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दलित भेदभाव की जड़ें

रोहित वेमुला जैसी घटना से राष्ट्र को जितनी हानि होती है, उतनी शायद किसी से नहीं। इतनी बड़ी आबादी को दबा कर और अलग करके क्या किसी देश को विकसित और खुशहाल बनाया जा सकता है? दलित अपनी मुक्ति की लड़ाई खुद क्यों लड़ें, बल्कि राष्ट्रभक्ति का भाषण देने वालों को ज्यादा लड़ना चाहिए।
Author February 4, 2016 02:14 am

उदित राजः 

जातीय भेदभाव और लिंग विभाजन राष्ट्रीय मुद्दे क्यों नहीं बनते? क्यों शोषित जातियां ही अपने भेदभाव के खिलाफ खड़ी हों, पूरा देश क्यों नहीं? क्या ये भेदभाव करने वाले दूसरे देश के हैं? लिंगभेद से कहीं बड़ा मुद्दा हमारे समाज में लिंग विभाजन का है, जिसे अभी तक पूरी मान्यता नहीं मिली है। अक्सर लिंगभेद पर चर्चा होती है, जबकि यह लिंग विभाजन का उत्पाद है। पुरुष बाहर का काम करें और औरतें घर का, ऐसी हमारे समाज की बनावट और सोच है। पुरुष बाहर की दुनिया से जूझते-जूझते मजबूत हो जाता है और आर्थिक ताकत भी उसी के हाथ होती है। यह अवसर महिलाओं को नहीं मिलता, इसलिए पुरुषों पर आश्रित रहना पड़ता है। घर का कर्ता भी पुरुष होता है।

जातीय भेदभाव और महिला उत्पीड़न की आवाज तभी तेज होती है जब कोई घटना घट जाए। रोहित वेमुला की आत्महत्या से देश में उबाल आ गया। जो विरोध कर रहे हैं, ज्यादातर दलित हैं और यह फिर से सिद्ध होता है कि वही अपनी लड़ाई लड़ें। अगर यह राष्ट्रीय मुद्दा बना होता तो क्या भारत हजारों वर्षों तक गुलाम रहा होता? लोग प्राय: अंगरेजों को हमें गुलाम बनाने का दोष देते हैं, लेकिन क्या यह संभव होता अगर हमारे लोगों ने उनका साथ न दिया होता। अंगरेज लाखों में नहीं, हजारों में थे, तो आखिर हुकूमत कैसे कर गए? जातीय विभाजन से राष्ट्रीयता का अभाव रहा, इसलिए लोग सुविधानुसार अपनी सेवाएं अर्पित करते थे। खासकर शोषित जातियों में अपने शासन-प्रशासन का बोध रहा ही न होगा, क्योंकि वे अपने तथाकथित सवर्ण समाज के मारे थे।

आश्चर्य है कि इसके बावजूद जो हिंदू समाज के संचालक थे, उन्होंने जातिविहीन समाज बनाने का आह्वान नहीं किया, जो अंतत: किसी भी बाहरी हमले को नाकाम करता है और अब भी यह राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बन पाया है। पढ़े-लिखे लोग कहते नहीं थकते कि जाति अतीत की बात हो गई, लेकिन जब शादी के लिए विज्ञापन देते हैं तो जाति के भीतर ही।

रोहित वेमुला की घटना के बाद हजारों भेदभाव के मामले उभरे हैं। यहां तक कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी भेदभाव बड़े पैमाने पर दिखने लगा। दिल्ली विश्वविद्यालय हो, आइआइटी या अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, भेदभाव आम है। अपवाद को छोड़ कर शायद ही कोई संस्थान ऐसा है, जो जातीय उत्पीड़न न करे। ऐसे उत्पीड़न होते हैं, जिसका संबंध दूर-दराज तक तथ्यों से भी नहीं होता। एम्स के नर्सिंग कॉलेज की शिक्षिका शशि मावर का उत्पीड़न किया गया कि उनके कारण बीएससी तृतीय वर्ष के छात्र ने आत्महत्या कर ली थी, जबकि वे बीएससी चतुर्थ वर्ष और एमएससी के छात्रों को पढ़ाती थीं। मृतक छात्र से उनका कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन प्रधानाचार्य ने छात्रों को शशि मावर के खिलाफ भड़काया और इसी को आधार बना कर उन्हें दंडित किया। शशि मावर का शैक्षणिक कार्य अच्छा था और उनका चयन सामान्य श्रेणी से हुआ था, यह ईर्ष्या का एक बड़ा कारण था। अधिकतर अनुसूचित जाति/ जनजाति के शोधार्थियों ने उत्पीड़न की शिकायत की है। महिला हों तो शारीरिक शोषण का प्रयास होता है।

आंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली सरकार की एक दलित शिक्षिका जब कक्षा में पढ़ाती हैं तो डीन आकर बैठ जाते हैं। ऐसे में विद्यार्थी उन्हें क्या सम्मान देंगे। इस दलित शिक्षिका के पढ़ाने के प्रति भी गंभीरता नहीं होगी। अगर दलित शिक्षिका के पढ़ाने के तौर-तरीके ठीक नहीं थे, तो उन्हें अलग से समझाना चाहिए था या छात्रों के ज्ञान के मूल्यांकन के आधार पर आकलन किया जाना चाहिए था। ये भेदभाव करने वाले क्या ईसाई, यहूदी, पारसी, चीनी, अमेरिकी या मुसलिम हैं? राजनीति में इस अहम सवाल को कभी संबोधित नहीं किया गया।

जो आरोप मार्क्सवादियों पर लगता है कि उन्होंने विदेशी मॉडल को ज्यों का त्यों भारत के परिप्रेक्ष्य में लागू किया, लगभग वही हम सब पर लगना चाहिए। जनतंत्र को हमने स्वीकार तो किया, जिसका आविर्भाव और विकास यूरोपीय देशों में हुआ था, लेकिन राज्य के कल्याणकारी चरित्र के बाहर नहीं जा सके। यूरोप में सरकारों की जिम्मेदारी रोटी, कपड़ा, शिक्षा, स्वास्थ्य, मकान आदि की थी। जब हमने जनतंत्र को अपनाया तो इन समस्याओं के अतिरिक्त सामाजिक भेदभाव को भी ध्यान में रखना चाहिए था। हमने आंख मूंद कर नकल की। राजनीतिक दलों और नेताओं ने जाति तोड़ने की जिम्मेदारी नहीं ली और अंतत: सरकार भी इस मामले में तटस्थ रही। जिस समाज में जातिवाद नहीं था, वहां तो राज्य का चरित्र कल्याणकारी होना ही है, लेकिन हमारे समाज भिन्न हैं। जातीय भेदभाव खत्म करना राज्य के कल्याणकारी चरित्र के केंद्र में होना और सरकार को लगातार इसे संबोधित करना चाहिए था।

रोहित वेमुला से भी दर्दनाक घटनाएं हुई हैं, पर जितना मीडिया में कवरेज इसको मिला किसी और घटना को नहीं। गुस्सा, दर्द और आक्रोश जो दबे हुए थे, वे इस घटना के माध्यम से प्रकट हुए। निर्भया की घटना ने दुनिया को झकझोर दिया, लेकिन ऐसा नहीं है कि वैसे जघन्य अपराध पहले न होते रहे हों। महिलाओं पर हो रहे भेदभाव, उत्पीड़न आदि पर जो गुस्सा और दर्द दबा हुआ था वह उस समय प्रकट हो गया था। मीडिया की बड़ी भूमिका रोहित वेमुला की घटना को राष्ट्रव्यापी बनाने में रही। यह भी समय और परिस्थिति की ही देन थी कि मीडिया ने इतनी हवा इस घटना को दे दी। क्या इससे हम मानें कि मीडिया का रिश्ता दर्द का है। जितना मीडिया भेदभाव करती है, उतना कोई और कर ही नहीं सकता। किसी भी राष्ट्रीय अखबार में दलित के बारे में खबर तभी छपती है जब कोई घटना घटित हो जाए जैसे- हत्या, बलात्कार आदि। साल भर के अखबार उठा कर देखें, तो दलित द्वारा लिखा लेख पढ़ने को नहीं मिलेगा। रोहित वेमुला पर मैंने लिखना चाहा तो लगभग सभी अखबारों ने मना कर दिया। इतने भी हम गए-गुजरे नहीं हैं कि लिख नहीं सकते।

मीडिया सबसे ज्यादा जातिवादी है। यह तथ्यों के आधार पर कहा जा रहा है। तमाम अखबार और चैनल वार्षिक सम्मेलन करते हैं, जिसमें देश-विदेश से अतिथि और वक्ता बुलाए जाते हैं, लेकिन दलित को आमंत्रित नहीं किया जाता। दलित-आदिवासी की आबादी लगभग तीस करोड़ है। क्या पूरे देश से दो-चार भी नहीं होंगे, जो इनके वार्षिक सम्मेलन में विचार न रख सकें या मान लिया गया है कि इनके पास विचार होते ही नहीं। भेदभाव की जड़ें इतनी गहरी हैं कि जिन क्षेत्रों में दलितों और पिछड़ों की पारंगतता यानी उपलब्धि खास न हो, उन्हीं पर चर्चा और पुरस्कार आयोजित होते हैं, ताकि इन्हें बाहर रखा जा सके। चूंकि भारतीय समाज पेशे पर आधारित रहा है, इसलिए दलित-पिछड़े उन्हीं क्षेत्रों में माहिर हो सकते हैं, जो सदियों से करते आ रहे हैं।

सोशल मीडिया पर टिप्पणियों की कई सालों से उस समय भरमार हो जाती है जब छब्बीस जनवरी को पद्मश्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण, घोषित होते हंै। दलितों-पिछड़ों को पुरस्कार नहीं मिलते, तो सोशल मीडिया के माध्यम से ही उनका गुस्सा फूटता है। सारे इंजीनियरिंग आदि विषय दूसरे देशों में क्यों विकसित हुए? इसलिए कि जो हाथ चमड़ा, बर्तन, लोहा, कपड़ा आदि में सने, उनको सम्मान दिया गया। ये हाथ फिर पे्ररित हुए, आगे और अच्छा करने का सोचा और धीरे-धीरे तमाम तकनीक और नई खोजें विकसित कर ली। उन्हीं ने आगे विषय, संस्थान और डिग्री का रूप धारण किया। उदाहरण के लिए हमारे यहां जिन्होंने चमड़े के क्षेत्र में काम किया, उन्हें सम्मानित करने के बजाय अछूत का दर्जा दिया गया तो वे कैसे प्रोत्साहित होकर आगे तकनीक विकसित या शोध करते?

तथाकथित राष्ट्रभक्तों से कहना है कि रोहित वेमुला जैसी घटना से राष्ट्र को जितनी हानि होती है, उतनी शायद किसी से नहीं। इतनी बड़ी आबादी को दबा कर और अलग करके क्या किसी देश को विकसित और खुशहाल बनाया जा सकता है? दलित अपनी मुक्ति की लड़ाई खुद क्यों लड़ें, बल्कि राष्ट्रभक्ति का भाषण देने वालों को ज्यादा लड़ना चाहिए। दलित-पिछड़े हजारों वर्षों से अभाव की जिंदगी जीने के आदी हो गए हैं, तो आगे भी बर्दाश्त करने की क्षमता रखते हैं, लेकिन क्या हमारा देश दौड़ में उन देशों के साथ भाग सकता है, जो विकसित हो गए हैं या उस लक्ष्य को प्राप्त कर रहे हैं। यह गारंटी है कि इतनी बड़ी आबादी को काट कर देश को विकसित नहीं किया जा सकता।

अतीत से हमने कुछ नहीं सीखा है। सिकंदर ने 327 ईसा पूर्व में भारत पर हमला किया और आसानी से जीत हासिल कर ली। उसके बाद हमले-दर-हमले होते रहे और हम परास्त। यह नहीं कि हमारी बाजुओं में दम नहीं था या बुद्धि की कमी थी। कारण यह था कि हम जातियों में बंटे थे। अंगरेजों ने तो हमें दो भागों में बांटा, लेकिन हमने अपने आप को जाति के आधार पर हजारों टुकड़ों में बांट रखा है। जो राष्ट्रभक्त होने का दंभ भरते हैं, उन्हें दलितों से भी आगे आकर रोहित वेमुला जैसे मामले को उठाना चाहिए, लेकिन करते हैं दिखावा, क्योंकि लेना है वोट और प्राप्त करना है अपनी प्रसिद्धि, ज्ञान और धर्मादा क्षेत्र में प्रभुत्व।
(लेखक भाजपा के सांसद हैं)

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  1. B
    Babubhai
    Feb 4, 2016 at 6:40 pm
    Mere kai dost dalit he. Maine kabhi koi jagah dalit_savarn ka bhed nahi dekha.Jo kisse bante he voh apani manmaniki vajah ya angat activities ke karan bante he. Ye kisse verzer ke nahi apni personal matter ke hote he.
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    Reply
    1. G
      gajendra kumar
      Feb 5, 2016 at 10:54 am
      जातिवाद ने देश को बर्बाद कर दिया पर कुछ लोग अपने जातीय नजरिये से देखते है ओर जातिवाद को बढ़ावा देते है जिससे उत्साहित होकर सम्मान्य लोग भी उनके साथ आ जाते है जिसके कारण मानवता नष्ट हो रही है इससे बचना चाहिये ओर जमकर विरोध करना चाहिये ........... जातिवाद एक ऐसा भयंकर अजगर है जो भारत की मानवता को चारो तरफ से खाते जा रहा है ......... इसे खत्म करना ही होगा जय भीम जय भारत एडवोकेट गजेन्द्र कुमार बंजारीया
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      1. K
        Kumarpushp
        Feb 16, 2016 at 3:35 pm
        Unit raj ji you had converted to Buddhism with 50000 Dalits in Delhi in 2002 Dalits were supporting you and you were abusing RSss and bjp which can be found in you tube . How Dalits can believe you why you are keeping golwalkar photos in your office .please ask you mystic handy to convert to Buddhism that will break the Hinduism back in KANPUR and Lucknow where kahatic are fighting with Muslims. Time has come join with Muslims to finish the Hindus and there Hindu ledgovdrnment.
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        1. वासुदेव
          Feb 6, 2016 at 5:33 pm
          Mr.उदितराज sc के भाइयों को बनाना बंद कर दे भाई । अब ये तेरी चिकनी चुपड़ी बातो में आने वाले नही है । mr . तेरे को ये लेख लिखने में २० दिन लग गए ।अरे यार आपने तो पीएमओ में एडिटिंग के लिए भेजा होगा कि इसमें क्या रखना है और क्या नही है ना । पर मेरे भाई अब sc के लोग भी समझदार हो गए है उन्हें पता है कि तुमने पहले मुँह क्यों नही खोला ।अगर खोलता तो कुर्सी चली जाती । मोदीजी वापस पार्टी में कभी गठबंधित नही करते । इसलिए भाई ये नोटंकी रहने दे और करियर पे ध्यान दे । रोहित के साथ समाज खड़ा है ।जय भीम
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          1. मृत्युंजय कुमार
            Feb 4, 2016 at 2:08 am
            दलितों के लिए इतनी अच्छी सोच रखने वाले उदित राज जी,हमे समझ में नही आता कि देश में हिंदुत्व/ब्राह्मणवादी ब्यवस्था लेन वाले राष्ट्र भक्त बीजेपी (आरएसएस)से अब तक क्यों जुड़े है!
            (2)(1)
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