मुल्कों में क्रांति का आगाज हुआ है, पर भगत सिंह जैसा सिद्धांतवादी क्रांतिकारी कोई और नहीं हो पाया। आज चंूकि उनका शहादत दिवस है, उनके मार्ग पर चलने का प्रण देश की आर्थिक-सामाजिक अखंडता को और मजबूत कर सकता है। लेखक जदयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं।

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