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धार्मिक शिक्षा का औचित्य क्या है

हालांकि हमारे देश के कई प्रखर विचारक तथा बुद्धिजीवी इस बारे में सचेत करते रहे हैं कि धर्म और राजनीति का रिश्ता किसी भी प्रकार से उचित नहीं है, लिहाजा इनका आपस में रिश्ता जोड़ने के बजाय इनका आपसी तलाक किया जाना चाहिए..

Author नई दिल्ली | December 23, 2015 2:28 AM

हालांकि हमारे देश के कई प्रखर विचारक तथा बुद्धिजीवी इस बारे में सचेत करते रहे हैं कि धर्म और राजनीति का रिश्ता किसी भी प्रकार से उचित नहीं है, लिहाजा इनका आपस में रिश्ता जोड़ने के बजाय इनका आपसी तलाक किया जाना चाहिए। पर बड़े दुख की बात है कि विभिन्न दलों के लोग अपने राजनीतिक हित साधने के लिए बार-बार धर्म और राजनीति का ‘ब्याह’ कराने की कोशिशों में लगे रहते हैं। परिणामस्वरूप इस समय देश का सामाजिक ताना-बाना किस दौर से गुजर रहा है यह आज सबके सामने है। टेलीविजन का कोई भी चैनल लगा कर देखिए, आपको सहिष्णुता, असहिष्णुता, धर्म आधारित जनसंख्या, धर्मग्रंथ, धर्मस्थान, सांप्रदायिकता, धर्म परिवर्तन, बीफ, गौवंश, कभी लव जेहाद तो कभी घर वापसी, कहीं मंदिर-मस्जिद निर्माण जैसे विषयों पर गर्मागर्म बहस होती सुनाई देगी। इन बहसों को देख कर ऐसा लगता है गोया देश के सामने इस समय उपरोक्त समस्याएं ही सबसे बड़ी समस्याएं बन कर रह गई हैं। देश को विकास, मंहगाई नियंत्रण, साामाजिक उत्थान, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, औद्योगीकरण, पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण, सड़क-बिजली-पानी आदि की न तो जरूरत है न ही राजनीतिक दल व मीडिया इन बातों पर बहस करने-कराने की कोई जरूरत महसूस करते हैं।

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हमारे देश में ही नहीं बल्कि दुनिया के सभी देशों में विद्यालय इसलिए खोले जाते हैं ताकि बच्चों को सामान्य ज्ञान, विज्ञान, व्यावसायिक ज्ञान तथा उनके अपने जीवन, चरित्र और राष्ट्र के विकास में काम आने वाले ज्ञान संबंधी शिक्षाएं दी जा सकें। जहां तक धार्मिक शिक्षा दिए जाने का प्रश्न है, तो इसके लिए लगभग सभी धर्मों में अलग धार्मिक शिक्षण संस्थाएं मौजूद हैं जो अपने-अपने धर्म-प्रचार के लिए अपने ही धर्म के बच्चों को अपने-अपने धर्मग्रंथों व अपने धर्म के महापुरुषों के जीवन परिचय तथा आचरण संबंधी शिक्षा देती हैं। पर सामान्यतया सरकारी स्कूलों में या सरकारी सहायता-प्राप्त स्कूलों में इस प्रकार की धार्मिक या धर्मग्रंथ संबंधी शिक्षा आमतौर पर नहीं दी जाती। इसके बावजूद पिछले कई वर्षों से हमारे देश में खासतौर पर यह देखा जा रहा है कि कुछ राजनीतिक दल धर्म और राजनीति का घालमेल करने की गरज से तथा समुदाय विशेष को अपनी ओर लुभाने के मकसद से यानी मात्र अपने राजनैतिक हित साधने के उद््देश्य से सरकारी व गैर-सरकारी स्कूलों के पाठ्यक्रमों में धर्मग्रंथ-विशेष को शामिल कराए जाने की वकालत करते देखे जा रहे हैं। कई राज्यों में तो इस प्रकार की पढ़ाई शुरू भी कर दी गई है।

कई राज्य ऐसे भी हैं जहां किसी एक धर्म के धर्मग्रंथ को स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने का दूसरे धर्मों के लोग विरोध कर रहे हैं। उनके द्वारा यह मांग की जा रही है कि या तो अमुक धर्मग्रंथ की शिक्षाओं को पाठ्यक्रम से हटाया जाए या फिर दूसरे धर्मों के धर्मग्रंथों की शिक्षाओं को भी पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए। शायद राजनैतिक लोग भी यही चाहते हैं कि इस प्रकार के विरोधाभासी स्वर उठें और ऐसी आवाजें बुलंद होने के परिणामस्वरूप समाज धर्म के नाम पर विभाजित हो। फिर देश के लोग रोटी, कपड़ा, मकान, विकास, बेरोजगार, महंगाई, शिक्षा तथा स्वास्थ्य और सड़क-बिजली-पानी जैसे बुनियादी मसलों से विमुख होकर धर्म के नाम पर बंट जाएं और उसी आधार पर मतदान करें।

मध्यप्रदेश भी देश के ऐसे ही कुछ राज्यों में एक है जहां हिंदू धर्म के प्रमुख धर्मग्रंथ के रूप में स्वीकार्य भगवद्गीता स्कूली पाठ्यक्रमों में शामिल की जा चुकी है। स्कूलों में गीता के पाठ पढ़ाए जाने के बाद अन्य धर्मों के लोगों ने इस मांग को लेकर लंबे समय तक विरोध-प्रदर्शन किए कि अगर गीता की शिक्षा स्कूली पाठ्यक्रमों के माध्यम से बच्चों को दी जा रही है तो उनके अपने धर्मग्रंथों अर्थात कुरान, बाइबिल और गुरुग्रंथ साहिब जैसे अन्य धर्मग्रथों के सार भी उन पुस्तकों में शामिल किए जाएं। राज्य से आ रहे समाचारों के अनुसार इस विषय पर विभिन्न समुदायों द्वारा किए गए हंगामे के बाद अब स्कूलों में कुरान, बाइबिल व गुरुग्रंथ जैसे दूसरे धर्मग्रथों की प्रमुख शिक्षाओं को भी राज्य के प्राथमिक तथा उच्च प्राथमिक पाठ्यक्रमों में शामिल किए जाने का प्रस्ताव है। इसका एक मसविदा पाठ्यक्रम स्थायी समिति को भेजा जा चुका है। और अगर समिति ने इस प्रस्ताव को अपनी संस्तुति प्रदान कर दी तो राज्य के विद्यालयों के बच्चे 2016-17 के सत्र में गीता के श्लोक, कुरान की आयतें, बाइबिल के कथन तथा गुरुग्रंथ साहब के वचनों का पाठ करते सुनाई देंगे।

राज्य सरकार द्वारा पाठ्यक्रम में विभिन्न धर्मों के प्रमुख धार्मिक ग्रंथों की शिक्षाओं को तथा इनके सार को सम्मिलित किए जाने के पक्ष में यह तर्क दिया जा रहा है कि स्कूल के बच्चे इनका अध्ययन कर बचपन में ही नैतिक शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे और अपने धर्म के साथ-साथ दूसरे धर्मों की शिक्षाओं की जानकारी भी हासिल कर सकेंगे। यह तर्क भी दिया जा रहा है कि इस कदम से बच्चों में अपने धर्म के साथ ही दूसरे धर्म के प्रति सम्मान की भावना पैदा होगी और बच्चों में सर्वधर्म समभाव का बोध विकसित होगा।

इसमें कोई शक नहीं कि देश में प्रत्येक धर्म के बच्चों को प्रत्येक धर्म के धार्मिक ग्रंथों तथा उनके अपने महापुरुषों की जीवनी और उनके द्वारा किए गए सद्कार्यों व उनके द्वारा दिए गए सद्वचनों की जानकारी जरूर होनी चाहिए। सरकार का यह तर्क बिल्कुल सही है कि ऐसी शिक्षा से बच्चों में एक-दूसरे धर्म के प्रति सम्मान व आदर की भावना पैदा होगी तथा सर्वधर्म समभाव का माहौल पनपेगा। दूसरी तरफ सच यह भी है कि विभिन्न धर्मों के धर्मग्रंथों में कई ऐसी बातें भी हैं जो उनके लिखे जाने अथवा उनका संकलन किए जाने के समय भले ही तर्कसंगत अथवा न्यायसंगत रही हों, पर आज के दौर में वे विवादित हो सकती हैं और उन्हें पढ़ाई का हिस्सा बनाए जाने पर आपत्तियां उठेंगी।

दूसरी बात यह है कि धर्मग्रंथों की शिक्षा देने के लिए पहले से ही विभिन्न धर्मों के लोग अपने-अपने मदरसे, गुरुकुल तथा गिरजाघर आदि संचालित कर रहे हैं जिनमें वे अपने-अपने धर्म के बच्चों को अपने धर्मग्रंथ व अपने धर्मगुरुओं से संबंधित शिक्षाएं देते आ रहे हैं। फिर आखिर स्कूली शिक्षा के पाठ्यक्रम में किसी भी धर्म के किसी भी धर्मग्रंथ की शिक्षा या उसके सार को शामिल करने की जरूरत ही क्या है? हां यदि बच्चों में सभी धर्मों व उनकी शिक्षाओं के प्रति आदर व सम्मान पैदा करने जैसी सच्ची मंशा है भी, तो ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि प्रत्येक धर्म के बच्चे किसी भी दूसरे धर्म की धार्मिक शिक्षण संस्थाओं में दाखिला ले सकें और स्वेच्छा से किसी भी धर्मग्रंथ अथवा महापुरुष के विषय में ज्ञान अर्जित कर सकें, जैसा कि पश्चिम बंगाल में देखा जा सकता है। वहां मदरसों में हिंदू बच्चे भी जाते हैं और उनमें कई हिंदू शिक्षक भी देखे जा सकते हैं।

लेकिन सामान्य स्कूली पाठ्यक्रम में इस प्रकार की बातें शामिल करने से बच्चों के समय की बरबादी होगी तथा सांसारिक, उनके भविष्य संबंधी एवं व्यावसायिक शिक्षा के ग्रहण करने में भी बाधा उत्पन्न होगी। दूसरी बात यह है कि मध्यप्रदेश में सभी धर्मों के धर्मग्रंथों को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने का प्रस्ताव राज्य की सोलह सदस्यीय पाठ्यक्रम समिति को भेजा गया है (हालांकि यह नीति अभी लागू नहीं की गई है)। मध्यप्रदेश सरकार ने इस विषय पर विचार करने की जरूरत तब महसूस की है जब राज्य में अन्य धर्मों के अनुयायियों द्वारा बड़े पैमाने पर अपना विरोध दर्ज कराया गया। राज्य सरकार ने सबसे पहले केवल भगवद्गीता को स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल किया था। बाद में उसके रुख में आया बदलाव पाठ्यक्रम समिति को भेजे गए प्रस्ताव से जाहिर है।

यह जरूरी नहीं कि भविष्य में देश के दूसरे राज्य भी सभी धर्मों के धर्मग्रंथों को विद्यालयों में पढ़ाए जाने की अनुमति प्रदान करें और ऐसा भी संभव है कि धर्मविशेष के लोगों को खुश करने के लिए विभिन्न राज्यों की सरकारों द्वारा ऐसा किया भी जाए। पर इसमें कोई दो राय नहीं कि राजनीतिकों द्वारा इस विषय पर जो भी फैसला लिया जाएगा उसके पीछे बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की चिंता तो कम, वोट बैंक साधने की फिक्र ज्यादा होगी। वैसे भी हमारे देश में इस समय धर्मगुरुओं, प्रवचनकर्ताओं, मौलवियों, पादरियों तथा ज्ञानियों की एक बाढ़ सी आई हुई है। और यह बताने की भी जरूरत नहीं कि ऐसे ‘महान लोग’ व धर्माधिकारी हमें अपने ‘आचरण’ से क्या शिक्षा दे रहे हैं और उनमें से कइयों को स्वयं किस दौर से गुजरना पड़ रहा है?

लिहाजा, अगर बच्चों में सर्वधर्म समभाव जागृत करने का प्रयास विद्यालय स्तर पर करना है तो ज्यादा से ज्यादा यह किया जा सकता है कि विभिन्न धर्मों के प्रमुख आराध्य महापुरुषों के त्याग, तपस्या, उनके सद्कर्मों तथा सद्वचनों व असत्य और अधर्म के विरुद्ध उनके संघर्ष से संबंधित संक्षिप्त पाठ व उनके द्वारा मानवता, प्रकृति-प्रेम संबंधी संदेश बच्चों को दिया जाए। अन्यथा स्कूल में तो बच्चों को केवल विज्ञान, सामान्य ज्ञान, समाजशास्त्र, भूगोल, गणित तथा उनके भविष्य व राष्ट्र के विकास संबंधित शिक्षा ही दिए जाने की सबसे बड़ी जरूरत है ताकि वे आगे चल कर न केवल आत्मनिर्भर बन सकें बल्कि राष्ट्र-निर्माण में भी अपना समुचित योगदान दे सकें।

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