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राजनीति: सवालों में उलझी परीक्षा

अपनी भाषाओं में सिविल सेवा परीक्षा की शुरुआत होने से दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़ा वर्ग के हजारों उम्मीदवार देश की उच्चतर सेवाओं में शामिल हुए और उन्हें मुख्यधारा में आने का मौका मिला। भारतीय भाषाओं के जरिए यह आरक्षण नीति की सफलता का सबसे बड़ा उदाहरण है। फिर अचानक 2011 में एक ही झटके में प्रारंभिक परीक्षा और मुख्य परीक्षा का स्वरूप बदल दिया गया।

संध लोक सेवा आयोग की परीक्षा में शामिल छात्र। फाइल फोटो।

सिविल सेवा परीक्षा की प्रारंभिक परीक्षा के नतीजों ने युवा पीढ़ी में फिर खलबली मचा दी है। खलबली इस अर्थ में कि अभी सितंबर में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने 2019 की परीक्षा में जिन्हें सफल घोषित किया था और जो बेहतर सेवाओं की तलाश में फिर से पांच अक्तूबर की प्रारंभिक परीक्षा में बैठे थे, उनमें से अधिकांश उसे पास नहीं कर पाए। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई ओलंपिक या विश्व कप तक खेले, रिकॉर्ड भी बनाए, लेकिन जिला स्तरीय खेल की दौड़ में असफल हो जाए। ऐसा पिछले चार-पांच वर्षों से लगातार हो रहा है, बिल्कुल लॉटरी की सफलता-असफलता की तरह जो किसी बुनियादी खराबी का संकेत है।

इस साल प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले प्रवीण सिंह का यह चौथा प्रयास था। दो बार वे प्रारंभिक परीक्षा में भी नहीं पास हो पाए थे और फिर पास हुए तो देश में प्रथम आए, जिसकी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी। इसी वर्ष वरीयता सूची में छठा स्थान हासिल करने वाली विशाखा का यह तीसरा प्रयास था और पिछले दो प्रयासों में वे प्रारंभिक परीक्षा में ही असफल हो गई थीं।

2017 में पहले स्थान पर आए अनुद्वीप भी दो बार प्रारंभिक परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर पाए थे। 2015 में शीर्ष पर रहीं टीना डाबी प्रारंभिक परीक्षा में मुश्किल से पास हुई थीं, लेकिन मुख्य परीक्षा में सबसे ऊपर आकर कमाल कर दिखाया। पिछले कुछ सालों में ऐसे सैकड़ों उदाहरण मिल जाएंगे। इसका नतीजा यह हुआ है कि लाखों युवाओं का मानसिक रूप से विश्वास डगमगाने लगा है और पूरी परीक्षा पद्धति के प्रति अविश्वास पैदा होने लगा है। इससे पहले पिछले तीन दशकों तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि मेधावी छात्र मुख्य परीक्षा में भी पास हो, अंतिम रूप से भी चुने जाएं और फिर अचानक प्रारंभिक परीक्षा में फेल हो जाएं।

इसकी शुरुआत 2011 में प्रारंभिक परीक्षा में बदलाव से हुई, जिसके खिलाफ 2014 में दिल्ली सहित पूरे देश में आंदोलन भी हुए। 2011 का सबसे घातक असर तो भारतीय भाषाओं में परीक्षा देने वालों पर हुआ, जिनकी संख्या जो 2011 से पहले पंद्रह से बीस फीसद सालाना थी, वह घट कर अब मात्र तीन फीसद रह गई है। लेकिन इससे भी ज्यादा बुरा असर पूरी परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर पड़ा। पूरा देश जानता है कि संघ लोक सेवा आयोग भारतीय प्रशासनिक सेवा सहित लगभग पच्चीस सेवाओं के लिए सिविल सेवा परीक्षा आयोजित करता है।

वर्ष 1979 से कोठारी समिति की सिफारिशों के अनुसार सभी विभागों में भर्ती समान स्तर की परीक्षा से ही होती है। उससे पहले भारतीय प्रशासनिक सेवा, विदेश सेवा में कुछ अतिरिक्त पेपर और साक्षात्कार में भी अतिरिक्त अंक होते थे। उन सब को समाप्त कर कोठारी समिति ने अंग्रेजी के साथ-साथ भारतीय भाषाओं में भी परीक्षा देने की शुरुआत कर प्रशासन में सच्चे लोकतंत्र की नींव डाली थी। उम्र भी छब्बीस से बढ़ा कर अट्ठाईस साल की गई, जिसे राजनीतिक दबाव में बार-बार बढ़ाते हुए अब अधिकतम आयु सैंतीस वर्ष कर दिया गया है।

तीस वर्षों के परिणाम बताते हैं कि अपनी भाषाओं में सिविल सेवा परीक्षा की शुरुआत होने से दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़ा वर्ग के हजारों उम्मीदवार देश की उच्चतर सेवाओं में शामिल हुए और उन्हें मुख्यधारा में आने का मौका मिला। भारतीय भाषाओं के जरिए यह आरक्षण नीति की सफलता का सबसे बड़ा उदाहरण है। फिर अचानक 2011 में एक ही झटके में प्रारंभिक परीक्षा और मुख्य परीक्षा का स्वरूप बदल दिया गया। प्रारंभिक परीक्षा में वैकल्पिक विषय हटा दिया गया और मुख्य परीक्षा के दो वैकल्पिक विषयों में से एक कर दिया।

इतना ही नहीं, प्रारंभिक परीक्षा में अंग्रेजी भी शामिल कर दी गई, जिसे संसद से लेकर न्यायालयों तक ने अंग्रेजी का अनुचित वर्चस्व माना और तीन वर्ष बाद 2014 में प्रारंभिक परीक्षा से अंग्रेजी हटा दी गई। लेकिन देश की भारतीय भाषाओं के लिए तो यह गलत संदेश चला ही गया कि अब भारतीय भाषाओं में पढ़ने-लिखने का कोई औचित्य नहीं रह गया है।

यहां यह भी याद दिला दें कि कोठारी समिति ने यूपीएससी की सभी सिविल सेवा परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं में अनुमति देने की सिफारिश की थी, लेकिन अभी तक केवल एक ही परीक्षा में भारतीय भाषाओं में देने की अनुमति है। वन सेवा, चिकित्सा सेवा, इंजीनियरिंग सेवा से लेकर रक्षा सेवा जैसी सभी सेवाओं में केवल अंग्रेजी में ही लिखने की अनिवार्यता है।

प्रारंभिक परीक्षा के परिणामों को देखते हुए तो कुछ कदम तुरंत उठाने की जरूरत है। पहला कदम तो यही हो सकता है जैसे आइआइटी प्रवेश परीक्षा का पहला चरण अभ्यर्थी वर्ष में दो बार दे सकते हैं, वैसे ही दो बार परीक्षा देने का इंतजाम सिविल सेवा के प्रथम चरण में किया जाए। यह वक्त और तकनीक के साथ सही बदलाव की जरूरत है।

कंप्यूटर आधारित परीक्षा होने के कारण केवल बीस दिन के भीतर प्रारंभिक परीक्षा के परिणाम आ गए हैं। इससे पूरे वर्ष तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा और किसी कारण से जैसे इस बार कोरोना या कोई और व्यक्तिगत बीमारी की वजह से अभ्यर्थी चाहे तो फिर से बेहतरी के लिए परीक्षा दे सकता है। दोनों में से जो भी बेहतर हो, उसके आधार पर मुख्य परीक्षा मैं बैठ सकता है। इससे देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा को मुख्य परीक्षा तक लाना संभव होगा।

दूसरा सुधार आयु सीमा में करने की जरूरत है। उम्र कम करने की सिफारिश पिछले तीस वर्षों में हर दल की सरकार और उनकी नियुक्ति प्रशासनिक सुधार आयोग की दर्जनों रपटें कर चुकी हैं। लेकिन निजीकरण का विरोध करने वाले भी इस बात पर ध्यान नहीं देते कि जब तक मौजूदा ढर्रे से भर्ती होती रहेगी तब तक भारत सरकार की क्षमता पर उंगली उठती रहेगी।

इतना ही जरूरी है कुल प्रयासों की संख्या की समीक्षा। देश के विस्तार, बहुलता और असमानता की खाई को देखते हुए बेहतर हो कि सभी के लिए पांच से दस बार परीक्षा में बैठने की सीमा रखी जाए, दलित आदिवासी गरीबों को कुछ रियायतों के साथ। साल में यदि दो बार प्रारंभिक परीक्षा कोई देना चाहता है तो वह दो प्रयास माने जाएंगे।

पिछले कई वर्षों से सरकार के पास ऐसे सुझाव आ रहे हैं और सरकार ने यह माना भी है कि जो उम्मीदवार कई चरणों को पार करते हुए साक्षात्कार तक पहुंचे हैं, लेकिन अंतिम सूची तक नहीं आ पाए, उन्हें भारत सरकार के उपक्रमों प्रतिष्ठानों के साथ-सथ निजी कंपनियों में नौकरी का मौका दिया जाए तो अलग-अलग परीक्षाएं करने की कवायद और ऊर्जा भी बचेगी और इन प्रतिभाओं पर असफलता का ठप्पा भी नहीं लगेगा। लगभग इससे मिलती-जुलती शुरुआत सरकार ने राष्ट्रीय भर्ती परीक्षा के जरिए केंद्र सरकार, रेलवे बैंकों के कर्मचारियों के लिए की है जो कर्मचारी चयन आयोग, रेलवे भर्ती बोर्ड और बैंकिंग भर्ती बोर्ड की जगह लेगी।

इसका सबसे सुखद पक्ष राष्ट्रीय भर्ती परीक्षा में बारह भारतीय भाषाओं को शामिल करना भी है जिसे जल्दी ही बढ़ा कर आठवीं अनुसूची में शामिल बाईस भाषाओं के लिए उपलब्ध होगा। नई शिक्षा नीति में भारतीय भाषाओं को प्राथमिक स्तर पर अनिवार्य करने की जो बात कही गई है, वह इन्हीं रास्तों से सफल होगी। जब तक नौकरियों में अपनी भाषाएं नहीं होंगी तब तक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय अंग्रेजी का धंधा करते रहेंगे और अंग्रेजी का धंधा सिर्फ अमीरों के लिए ही रास्ता खोलेगा गरीबों के लिए नहीं। यह लोकतंत्र की बहुत बड़ी विफलता होगी।

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