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कब पूरी होगी पुनर्वास की आस

क्या नदी की मुख्यधारा पर मध्यप्रदेश में ही बने बरगी, इंदिरा सागर, ओंकारेश्वर, महेश्वर और सहायक नदियों पर बने तवा, सुक्ता, बारना सरीखे विशालकाय बांधों के विस्थापितों को ठीक-ठाक पुनर्वास नसीब हुआ है?

Author Published on: August 16, 2017 6:15 AM
medha patkarनर्मदा बचाओ आंदोलन (NBA) की नेता मेधा पाटकर। (पीटीआई)

राकेश दीवान 

इन दिनों मध्यप्रदेश के पश्चिमी इलाके में ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ की अगुआई में विस्थापितों का आंदोलन जारी है। बांध प्रभावित अब इसे अपने जीवन-मरण का सवाल मान कर कडेÞ संघर्ष में जुट गए हैं। नर्मदा घाटी में जारी हाल की उठापटक पर नजर रखने वालों के मन में एक सवाल जरूर कौंधता है कि क्या नर्मदा और उसकी सहायक नदियों पर ताने जा चुके बडेÞ बांधों में से किसी में भी ठीक-ठाक पुनर्वास हुआ है? क्या नदी की मुख्यधारा पर मध्यप्रदेश में ही बने बरगी, इंदिरा सागर, ओंकारेश्वर, महेश्वर और सहायक नदियों पर बने तवा, सुक्ता, बारना सरीखे विशालकाय बांधों के विस्थापितों को ठीक-ठाक पुनर्वास नसीब हुआ है? क्या ‘सरदार सरोवर’ में पानी भरने के लिए हुलफुलाती राज्य और केंद्र की सरकारें भरोसा दिला सकती हैं कि अब तक बन चुके बांधों के विस्थापितों का ठीक-ठाक पुनर्वास हो चुका है और अब सरदार सरोवर के विस्थापितों को भी अपनी-अपनी जड़-जमीन, देव-धामी, ढोर-डांगुर छोड़ चैन से पूर्ण पुनर्वास के लिए तैयार हो जाना चाहिए?

ज्यादा नहीं, सिर्फ नर्मदा की मुख्यधारा पर सबसे पहले बने बरगी उर्फ ‘रानी अवंतीबाई सागर’ के जबलपुर, मंडला और सिवनी जिलों के विस्थापितों के पुनर्वास की सत्यकथा सरकारों का सच बताने के लिए काफी है। सत्ताईस साल पहले, 1990 में बन कर तैयार हुए इस बांध की पहली डूब में थोडेÞ-बहुत नहीं, कुल जमा 61 जीते-जागते गांवों को बिना किसी सूचना, नोटिस के डुबोया गया था। सरकार ने अस्सी के दशक में 101 गांवों के सत्तर हजार लोगों को प्रभावित मान कर सूचनाएं दीं या घरों पर चस्पां की थीं, लेकिन जब डूब आई तो वह सेंत-मेंत में 162 गांवों के 1 लाख 14 हजार लोगों को बहा ले गई। डूबने वाले इन निरपराध लोगों के साथ बीजासेन जैसे वे छोटे-बडेÞ गांव-कस्बे भी शामिल थे जिनके पुनर्वास के लिए उन्हें थोडेÞ ऊंचे, नए इलाकों में नए सिरे से बसाया गया था। पूर्ण डूब के इस मौके पर परियोजना के इंजीनियर टीके घोष ने बाकायदा लिखित में अपने मातहतों को निर्देशित किया था कि बांध में अब पानी भर चुका है और ऐसे में ही ‘पूर्ण जलाशय स्तर’ के निशान लगाए जाएं। इस तरह अकारण, बिना किसी सूचना के डुबोए गए 61 गांवों के निरपराध लोगों को सरकार ने क्या दिया? राज्य में 1990 के बाद बनी हर रंग-ओ-बू की सरकारों की आपराधिक, क्रूर लापरवाही के चलते जबरन जलसमाधि में डुबोए गए ग्रामीणों की परवाह तो दूर, इस गफलत को मंजूर करना तक मुनासिब नहीं समझा गया।

सरदार सरोवर और दूसरे बडेÞ बांधों की तरह बरगी के विस्थापितों को भी बांध में पानी भरने के पहले तरह-तरह के सब्जबाग दिखाए गए थे। जबलपुर संभाग के आयुक्त केसी दुबे ने 1987 की अपनी रिपोर्ट में बताया था कि डूब में आने वालों के लिए स्पष्ट पुनर्वास नीति है, जिसमें पांच एकड़ जमीन व अन्य सुविधाओं के अलावा हरेक परिवार के कम-से-कम एक सदस्य के लिए सरकारी नौकरी का प्रावधान है। जलाशय में पूर्ण क्षमता तक पानी भरने के ठीक चार साल बाद दुबेजी की इस रिपोर्ट को ठेंगा दिखाते हुए, बांधों के लिए जिम्मेदार ‘नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण’ ने 1994 की अपनी रिपोर्ट में बताया कि 1971 में, जब बरगी बांध बनना शुरू हुआ था, पुनर्वास की कोई स्पष्ट सरकारी नीति नहीं थी। उन दिनों जमीन और संपत्ति के लिए नकद मुआवजे के प्रावधान थे। यह मुआवजा इलाके में पिछले तीन साल में हुई जमीन की खरीद-फरोख्त की कीमतों के औसत के आधार पर निकाला जाता था। बरगी में भी विस्थापितों को उनकी डुबोई गई जमीन के बदले 500 से 9940 रुपए एकड़ के हिसाब से मुआवजा बांट दिया गया। पीढ़ियों के डूबते घर छोड़ जब वे आसपास की ऊंची जमीन, पहाड़ियों पर बसने गए तो वन विभाग ने उन्हें ‘अतिक्रामक’ (अतिक्रमणकारी) का आपराधिक दर्जा भी दे दिया।

बांध भरने के सत्ताईस साल बाद राजनीति साधने की गरज से 16 नवंबर से 17 मई के बीच की गई मुख्यमंत्री की ‘नर्मदा सेवा यात्रा’ का बरगी विस्थापित आभार मानते हैं। वनवासी राम के चरण छू जाने से जीवित हुई अहल्या के रूपक का इस्तेमाल करते हुए कठौतिया, बधइयाखेडा, मिल्की जैसे दर्जनों गांवों के विस्थापित बताते हैं कि इस यात्रा के चलते उन्हें दिसंबर 2016 में राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किया गया है। जाहिर है, राजस्व रिकॉर्ड से बाहर होने के कारण विस्थापित होने के लगभग तीन दशक तक उन्हें कृषि सबसिडी, राहत, मुआवजा या फसल की बर्बादी की बीमा राशि जैसी सरकारी सुविधाएं नहीं मिल पार्इं। विस्थापित गांवों में आज तक सड़क, बिजली, स्कूल नहीं हैं और नतीजे में निरक्षरता से लगा कर कई तरह की दुर्घटनाएं होना आम बात है। तत्कालीन योजना आयोग की रिपोर्ट बताती है कि भारी राशि खर्च करके विस्थापितों के लिए पांच ‘आदर्श पुनर्वास ग्राम’ बसाए गए थे, लेकिन रोजगार के अभाव और नतीजे में भुखमरी के कारण लोग इन्हें ‘भुतहा’ छोड़ कर चले गए।

सवा चार लाख हेक्टेयर सेकुछ ज्यादा में सिंचाई और 105 मेगावाट बिजली के लिए अंधाधुंध विस्थापन और 26 हजार 797 हेक्टेयर जमीन और घने जंगल डुबोने वाली मध्यप्रदेश सरकार ने पुनर्वास के नाम पर आखिर क्या किया? इस खाते में सरकार के नाम ‘तलक’ यानी पानी उतरने के बाद खुली जमीन पर खेती और मत्स्यपालन को डाला जा सकता था, लेकिन इन्हें भी उसी आपराधिक अनदेखी के साथ किया गया। विस्थापितों की सहकारी समितियों को 1994 से 1998 के बीच मत्स्यपालन और बिक्री के अधिकार दिए गए, लेकिन इस अच्छे-खासे और देश भर में विख्यात प्रयोग को सरकारी हस्तक्षेप से ठप कर दिया गया। इसी तरह 1997 से 2007 तक बांध का पानी उतरने के बाद खुलने वाली जमीनों पर विस्थापितों द्वारा रबी की फसलें ली गर्इं, लेकिन इसे भी गाद आदि के बहाने से बंद करवा दिया गया।आज बरगी के विस्थापित एक नई मुसीबत से दो-चार हो रहे हैं। दो-दो बार विस्थापित किए गए गांवों को फिर से विस्थापित करके अब ‘चुटका परमाणु संयंत्र’ लगाया जा रहा है। कहने को इससे भी ‘क्लीन’ बिजली बनाई जाएगी, लेकिन उसके जानलेवा प्रदूषण की ओर हमेशा की तरह सरकारें लापरवाह ही हैं। यह परियोजना नर्मदा के शुरुआती क्षेत्र में बने बरगी बांध की जड़ से लगी है और किसी भी तरह की दुर्घटना समूची नदी के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। सब जानते हैं, हमारे देश के परमाणु संयंत्रों को अब भी पूरी तरह चाक-चौबंद नहीं कहा जा सकता।

अलबत्ता इस परियोजना के विस्थापितों को बरगी बांध और ‘कान्हा टाइगर रिजर्व’ के पिछले अनुभवों ने सिखाया है कि सरकारें भरोसे लायक नहीं होतीं, इसलिए वे अब परियोजना बनने के पहले ही नए सिरे से संघर्ष में लगे हैं। नर्मदा की मुख्यधारा पर बने इस पहले बांध के विस्थापितों के साथ किए गए व्यवहार की यह बानगी भर है। ठीक यही कारनामा इंदिरा सागर, ओंकारेश्वर, महेश्वर और तवा, सुक्ता, बारना के बाद अब सरदार सरोवर में दोहराया जा रहा है। तीन दशक से ज्यादा के अपने संघर्ष में नर्मदा बचाओ आंदोलन ने इनमें से अधिकतर बांधों के विस्थापितों के हकों की लड़ाई लड़ कर यही जाना है कि बडेÞ बांधों के निर्माण सेपहले के वायदों और बाद के सरकारी दावों में कोई तालमेल नहीं होता। फिर, बांधों के नाम पर विस्थापित किए जाने वाले लोग सरकारों पर क्यों भरोसा करें? नर्मदा के आखिरी छोर पर बने सरदार सरोवर के डूब क्षेत्र में जारी विस्थापितों की लड़ाई भी उनसे की गई वादाखिलाफी के खिलाफ है। .

 

 

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