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सुरक्षित यातायात की बात

तमाम विकासशील देश शहरी यातायात और समुदायों की सुरक्षा के पहलुओं पर न केवल आधी शताब्दी से विचार कर रहे हैं, बल्कि उन्हें दूर करने के प्रयास में बुनियादी तौर से जुटे भी हैं..

दिल्ली में ट्रैफिक जाम का एक नजारा। (File photo)

कितना अजीब-सा लगता है जब आप किसी बूढ़े व्यक्ति को सहमते हुए सड़क पार करते देखते हैं। आपका दिल धक कर जाता होगा, जब आप किसी साइकिलचालक या फेरी लगाने वाले को फ्लाइओवर से तेजी से उतरते हुए देखते होंगे और कारों के हार्न सुनते होंगे। आप घबरा जाते होंगे जब किसी शिशु को सड़क पर पहुंचता देखते होंगे। क्योंकि फुटपाथ है ही नहीं। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी की ये कुछ तस्वीरें हैं जिन पर आपका जब ध्यान जाता है तो आप थर्रा उठते हैं।

विकास के दौर में इन महत्त्वपूर्ण बुनियादी बातों पर विचार जरूरी है जिससे ग्लोबल स्मार्ट विलेज के समांतर हम अपने देश के शहरों और कस्बों को सुरक्षित, स्वच्छ और समुचित परिवेश में ढाल पाएं। यह सही है कि आजादी के बाद देश के महानगरों और पैंसठ बड़े शहरों में जनसंख्या, फैलाव और सुविधाओं के लिहाज से खासी तरक्की हुई है। इनका व्यावसायिक, शैक्षणिक और सामाजिक तौर पर खासा विकास हुआ है। प्रशासन, सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की पहल से न केवल सड़कें बल्कि गलियां भी चौड़ी और तेज आवागमन के लायक हो सकीं हैं बल्कि शहरों में तेज आवागमन के चलते समुदायों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सोचना आज की अनिवार्यता है।

तमाम विकासशील देश शहरी यातायात और समुदायों की सुरक्षा के पहलुओं पर न केवल आधी शताब्दी से विचार कर रहे हैं, बल्कि उन्हें दूर करने के प्रयास में बुनियादी तौर से जुटे भी हैं। आर्थिक दबावों के बावजूद यातायात को ज्यादा सुगम और निरापद बनाने के लिए सक्रिय स्वयंसेवी संगठन, कुछ व्यावसायिक प्रतिष्ठान और अधिकारी खासे सक्रिय हैं। यूरोपीय देशों में इंग्लैंड, जर्मनी और फ्रांस में इस पर खास शोध हुए हैं और यहां उस शोध को अमली जामा भी पहनाया गया है। इसी तरह एशिया में ताइवान, ढाका, सिंगापुर, बेजिंग और दिल्ली में अलग-अलग स्तरों पर काफी काम हुआ है लेकिन बड़ी जनसंख्या, निरक्षरता, व्यापक बेरोजगारी और प्रशासनिक सक्रियता के अभाव में यातायात को सुरक्षित और तेज बनाने के प्रयास उतने प्रभावी नहीं रहे हैं, जितने वे पश्चिमी देशों के विभिन्न छोटे-बड़े-मझोले शहरों में दिखते हैं।

पिछले दिनों इंडियन इंस्टीच्यूट ऑॅफ टेक्नोलॉजी, नई दिल्ली में तीन से पांच दिसंबर के दौरान यातायात, योजनाओं और सुरक्षा विषयों पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हुआ। इसमें देश और विदेश से आए तकरीबन सत्तर जाने-माने विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और शोध छात्रों ने भाग लिया। सड़क-निर्माण, हाई स्पीड रोड स्ट्रेच, फ्लाईओवर वगैरह के निर्माण और उनके स्थायित्व में इस्तेमाल हो रही नई तकनीकों, वाहनों को तेज गति में रखते हुए भी उन पर नियंत्रण, दुर्घटनाओं की वजहों और उनके निदान, घायलों को तत्काल ऐसे आकस्मिक निदान केंद्रों और अस्पतालों में पहुंचा कर इलाज के लिए उपयुक्त दवाओं के प्रयोग और उनके असर पर वैज्ञानिक प्रस्तुतिकरण और गहन विचार-विमर्श हुए। इस सम्मेलन में सड़क के आर्थिक-सामाजिक परिवेश के महत्त्व पर बात हुई और इस बात का भी जायजा लिया गया कि प्रशासन की छोटी से लेकर बड़ी इकाइयां तक सड़क-सुरक्षा को लेकर कितनी लापरवाह हैं।

एशियाई देशों में महानगरों, मझोले और छोटे शहरों में आबादी का घनत्व काफी ज्यादा है और जमीन का मिलाजुला उपयोग होता है। इस कारण, छोटी दूरी आवागमन का उचित जरिया न होने से बड़ी हो जाती है। सड़क पर पैदल, साइकिल, रिक्शा, ठेला के अलावा कार, बस के साथ ही माल ढोने वाले वाहनों का रेला ठीक तरह से संचालित न होने पर दुर्घटनाओं की वजह बन जाता है। शहरों में यातायात प्रणाली और सड़कों की जगहें जिस तरह निर्धारित की जाती हैं उससे सामाजिक जिम्मेदारी और सोच का पता चलता है। यातायात योजना पूरी तरह कार को ध्यान में रख कर तैयार होती है। कारों की गति कम न हो इसलिए सड़कों पर हाई स्पीड स्ट्रेच बनते हैं, खासतौर पर तिराहे, चौराहों के पहले। इससे कार को ज्यादा देर कहीं रुकना नहीं पड़ता। फ्लाइओवर उनके लिए ही बने हैं, जिससे वे कहीं फंसें नहीं। बाजारों में देखिए, उनकी पार्किंग के लिए कितनी बड़ी-बड़ी जगहें निर्धारित हैं या लोगों ने घेर रखी हैं। कहते हैं किसी अधिकारी से आप कभी सड़क खराब होने या सड़क धसक जाने पर अफसोस का वाक्य भले सुन लें, लेकिन फुटपाथ टूटने, साइकिल पथ का रखरखाव न होने, स्टैंड के टूटे-फूटे होने या बस सेवाओं के खराब होने पर अफसोस का इजहार कभी नहीं सुनेंगे।

शहरों में सड़कों पर ही ठेला, खोमचा लगा कर आजीविका जुटाने के प्रयास को किस तरह विकास के साथ जोड़ कर देखा जाए, यह सवाल शहरी नीति नियोजन के नीति निर्माताओं के लिए हमेशा चुनौती रहा है। संवाद में सहमति इस मुद््दे पर रही कि रेहड़ी-ठेला, खोमचा ही नहीं बल्कि पटरी पर बैठ कर छोटी-छोटी दुकानें लगाने वालों से शहर और शहरी जीवन की अनोखी आभा झलकती है, इसलिए शहरी विकास के योजनाकारों के लिए यह अनिवार्य है कि वे उनके लिए समुचित जगह रखते हुए फुटपाथ, साइकिल पथ और मोटरपथ बनाएं। संवाद में यह मुद््दा भी खासा अहम माना गया कि मझोले और कम आमदनी वाले देशों में ज्यादातर लोग सार्वजनिक वाहनों का इस्तेमाल करते हैं। स्थान, समय और गति के अनुरूप समुचित व्यवस्था के अभाव से दुर्घटनाएं होती हैं, जिसकी वजह बेहद व्यस्तता और आपसी प्रतिस्पर्धा होती है। ऐसी हालत में साइकिल पथ और मोटर पथ पर समुचित संचालन आवश्यक है। साथ ही यह देखना चाहिए कि किस तरह मूलभूत ढांचों को बनाए रखते हुए वह बदलाव लाया जाए जिससे लोगों की आजीविका भी न छिने और विकास तेजी से हो। इसके महत्त्वपूर्ण प्रयोग कई एशियाई देशों में हुए हैं।

ताइवान की जनसंख्या आज लगभग दो करोड़ तीस लाख है जहां एक करोड़ चालीस लाख मोटर साइकिलें हैं। यह तादाद अनोखी है जो मोटर साइकिलों के स्वामित्व के मामले में और कहीं शायद ही हो। इसके साथ ही ताइवान एक ऐसा देश है जहां मोटरसाइकिल से होने वाली दुर्घटनाओं को बचाने की खासी कोशिश होती रही है। वहां यातायात-नियम खासे कठिन हैं। यातायात के मामले में यह ध्यान रखा जाता है कि ताइवान में सिंकू के नेशनल शियांसो तुंग यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पी ह्यूग वऊ ने बताया कि हुकटर्न से कटिंग तक की बारीकियों पर नजर रहे जिससे दुर्घटना न हो। मोटरसाइकिलों से होने वाली दुर्घटनाएं जो पहले 1228 थीं, अब घट कर 2014 में आठ सौ हो गई हैं। पिछले ढाई दशक में ताइवान में यह जाना-समझा गया कि मोटरसाइकिलें कहां दुर्घटनाग्रस्त होती हैं और उससे किस तरह की चोटें आती हैं। इस जानकारी को ध्यान में रख कर ऐसा प्रस्ताव बनाया गया जिसे दूसरे देश भी देखें और यातायात-सुरक्षा के ऐसे नियम बनाएं जिनसे मोटरसाइकिलों से दुर्घटनाएं न हों।

यातायात के विभिन्न पहलुओं पर शोध और दुर्घटनाओं पर नियंत्रण के क्षेत्र में सक्रिय संस्था ट्रिप के सह-संयोजक दिनेश मोन ने बताया कि पिछले दस साल में इंडियन इंस्टीच्यूट आॅफ टेक्नोलॉजी, दिल्ली के तत्त्वावधान में कई महत्त्वपूर्ण काम हुए हैं। तकनीकी संस्थानों में विभिन्न विभागों में हो रहे कार्य को एक-दूसरे से जोड़ते हुए समाज के उपयोग में लाने की कोशिश एक महत्त्वपूर्ण कार्य है, जिसे इस संस्था ने किया। यह कोशिश रही है कि अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय शोध के जरिए न केवल यातायात सुगम हो बल्कि सुरक्षित हो, साथ ही देश के अनुरूप वाहनों में पर्यावरण, चालकों और लोगों के स्वास्थ्य के लिहाज से अपेक्षित सुधार हों।

शहरों के विकास में निरंतर आवश्यकता होती है यातायात संबंधी योजनाओं पर सतत चिंतन और अमल की, जिससे सड़कों पर सफर सुरक्षित रहे, सड़कों के सहारे आजीविका चलाने वालों का भविष्य बेहतर हो, वाहन तेज गति में मगर सावधानी से चलें, घायलों को तुरंत अस्पताल पहुंचा कर उनकी समुचित सेवा-शुश्रूषा हो। और वाहन चालक ज्यादा जिम्मेदार और संवेदनशील हों।

आवागमन में विविधता और गति किसी भी आधुनिक शहर की बुनियादी पहचान हैं। भारत में महानगरों और नए अनेक शहरों को बेहद आधुनिक बनाने पर जोर दिया जा रहा है। इन शहरों में समन्वित विकास मसलन सड़कें, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, व्यावसायिक स्थल, आवासीय परिसर, पार्क, स्टेडियम आदि की बुनियादी व्यवस्था तेजी से हो रही है। सड़कें ज्यादा चौड़ी हों, गलियां भी इतनी बड़ी हों कि उनसे वाहन गुजर सकें, साथ ही पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ, साइकिल पथ, आॅटो रिक्शा और तेज गति के वाहनों के लिए चौड़ी सड़कें हों।

इनके साथ ही यह भी आवश्यक है कि जिन देशों में अभी मोटर साइकिल परिवहन बहुत ज्यादा विकसित नहीं है और काफी बड़ी तादाद पैदल चलने वालों और साइकिल यात्रियों की है वहां बस-सेवा साइकिल-सुविधा के साथ हो। दिल्ली में अक्तूबर 2006 में पहला बस रैपिड ट्रांजिट सिस्टम बना। शुरू में काफी विवादों के बावजूद अधिकतर लोग आज इसे उपयोगी मान रहे हैं। इस तरह की प्रणाली आज पुणे, अमदाबाद, इंदौर और जयपुर में भी आकार ले रही है। इसे विकसित करने में शहरी विकास मंत्रालय और परियोजना प्रबंधन कंपनी (राइट्स) का परस्पर सहयोग रहा है।

शहरी यातायात प्रवृत्तियों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि वर्तमान सिग्नल साइकिल जो चौराहों पर यातायात नियंत्रित करती है, काफी दोषपूर्ण है। पैदल राहगीरों को सड़क पार करने के लिए समुचित वक्त नहीं मिल पाता। यह भी पाया गया कि तय समय पर सड़क पार करने की अवधि भी बेहद कम है। इस तरह की स्थिति में पैदल यात्री दुविधा में रहता है और रोशनी के बजाय उसकी नजर आ रही गाड़ियों पर होती है, जिसमें दुर्घटना का अंदेशा बढ़ता है।

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