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राजनीतिः कैसे मिलेगा सस्ता तेल

सरकार ने 2010 में पेट्रोल की कीमत को नियंत्रणमुक्त कर दिया था। इसके बाद वर्ष 2014 में डीजल की कीमत को भी नियंत्रणमुक्त कर दिया गया। तदुपरांत, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत में लगातार गिरावट आई, लेकिन उसका कोई फायदा उपभोक्ताओं को नहीं दिया गया। विदेशी मुद्रा कम खर्च हुई और सरकार के राजस्व में इजाफा हुआ। अब जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत ऊंची है, तब सरकार आमजन को राहत नहीं दे रही है।

Author October 23, 2018 12:08 PM
भारत में पिचहत्तर से अस्सी फीसद कच्चा तेल आयात किया जाता है, जबकि बीस से पच्चीस फीसद कच्चे तेल का हम खुद उत्पादन करते हैं।

सोनल छाया

पेट्रोल और डीजल की कीमत ने आम आदमी को रुला दिया है। आने वाले दिनों में मुंबई में इसकी कीमत सौ रुपए तक पहुंच सकती है। फिलहाल लग नहीं रहा कि पेट्रोल-डीजल के दाम में कोई बड़ी राहत मिलेगी। जिस तरह के हालात हैं उनमें कुछ पैसे की राहत से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। रोजाना पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर आवश्यक वस्तुओं जैसे, खाद्य पदार्थों, अनाज, फल और सब्जियों की कीमतों पर पड़ रहा है। सितंबर महीने में खुदरा महंगाई दर बढ़ कर 3.77 फीसद हो गई। ट्रक ऑपरेटर भी मालभाड़ा बढ़ाने की बात कर रहे हैं। कई जगह तो स्थानीय ट्रक मालिकों ने भी इसमें बढ़ोतरी कर दी है। सरकार ने 2010 में पेट्रोल की कीमत को नियंत्रणमुक्त कर दिया था। इसके बाद वर्ष 2014 में डीजल की कीमत को भी नियंत्रणमुक्त कर दिया गया। तदुपरांत, अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत में लगातार गिरावट आई, लेकिन उसका कोई फायदा उपभोक्ताओं को नहीं दिया गया। विदेशी मुद्रा कम खर्च हुई और सरकार के राजस्व में इजाफा हुआ। अब जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत ऊंची है, तब सरकार आमजन को राहत नहीं दे रही है।

पेट्रोल एवं डीजल के खुदरा बिक्री मूल्य के रोज मूल्य निर्धारण की व्यवस्था एक मई, 2018 से उदयपुर, जमशेदपुर, विशाखापत्तनम, चंडीगढ़ और पुडुचेरी में प्रायोगिक तौर पर शुरू की गई थी। इसकी सफलता के बाद पंद्रह साल की पुरानी व्यवस्था को छोड़ कर इस नई व्यवस्था को 16 जून, 2018 से देश भर में लागू किया गया। सरकारी तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों की हर पखवाड़े यानी एक और 16 तारीख को समीक्षा करती हैं। इसके बाद आधी रात से तेल की नई कीमत लागू की जाती है। रोज मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया विकसित देशों जैसे- अमेरिका, जापान आदि देशों में लागू है। लेकिन भारत की तुलना विकसित देशों से नहीं की जा सकती है, क्योंकि भारत की एक बड़ी आबादी आज भी गरीबी रेखा के नीचे है।

भारत में पिचहत्तर से अस्सी फीसद कच्चा तेल आयात किया जाता है, जबकि बीस से पच्चीस फीसद कच्चे तेल का हम खुद उत्पादन करते हैं। भारत में उत्पादन करने वाली ऑयल इंडिया, ओएनजीसी, रिलांयस इंडस्ट्री, केयर्न इंडिया आदि कंपनियां हैं। तेल आयात करने वाली कंपनियों को ऑयल मार्केटिंग कंपनी (ओएमसी) कहते हैं। इसमें इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड, भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड प्रमुख हैं। करीब पिनच्यानवे फीसद कच्चे तेल का आयात इन्हीं तीन कंपनियों द्वारा किया जाता है। शेष पांच फीसद का आयात निजी क्षेत्र की कंपनियां करती हैं।

पेट्रोल और डीजल के दामों में केंद्र और राज्य के करों का हिस्सा होता है। महाराष्ट्र में पेट्रोल और डीजल पर सबसे ज्यादा वैट (मूल्य वर्द्धित कर) है। महाराष्ट्र में पेट्रोल पर 39.78 और डीजल पर 24.84 फीसद, मध्यप्रदेश में पेट्रोल पर 36.14 और डीजल पर 23.22 फीसद, आंध्र प्रदेश में पेट्रोल पर 36.06 और डीजल पर 28.47 फीसद, पंजाब में पेट्रोल पर 35.35 और डीजल पर 16.88 फीसद, उत्तर प्रदेश में पेट्रोल पर 28.33 और डीजल पर 16.80 फीसद, हरियाणा में पेट्रोल पर 26.25 और डीजल पर 17.22 फीसद वैट लिया जा रहा है।

वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के लेन-देन में खरीदार, बेचने वाले से निश्चित तेल की मात्रा पूर्व निर्धारित कीमतों पर किसी विशेष स्थान पर लेने के लिए सहमत होता है। ऐसे सौदे नियंत्रित एक्सचेंजों की मदद से संपन्न किए जाते हैं। कच्चे तेल की न्यूनतम खरीदारी एक हजार बैरल की होती है। एक बैरल में एक सौ बासठ लीटर कच्चा तेल होता है। चूंकि, कच्चे तेल की कई किस्में व श्रेणियां होती हैं, इसलिए खरीदार एवं विक्रेताओं को कच्चे तेल का एक बेंचमार्क बनाना होता है। ‘ब्रेंट ब्लेंड’ कच्चे तेल का सबसे प्रचलित वैश्विक मानदंड है। इंटरनेशनल पेट्रोलियम एक्सचेंज (आइपीई) के अनुसार दुनिया में दो तिहाई कच्चे तेल की कीमतें ब्रेंट ब्लेंड के आधार पर तय की जाती है। अमेरिका ने अपना एक अलग मानदंड बना रखा है, जिसका नाम है- वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट।

भारत में तेल खपत की प्रवृति को देखते हुए अनुमान लगाया जा सकता है कि दस अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल तेल की कीमत में वृद्धि से आयात बिल लगभग आठ अरब डॉलर बढ़ता है। अगर हम पिछले साल का तेल आयात बिल देखें तो यह बाईस अरब डॉलर और बढ़ गया है। कच्चे तेल की कीमत में पिछले एक साल में सत्रह डॉलर की बढ़ोतरी हुई है, जो फीसद में 19.59 है। इस साल कच्चे तेल का कम से कम चौदह फीसद तक आयात किया जा सकता है, जिससे वित्त वर्ष 2019 में चालू खाते का घाटा जीडीपी के ढाई फीसद तक बढ़ सकता है।

कच्चे तेल की कीमत सितंबर, 2018 तक औसतन सत्तर डॉलर प्रति बैरल रही, जबकि मार्च, 2017 में यह 53 डॉलर प्रति बैरल था। तेल की कीमत में हर दस यूएस डॉलर प्रति बैरल वृद्धि होने से जीडीपी में सोलह आधार अंकों की कमी आती है, जबकि चालू खाते का घाटा (कैड) और मुद्रास्फीति में क्रमश: सत्ताईस और तीस आधार अंकों की वृद्धि होती है। भारत में कच्चे तेल की कीमत से अर्थशास्त्र के विविध मानक इसलिए प्रभावित होते हैं, क्योंकि भारत सरकार ने तेल कीमत का एक आधार बना रखा है, जिसमें कच्चे तेल की कीमत, प्रोसेसिंग चार्ज और कच्चे तेल को शोधित करने वाली रिफाइनरी के शुल्क शामिल होते हैं। इसमें केंद्र सरकार उत्पाद शुल्क लगाती है। फिर, ओएमसी कंपनी डीलर को तेल बेच देती है और डीलर तेल की कीमत पर अपना कमीशन और राज्य सरकार द्वारा लगाया जाने वाला कर वैट जोड़ता है। इसके बाद फिर इस पर सेस (पर्यावरण उपकर) जोड़ कर पेट्रोल एवं डीजल की अंतिम कीमत का निर्धारण किया किया जाता है।

भारत में यह परंपरा रही है कि जब आमजन ज्यादा हो-हल्ला मचाते हैं तो सरकारें पेट्रोल एवं डीजल की कीमत को कम करती हैं। लेकिन इससे उन्हें राजस्व का नुकसान होता है। इसलिए सरकार किसी भी दल की हो, तेल की कीमत कोई सरकार कम नहीं करना चाहती। सरकार के लिए तेल राजस्व का बहुत बड़ा स्रोत है। वर्ष 2016 से 2017 में ओएमसी कंपनियों का उत्पादन शुल्क कम हुआ है, जबकि उनके मुनाफे में अट्ठावन फीसद तक की बढ़ोतरी हुई है। अगर कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत 52.36 डॉलर प्रति बैरल है, तो भारत में पेट्रोल की कीमत 23.35 प्रति लीटर होता है, लेकिन उपभोक्ता से कीमत वसूला जाता है तीन गुना से भी ज्यादा। केंद्र सरकार ने पिछले महीने पेट्रोल और डीजल पर लगाए जाने वाले शुल्क में कटौती की थी। कुछ राज्य सरकारों ने भी वैट में कमी की, लेकिन सभी राज्य वैट में कटौती करने के लिए तैयार नहीं हैं। साफ है कि पेट्रोल और डीजल की कीमत को कम करने के कोई भी ठोस उपाय किसी के पास नहीं हैं। सच कहा जाए तो पेट्रोल और डीजल की कीमत को कम करना पूरी तरह से केंद्र, राज्य सरकार, विपणन कंपनियों, डीलर आदि के हाथों में है, लेकिन कोई अपने हिस्से की कमाई को छोड़ने को तैयार नहीं है। ऐसे में फिलहाल आमजन को कोई भी राहत मिलना मुश्किल प्रतीत हो रहा है।

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