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धर्म, समाज और स्त्री

परंपरा की दुहाई देते हुए या आस्था की बात करते हुए क्या समाज के एक हिस्से के साथ प्रगट भेदभाव किया जा सकता है? यह मसला महिलाओं के प्रार्थना-स्थल तक या उसके सबसे ‘पवित्र हिस्से’ तक पहुंचने के बहाने उठता रहा है..

Author नई दिल्ली | December 28, 2015 01:59 am
पिछले साल शिगनापुर शनि मंदिर में एक स्त्री द्वारा दूध चढ़ाए जाने के बाद विवाद पैदा हो गया था। (फाइल फोटो)

परंपरा की दुहाई देते हुए या आस्था की बात करते हुए क्या समाज के एक हिस्से के साथ प्रगट भेदभाव किया जा सकता है? यह मसला महिलाओं के प्रार्थना-स्थल तक या उसके सबसे ‘पवित्र हिस्से’ तक पहुंचने के बहाने उठता रहा है। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते, जब महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले का शनि शिंगनापुर मंदिर हंगामे की वजह बना। पुणे के एक सामाजिक संगठन की महिलाओं ने वहां पहुंच कर शनिदेव की पूजा करनी चाही तो सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें रोक दिया। कुछ दिन पहले एक महिला के शनि शिंगनापुर मंदिर में प्रवेश करने और शनिदेव की प्रतिमा की पूजा करने पर काफी हंगामा हुआ था। उसके बाद मंदिर परिसर का शुद्धिकरण भी किया गया था।

सदियों पुरानी परंपरा के मुताबिक शनि शिंगनापुर में महिलाओं का जाना वर्जित है। इस गांव में यह भी मान्यता है कि इस परंपरा का ही प्रभाव है कि गांव में चोरी नहीं होती और लोग अपने घरों में ताले नहीं लगाते। यह वही शनि शिंगनापुर मंदिर है, जहां की इस अ-समावेशी परंपरा के खिलाफ आज से लगभग पंद्रह साल पहले विचारक और कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर ने श्रीराम लागू, पुष्पा भावे, किसान नेता एनडी पाटिल आदि के साथ मिल कर वहां सत्याग्रह किया था, जिसमें सैकड़ों लोग शामिल हुए थे और उन्होंने गिरफ्तारियां दी थीं। सैकड़ों सत्याग्रहियों के इस जत्थे ने पंढरपुर से शनि शिंगनापुर पैदल मार्च किया था। ध्यान रहे कि उनके इस मार्च का दक्षिणपंथी संगठनों ने जबर्दस्त विरोध किया था और इस परंपरा को चुनौती देने के लिए पहुंचे सत्याग्रहियों को मंदिर में घुसने नहीं दिया था। और विडंबना यह है कि स्थिति को ज्यादा तनावपूर्ण होने से से बचाने के तर्क पर पुलिस ने सत्याग्रहियों को ही कारावास में रखा था।

इक्कीसवीं सदी में महिलाओं को मंदिर के गर्भगृह तक जाने से रोकने में शनि शिंगनापुर अकेला नहीं है। जानकारों के मुताबिक ऐसे कई मंदिर अकेले महाराष्ट्र में आज भी मौजूद हैं। वैसे धार्मिक मान्यताओं के नाम पर स्त्रियों की उपस्थिति तक को ‘पवित्र कहे जाने वाले स्थानों’ या ‘व्यक्तियों’ से वर्जित करना या उनकी छाया तक को वर्जित मानना किसी धर्मविशेष तक सीमित नहीं है। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब मुंबई की हाजी अली दरगाह की मजार में महिलाओं के प्रवेश का मसला सुर्खियों में था, जहां महिलाओं के प्रवेश को लेकर मामला इन दिनों उच्च न्यायालय में पहुंचा है। पिछले दिनों दरगाह के प्रबंधन ने मुंबई अदालत को बताया कि पंद्रहवीं सदी में बनी इस दरगाह की मजार में- जो इरान से आए सूफी संत की याद में बनाई गई थी- महिलाओं को प्रवेश करने देना, धर्मशास्त्रों के हिसाब से ‘पाप’ होगा।

दरअसल, भारतीय मुसलिम महिला आंदोलन की तरफ से मुंबई के हाजी अली दरगाह के प्रबंधन के खिलाफ एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसने कुछ समय पहले पंद्रहवीं सदी के सूफी संत पीर हाजी अली शाह बुखारी की मजार तक स्त्रियों के जाने पर रोक लगाई है। अरब सागर में पत्थरों से बनी जमीन पर स्थित यह दरगाह पर- जो दक्षिण मध्य मुंबई में स्थित है- इसके पहले 2012 तक महिलाएं अंदर तक- अर्थात सूफी संत की मजार तक भी जाती रहीं। मगर प्रबंधन ने उनके प्रवेश पर रोक लगाते हुए उसे शरीयत के आधार पर जायज घोषित किया है।

निश्चित ही मसला कानून के हिसाब से तय होगा। इस मामले में संविधान की धारा 25 बिल्कुल स्पष्ट है। वह हर व्यक्ति को अपनी आस्था के अनुसार घूमने, उसका प्रचार करने का अधिकार देती है। मगर इसके पहले यह जानना दिलचस्प है कि दरगाह के संचालकों ने इस बात की साफ अनदेखी की है कि अजमेर शरीफ का बहुचर्चित दरगाह- जहां पर हिंदू और मुसलमान, दोनों लाखों की तादाद में हर साल पहुंचते हैं- वहां पर ऐसी कोई पाबंदी कभी नहीं रही है और न ही मुंबई के माहिम में स्थित मखदूम शाह की दरगाह पर ऐसा कोई प्रतिबंध है। यहां बनी मजार तक महिलाएं बिना रोक-टोक पहुंचती हैं।

कुछ माह पहले जब यह मसला पहली दफा सुर्खियों में आया था। तब अपने आलेख में गौतम भाटिया ने नागरिक अधिकारों की चर्चा करते हुए स्पष्ट किया था कि किस तरह ‘भारतीय महिला आंदोलन’ की याचिका मजबूत संवैधानिक मान्यताओं पर आधारित है। उनके मुताबिक अगर याचिकाकर्ता संवैधानिक अधिकार की बात प्रमाणित नहीं भी कर पाती हैं तो भी उनके सामने नागरिक अधिकारों का विकल्प है। सर्वोच्च न्यायालय ने माना है कि आम कानून के अंतर्गत पूजा का अधिकार एक नागरिक अधिकार है जिसे नियमित कानूनी याचिका के जरिए लागू करवाया जा सकता है। इसके लिए न्यायालय ने सरदार ‘सैफुद्दीन बनाम स्टेट आॅफ बाम्बे’ के मुकदमे का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति जे दासगुप्ता की बात को उद्धृत किया है ‘संपत्ति या किसी पूजास्थल पर पूजा के अधिकार या स्थान-विशेष पर दफनाने या अंतिम संस्कार के अधिकार को कानूनी याचिका के जरिए अमल में लाया जा सकता है।’

दिलचस्प है कि यही वह वक्त है कि देश की आला अदालत पारसी मूल की एक महिला की इस याचिका पर गौर कर रही है, जिसने अपने समुदाय के बाहर शादी की है। गोलरूख कान्टराक्टर नामक महिला जिसने आज से लगभग पचीस साल पहले माहपाल गुप्ता से शादी की थी, उसकीजनहित याचिका के बहाने यह सवाल उठा है कि वह अगियारी अर्थात अग्निघर- जो पारसी लोगों का पूजास्थल होता है- पर पूजा कर सकती है या नहीं? इस संबंध में वलसाड जिले के पारसी अंजुमन ट्रस्ट को नोटिस जारी हुए हैं। पारसी धार्मिक ग्रंथ इस संबंध में क्या कहते हैं, अदालत ने इसे लेकर भी जानकारी प्रस्तुत करने का आदेश दिया है।

सुश्री गोलरूख ने अदालत को बताया कि विवाह के बाद भी वह मुंबई स्थित अगियारी तथा टॉवर आॅफ साइलेंस- जहां पारसी लोगों का अंतिम संस्कार किया जाता है- जाती रही हैं, मगर जब उन्होंने वलसाड की अगियारी में जाना चाहा तो ट्रस्ट के संचालकों ने उन्हें प्रवेश नहीं करने दिया। अदालत में दायर याचिका में उन्होंने कहा कि अपने माता-पिता के अंतिम संस्कार में भाग लेने और अपना खुद का अंतिम संस्कार वहां किए जा सकने की अनुमति के लिए अदालत ट्रस्ट को निर्देश दे। उन्होंने अदालत के सामने ऐसे उदाहरण भी पेश किए जिनके अंतर्गत पहले अंतर-सामुदायिक विवाह करने वाली पारसी महिलाओं को यहां प्रवेश दिया जाता था, मगर अब यह रोक लगाई गई है। गोलरूख के वकील ने अदालत को बताया कि जहां गैर-पारसी महिलाओं से शादी करने वाले पारसी पुरुषों के पारसी धार्मिक स्थानों पर प्रवेश के लिए रोक नहीं होती, वहींअंतर-सामुदायिक शादी करने वाली गैर-पारसी महिलाओं के लिए रोक लगाई जाती है, जो भारत के संविधान की धारा 25 और 14 का उल्लंघन है।

चाहे शनि शिंगनापुर में हिंदू स्त्रियों को पवित्र स्थान पर जाने से रोकने का मसला हो या हाजी अली की दरगाह में उन पर लगाई गई रोक हो या पारसी की अगियारी में महिलाओं पर लगा प्रतिबंध हो, हम ऐसे मसलों पर कानूनी सोच को जानने के लिए संविधान निर्माण के दौरान चली बहसों को पलट सकते हैं। इस हकीकत के मद्देनजर कि भारत में धर्म का प्रभाव काफी व्यापक है और अगर ‘सारभूत धार्मिक आचारों’ को लेकर संविधान द्वारा संरक्षण नहीं प्रदान किया गया तो वह लोगों के जन्म से मृत्यु तक धर्म या उसके संस्थानों की आम आस्थावान के जीवन पर पकड़ को दमघोंटू बना सकता है, संविधान में कुछ विशिष्ट प्रावधान हैं। जानने योग्य है कि किसी नियम को लागू करना अगर धर्म-विशेष के ‘सारभूत धार्मिक आचारों’ का हिस्सा नहीं माना जाता, तो उसे लेकर प्रबंधन को आदेश देने का अधिकार नहीं बनता।

यहां इस बात का उल्लेख करना समीचीन होगा कि धर्म को लेकर किसी विवाद की स्थिति में उसके मूल ग्रंथों को देखा जाता है। उदाहरण के लिए रामप्रसाद सेठ बनाम स्टेट ऑफ यूपी मामले में बहुपत्नी प्रथा पर फैसला देने के पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मनुस्मृति और दत्तक मीमांसा आदि ग्रंथों का अध्ययन कर बताया था कि क्या उसे हम हिंदू धर्म का ‘आवश्यक भाग’ कह सकते हैं? दूसरे, गाय की हत्या को लेकर मोहम्मद हनीफ कुरेशी बनाम बिहार राज्य सरकार मामले पर गौर करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कुरान की पड़ताल करके देखा था कि क्या गोहत्या इस्लाम धर्म का आवश्यक हिस्सा है? दोनों ही मामलों में वे कृत्य धर्म का आवश्यक हिस्सा नहीं समझे गए थे।

नवंबर माह की अट्ठाईस तारीख को जब किसी अनाम महिला ने मंदिर में प्रवेश किया था, जिसके बाद मंदिर का शुद्धिकरण किया गया, यह वही दिन था जब भारत के महान समाज सुधारक और क्रांतिकारी महात्मा फुले की एक सौ पचीसवीं पुण्यतिथि थी। स्त्रियों, शूद्रों-अतिशूद्रों की मुक्ति के लिए ताउम्र संघर्षरत रहे फुले के गुजरने के डेढ़ सौ साल बाद भी कितनी मंजिले बाकी हैं!

महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के सचिव अविनाश पाटील एवं हामिद दाभोलकर अपने आलेख ‘फेथ इन रीजन’ में (इंडियन एक्सप्रेस, 23 दिसंबर) एक महत्त्वपूर्ण बात कहते हैं: ‘अब तर्कशीलता की आवाज इतनी बुलंद हो गई है कि उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि यह महज पहला कदम है। अगर हम बदलाव की प्रक्रिया को तेज करना चाहते हैं तो हमें यह स्पष्ट करना पड़ेगा कि इस मुद्दे पर हम कहां खड़े हैं। हम जेंडर समानता का समर्थन करते हैं या धर्म के नाम पर उसके दमन की हिमायत करते हैं?’

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