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राजनीति: परतों में पलता भ्रष्टाचार

लगभग पूरे देश में यह एक बेहद आम शिकायत है कि नगर पालिकाओं से लेकर स्थानीय स्तर पर सांसद कोष, विधायक कोष सहित राज्य व केंद्र सरकार की मदद से विभिन्न पंचायतों में करवाए जा रहे निर्माण कार्यों में जम कर धांधली होती है। शहरी इलाकों के अलावा अक्सर ऐसी शिकायतें विभिन्न पंचायतों के ग्रामीण संबंधित क्षेत्र के विकास अधिकारियों से करते हैं, लेकिन भ्रष्टाचार में शामिल अधिकारीगण शायद ही कभी मामलों की तह में जाने की कोशिश करते हैं।

Search Rescue operation NDRF Muradnagar Distt Ghaziabadघटनास्थल पर एनडीआरएफ और पुलिस की टीमें रेस्क्यू अभियान में जुटी हैं। (सोर्स- सोशल मीडिया)

संजय वर्मा

जनता के पैसे को किस तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ाया जाता है, इसकी ताजा मिसाल दिल्ली के नजदीक कस्बे मुरादनगर का श्मशान घाट में देखी जा सकती है। वहां एक अंत्येष्टि में आए लोग बारिश से बचने के लिए जिस बरामदे के नीचे जमा हुए थे, वह भरभरा कर ढह गया और पच्चीस लोगों की मौत हो गई।

हारी-बीमारी में हुई किसी की मौत ही अपने आप में तकलीफदेह होती है, ऐसे में पता चले कि पच्चीस लोग सिर्फ इसलिए असमय मौत के मुंह में समा गए क्योंकि कुछ अधिकारियों, इंजीनियरों और ठेकेदारों ने सार्वजनिक निर्माण में जम कर धांधली की और वह निर्माण चंद दिनों में ही ढह गया, तो यह दर्द आखिर कैसे बर्दाश्त हो सकता है! विंडबना यही है कि इस दर्द को आजादी के सात दशकों बाद भी सरकारें समझ नहीं पाई हैं, अन्यथा दुर्दांत हत्यारों को जिस तरह मृत्युदंड दिया जाता है, उसी तरह भ्रष्ट इंजीनियर-ठेकेदारों को भी ऐसी कठोर सजा मिलती जो और के लिए सबक बनती।

मुरादनगर हादसे के बाद यदि यह देख कर संतोष कर जाए कि घटना के जिम्मेदार इंजीनियर-ठेकेदार सलाखों के पीछे हैं और उत्तर प्रदेश सरकार ने मृतकों के परिजनों को लाखों का मुआवजा दे दिया है, तो साफ है कि ऐसी घटनाएं कभी नहीं थमेंगी। इसकी वजह ऐसे ज्यादातर मामलों में अपनाई जाने वाली वाली नीति रही है। देखा गया है कि इंजीनियर-ठेकेदार आदि का गठजोड़ घटिया निर्माण कर जनता के पैसे की बंदरबांट कर लेता है और कोई घटना हो जाने पर सरकार जनता के पैसे को ही मुआवजे में स्वाहा कर देती है।

यह साफ तौर पर कर के धन का दुरुपयोग है। ऐसी घटनाओं के मद्देनजर असल में देश के करदाताओं को यह सवाल सरकारों से पूछना शुरू कर देना चाहिए था कि वे बताएं कि आखिर उन्होंने कर के रूप में वसूल किए गए पैसों का कहां और कितना इस्तेमाल (दुरुपयोग) किया। जिस तरह स्कूल, सड़क, पुल, अस्पताल और अन्य तमाम सार्वजनिक निर्माणों में घटिया सामग्री का इस्तेमाल भ्रष्टाचार है, उसी तरह मुआवजे की नीति या राजनीति भी अपने आप में भ्रष्टाचार है।

इस मामले में उत्तर प्रदेश सरकार का मौजूदा रवैया एक कसौटी की तरह लिया जाना चाहिए कि सार्वजनिक संपत्ति के किसी भी तरह के नुकसान के लिए उसके वास्तविक दोषी पहचाने जाएं और नुकसान की भरपाई उन्हीं के घर-मकान-जायदाद बेच कर वसूले गए पैसों से की जाए। बल्कि इसमें एक कदम और आगे बढ़ना होगा और निर्माण ढहने के कारण मृतकों के जिन परिवारों के सदस्यों को नौकरी का वचन सरकार दे रही है, तो वे नौकरियां उन्हीं भ्रष्ट अधिकारियों-कर्मचारियों को हटा कर दी जाएं जो ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं।

कोई निर्माण कितनी खराब गुणवत्ता का है, इसे जांचना मुश्किल नहीं है। किसी भी सरकारी इमारत, पुल, सड़क या अस्पताल को बनते हुए देखने पहुंच जाइए, तो साफ पता चल जाता है कि सीमेंट, लोहा, बजरी की बजाय निर्माण सामग्री में रेत ही रेत भरी पड़ी है। लेकिन इंजीनियर, सरकारी बाबू और ठेकेदार का गठजोड़ इतना मजबूत होता है कि निर्माण की गुणवत्ता-मजबूती जांचने और उसे पुख्ता बता कर पास करने वाली टीमों को शायद ही कभी कोई कमी नजर आए। लगभग पूरे देश में यह एक बेहद आम शिकायत है कि नगर पालिकाओं से लेकर स्थानीय स्तर पर सांसद कोष, विधायक कोष सहित राज्य व केंद्र सरकार की मदद से विभिन्न पंचायतों में करवाए जा रहे निर्माण कार्यों में जम कर धांधली होती है।

शहरी इलाकों के अलावा अक्सर ऐसी शिकायतें विभिन्न पंचायतों के ग्रामीण संबंधित क्षेत्र के विकास अधिकारियों से करते हैं, लेकिन भ्रष्टाचार में शामिल अधिकारीगण शायद ही कभी मामलों की तह में जाने की कोशिश करते हैं। धांधली की शिकायत पर कार्रवाई नहीं होने से ऐसे लोगों के हौंसले बुलंद हो जाते हैं। शिकायत की अनदेखी होने से निर्माण करवाने वाले ठेकेदार बेखौफ हो जाते हैं और निर्माण में जम कर घटिया सामग्री का प्रयोग करते हैं। यही नहीं, निगरानी और जांच के नाम पर भी प्राय: खानापूर्ति ही की जाती है।

चुनावी दौर में सरकारी महकमों में प्रत्येक विभाग की ओर से आवंटित बजट को खपाने के लिए नए निर्माण कार्यों को आनन-फानन में मंजूरी दी जाती है और चुनावी आचार संहिता लागू होने से पूर्व निर्माण कार्य संपन्न करवा कर वाहवाही लूटने की होड़ भी मचती है। ऐसे में गुणवत्ता की जांच को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

देश का शायद ही कोई इलाका ऐसा हो जहां किसी सार्वजनिक इमारत के निर्माण के कुछ ही दिनों बाद चारदिवारी गिरने, शौचालय की टाइलें टूट जाने, भवनों का प्लास्टर उखड़ जाने से लेकर जरा-सी बारिश में सड़क बह जाने, पुल या पुलिया के ढह जाने और सड़कों पर गड्ढे हो जाने की शिकायतें नहीं आती हों। ऐसा नहीं है कि इन घटनाओं की जानकारी संबंधित महकमों और अधिकारियों को नहीं दी जाती, लेकिन भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी व्यवस्था में इन घटनाओं को मामूली माना जाता है और कोई हादसा नहीं होने की सूरत में अधिकारी, इंजीनियर, ठेकेदार का यह गठजोड़ जनता के पैसे की खुलेआम लूट में लिप्त रहता है।

उसके इस रवैये की एक बड़ी वजह भ्रष्टाचार रोकने के इंतजामों की नाकामी और दुर्घटना की सूरत में दबाव में आई सरकारों की मुआवजा लुटाने की नीति होती है। अभी तक ज्यादातर सरकारें व्यवस्था के निकम्मेपन का शिकार हुए लोगों के परिजनों को जनता के पैसे से मुआवजा देकर खामोश करती आई है। इससे भ्रष्ट गठजोड़ को तोड़ना असंभव हुआ है।

हमारे देश में भ्रष्टाचार इतने गहरे पैठा हुआ है कि उसमें कोई सूराख कर पाना आसान नहीं है। सरकारी व्यवस्था में पसरे इस भ्रष्ट आचरण की बानगी ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल नामक संगठन की सालाना रिपोर्ट से मिलती है। पिछले साल नवंबर में जारी इस संगठन की रिपोर्ट में बताया गया था कि भ्रष्टाचार के मामले में भारत की स्थिति एशिया में सबसे खराब है। यहां घूसखोरी की दर उनतालीस फीसदी है।

‘ग्लोबल करप्शन बैरोमीटर-एशिया’ नाम से प्रकाशित इस रिपोर्ट के लिए ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल ने सत्रह देशों के बीस हजार लोगों से साल भर के दौरान भ्रष्टाचार के अनुभवों की जानकारी मांगी थी। रिपोर्ट के मुताबिक, हर चार में से तीन लोगों का मानना था कि उनके देश में सरकारी भ्रष्टाचार सबसे बड़ी समस्या है। हर तीन में से एक व्यक्ति अपने सांसदों-विधायकों को सबसे भ्रष्ट व्यक्ति के रूप में देखता है, क्योंकि वे ही सरकारी व्यवस्था के भ्रष्टाचार को प्रश्रय देते हैं।

भारत में जिन लोगों को सर्वे में शामिल किया गया, उनमें से इकतालीस फीसद ने बताया कि उन्हें पहचान पत्र जैसे सरकारी दस्तावेज तक हासिल करने तक के लिए घूस देनी पड़ी। रिपोर्ट में एक चिंताजनक आंकड़ा यह भी दिया गया है कि भ्रष्टाचार की जानकारी देना महत्त्वपूर्ण है, लेकिन तिरसठ फीसद लोग उसके अंजाम से डरते हैं क्योंकि ऐसे में भ्रष्टचार में लिप्त लोग शिकायतकर्ता को सबक सिखाने से नहीं चूकते हैं।

ऐसे हालात में सरकारी निर्माणों के दुरुस्त होने की कोई उम्मीद तभी जग सकती है, जब सत्ता में बैठी सरकारें भ्रष्टाचार के आपराधिक गठजोड़ पर जम कर प्रहार करें। साथ ही, ऐसे मामलों में यदि पीड़ित पक्ष के लोग सिर्फ मुआवजा लेकर खामोश हो जाएंगे तो भी किसी बदलाव की संभावना नहीं बनेगी।

मुआवजे की वसूली घटना के जिम्मेदार लोगों से कराना और मुरानगर जैसे हादसों में दोषियों को मौत की सजा का प्रावधान कराना समस्या के समाधान की राह खोलेगा। लेकिन इसमें कोई बात तभी बनेगी, जब मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ भ्रष्ट आचरण के अपराधियों को बिना समय गंवाए दंडित किया जाएगा।

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