राजनीतिः नदीजोड़ परियोजनाओं की मुश्किलें

नदीजोड़ जैसी योजनाएं कागजों पर तो अच्छी लगती हैं, पर व्यवहार में इनके रास्ते में कई मुश्किलें हैं। मुद्दा सिर्फ पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील नहीं है, बल्कि कई राजनीतिक मुश्किलें भी हैं, जिससे बड़े परिप्रेक्ष्य में इस परियोजना के साकार होने में कई समस्याएं और सवाल नजर आते हैं।

बरसों से देश में जिस नदीजोड़ परियोजना को लेकर बहसों और ऊहापोह का दौर चलता रहा है, लगता है कि अब उस पर छाया कुहासा कुछ कम हो सकेगा। हाल में केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने एलान किया कि इस साल की पहली तिमाही में ही केन-बेतवा को जोड़ने का काम शुरू हो जाएगा। बुंदेलखंड में पानी की दिक्कत दूर करने वाली इस परियोजना को अब सिर्फ पर्यावरण मंत्रालय की आखिरी मंजूरी की दरकार है, उसके बाद इससे 6.35 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई और 78 मेगावॉट बिजली परियोजना को पानी मिल सकेगा। इससे पहले देश में आंध्र प्रदेश की दो प्रमुख नदियों- गोदावरी और कृष्णा को औपचारिक रूप से जोड़ा जा चुका है।

नदीजोड़ परियोजना की वकालत मुख्यत: दो आधारों पर की जाती रही है। एक तो सूखे और पानी की कमी से जूझने वाले इलाकों को सतत पानी देने के उद्देश्य से और दूसरे, मानसून या अधिक वर्षा की स्थिति में नदियों में आने वाले अतिरिक्त पानी के कारण पैदा होने वाली बाढ़ की समस्या से निपटने के संदर्भ में। हिमालयी हिस्से की चौदह नदियां सदानीरा हैं। मानसून के दौरान उनमें अत्यधिक पानी आ जाता है, जो देश के उत्तर और मध्य के इलाकों में बाढ़ के विनाशक दृश्य उपस्थित करता है। ऐसे में अगर इन नदियों को गरमी और सर्दी के मौसम में सूख जाने वाली मध्य और दक्षिण भारत की नदियों से जोड़ दिया जाए, तो सूखे और बाढ़ की समस्याओं का एक झटके में समाधान हो सकता है।

यही नहीं, दिल्ली-मुंबई जैसे महानगर पेयजल के लिए पड़ोसी राज्यों और बांधों से मिलने वाले पानी पर आश्रित हैं। ऐसे कई इलाके हैं, जो सिंचाई और पेयजल के लिए पानी के अभाव से जूझ रहे हैं, क्योंकि उनके आसपास की नदियां या तो भयानक रूप से प्रदूषित हैं या बरसात के बाद प्राय: सूख जाती हैं। सबसे अहम यह होगा कि सिंचाई के लिए मानसून पर हमारी निर्भरता का नदीजोड़ परियोजना से स्थायी समाधान निकल सकता है। अगर यह योजना कारगर रहती है, तो न सिर्फ कुछ असिंचित क्षेत्रों के लिए सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए पानी का बंदोबस्त हो जाएगा, बल्कि कई जगहों पर बाढ़ का संकट भी नहीं रहेगा। पर नदियों को जोड़ने का सपना जितना बड़ा है, उसके तामीर होने की राह में मुश्किलें भी उतनी ही ज्यादा हैं।

पहली चिंता खर्च की है। इस मद में 5.60 लाख करोड़ रुपए खर्च का अनुमान लगाया गया था। यह खर्च और ज्यादा हो सकता है क्योंकि इसी तरह की एक योजना चार साल पहले चीन में शुरू की गई है, जहां सिर्फ दो नदियों को जोड़ने पर करीब चार हजार अरब रुपए का खर्च आया है। चीन ने अपनी सबसे बड़ी नदी यांगत्जे और देश की नंबर दो पीली नदी की जलधारा को जोड़ने की पांच दशक पुरानी परियोजना के जरिए तकरीबन डेढ़ अरब घनमीटर पानी हर साल सूखाग्रस्त शांदोंग प्रांत में भेजने का लक्ष्य रखा है, ताकि इस प्रांत में पानी की कमी के गंभीर संकट से निपटा जा सके।

करीब आधी सदी तक चली बहस के बाद चीनी मंत्रिमंडल ने इस महत्त्वाकांक्षी परियोजना को दिसंबर, 2002 में मंजूरी दी थी, जिसके बाद लाखों लोगों को विस्थापित किया गया। चीन के उदाहरण को सामने रख कर देखें तो कहा जा सकता है कि हमारे देश में नदियों को परस्पर जोड़ना कितना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। हालांकि इतनी बड़ी परियोजना के लिए खर्च की चिंता से परे ज्यादा बड़ी मुश्किलें पर्यावरण और लोगों से विस्थापन पर भूमि अधिग्रहण की हैं। पर्यावरणविदों का मत है कि नदियों को परस्पर जोड़ने का मतलब उनकी स्वाभाविक चाल को बदलना होगा। इसके विनाशकारी परिणाम निकल सकते हैं।
असल में, हर नदी अपने साथ अपना जीवन (अपनी स्वाभाविक प्रकृति, रंग और जलीय जीव जंतुओं की उपस्थिति) लेकर बहती है, जो दूसरी नदियों में जुड़ने से समाप्त हो जाता है। ऐसे बदलावों के कारण नदियों के कुपित होने का ठीक वैसा ही असर हो सकता है, जैसा केदारनाथ त्रासदी और कश्मीर बाढ़ के वक्त देखा गया था। कानूनी और भावनात्मक पहलुओं के अलावा नदीजोड़ परियोजना में सबसे बड़ी अड़चन पर्यावरण की है। दूरगामी असर की बात छोड़ दें, तो भी इससे हर कोई इत्तफाक रखता है कि नदियों के बहाव की एक स्वाभाविक दिशा है। उन्हें जोड़ने के लिए अगर उनके बहाव की दिशा नहरों के जरिए मोड़ दी जाती है, तो कुछ साल बाद वे जमीन को दलदली और खारा बना कर अपना बदला निकालती हैं। यह बात हरित क्रांति के दौरान बनाई गई नहरों के दूरगामी नतीजों से साबित हुई है। नदियों का विकास लाखों वर्षों की प्राकृतिक प्रक्रिया से होता है। ऐसे में नदियों के स्वाभाविक मार्ग को रोकने से पूरी नदी जल प्रणाली बदल सकती है। नदियां तीन-चार साल में किनारा बदलती रहती हैं, जिससे उनके पानी को बांधने और मनमुताबिक प्रवाह देने में कठिनाई आएगी।
इसके अलावा पर्यावरण के जानकारों ने यह दावा करते हुए नदियों को जोड़ने पर चिंता जताई है कि इससे समुद्री जीवन को खतरा पैदा हो जाएगा और यह जल विज्ञान और पारिस्थितिकी के अनुकूल नहीं है।

इन भावी परिणामों की चिंता छोड़ दें, तो भी जमीनी स्तर पर भूमि अधिग्रहण और पानी के बंटवारे को लेकर राज्यों के बीच दशकों से कायम असहमतियों के बीच नदियों को जोड़ना एक दुष्कर कार्य है। आज भले गोदावरी-कृष्णा को जोड़ दिया गया हो और केन-बेतवा के जोड़ पर यूपी-एमपी में सहमति बन चुकी हो, लेकिन सतलुज-यमुना लिंक नहर को लेकर पंजाब, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा के बीच जैसा विवाद है और कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच जो कावेरी जल विवाद है, उनके चलते उनतीस राज्यों में तीस नदियों को जोड़ना आसान नहीं लगता। कोई भी राज्य अपने यहां मौजूद नदियों का पानी पड़ोसी राज्यों को देने के लिए तैयार नहीं है, इसी तरह बांध की ऊंचाई बढ़ाने (संदर्भ: मुल्लापेरियार बांध) के मुद्दे पर राज्य सरकारों के बीच सिर-फुटव्वल की स्थिति बन जाती है। ऐसे हालात में नदीजोड़ परियोजना कितने राज्यों के बीच किस-किस तरह के विवादों का विषय बनेगी और इसका नतीजा देश के लिए कैसा होगा, इसका पूरा अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। सच्चाई यह है कि नदीजोड़ जैसी कुछ योजनाएं कागजों पर तो अच्छी लगती हैं, लेकिन व्यावहारिकता में इनके रास्ते में कई मुश्किलें हैं। मुद्दा सिर्फ पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील नहीं है, बल्कि कई राजनीतिक मुश्किलें भी हैं, जिससे बड़े परिप्रेक्ष्य में इस परियोजना के साकार होने में कई समस्याएं और सवाल नजर आते हैं।

सवाल है कि अगर नदीजोड़ में इतनी मुश्किलें हैं, तो आखिर खेती को सूखे से बचाने और देश को बाढ़ की आपदा से कुछ हद तक सुरक्षित करने का उपाय क्या है? असल में, पहला सटीक समाधान वाटर हार्वेस्टिंग जैसी तकनीकों में छिपा है, जिसमें बारिश का पानी जमा करने और ग्राउंड वाटर रीचार्ज जैसे उपायों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। खुद वेंकैया नायडू कह चुके हैं कि वे सभी शहरी निकायों में सभी घरों और फॉर्म हाउसों में वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य बनाने पर विचार कर रहे हैं। यही उपाय गांव-देहात में भी अमल में लाया जाना चाहिए। इसके बावजूद नदियां जोड़ी जाती हैं, तो कहना होगा कि यह काम संभल कर और पूरी संवेदनशीलता के साथ हो, अन्यथा जीवन देने वाली नदियों का सूख जाना या बाढ़ के रूप में उनके कोप को संभाल पाना किसी के वश में नहीं होगा।

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