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धर्म, समाज और सरोकार

‘मत बनाओ मंदिर, मस्जिद, गिरजे, आश्रम संघ वगैरह। धर्म भावना मूलत: परित्यागी है। भारतीय धर्म और दर्शन एकांत में पनपा है, वह आरण्यक है।

Author January 4, 2016 00:16 am
भारत एक धर्म प्रधान देश है। यहां आस्था प्रकट करने के अनगिनत अवसर आते हैं। खासकर दीपावली के बाद कथा, पुराण और भक्ति संध्या का सिलसिला चल पड़ता है। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

‘मत बनाओ मंदिर, मस्जिद, गिरजे, आश्रम संघ वगैरह। धर्म भावना मूलत: परित्यागी है। भारतीय धर्म और दर्शन एकांत में पनपा है, वह आरण्यक है। उसे आकाश की स्वच्छता और स्वतंत्रता चाहिए, दीवारों में घिरते ही वह शरीर हो जाता है। ज्ञान विशुद्ध आत्मा रहना चाहता है। उसे अमीर गरीब मत बनाओ, उसे अपनी दुनियादारी से मुक्त रहने दो।’ कवि एवं चिंतक कुंवर नारायण के इस कथन से अलग जीवन की कई स्थूल अभिव्यक्तियों से साक्षात होता है, साथ ही धर्म हमारे लिए जीवन-दृष्टि, जीवन शैली और आचार संहिता है। धर्म हमारे जीवन में ऐसा रचा-पचा भाव है, जो जीवन की अनेकानेक विविधताओं में प्रकट होता है। हिंदू धर्म में रूपक हैं, प्रतीक हैं, बिंब हैं, ये जीवन की किसी न किसी दिशा का निर्धारण करते हैं। देवी-देवताओं की बहुलता और बहुरूपता मानव जीवन की विविधता और बहुरूपता के साथ समन्वित है।

हम अपने भौतिक जीवन में अपनी स्थितियों के बीच धर्म की पहचान करते हैं। धर्म हमारी मान्यताओं, आस्थाओं और भावनाओं का आधार होता है। हमारा धर्म, संस्कृति और जीवन शैली उत्सव भाव की है। व्रत, त्योहार, पर्व, स्नान, देवी पूजन, यज्ञ, हवन, स्नान, ध्यान, मधुर गान के साथ हम भगवान को कई नामों में, कई रूपों में, जीवन के हर सोपान पर हम धर्म के साथ समवाय रचते हैं। इसलिए कार्तिक के महीने में शुक्ल पक्ष को महाकाल चांदी की पालकी में सवार प्रज्ञा का हाल जानने निकलते हैं। धर्म और भगवान हमारे साथ किसी विचार और तर्क से परे हर कर्म में साथ हो जाते हैं।

दीपावली के दिन उत्तर भारत के राम को प्रकाश उत्सव के रूप में मनाते हैं। वहीं गोवा में यह दिन नरकासुर वध के लिए है। नरकासुर रावण की तरह सिर्फ मिथकीय पात्र नहीं है। हमारे बीच में विद्यमान कोई भी दुष्कर्मी या दुष्ट भी हो सकता है। कृष्ण ने नरकासुर से स्त्रियों की रक्षा की, इसलिए दीप उत्सव मनाया गया। धर्म के आधार पर रचित कलाओं, साहित्य, संगीत, चित्रकला और विचारग्रंथों की एक बड़ी दुनिया है, पर सभी में मानव कल्याण प्रमुख है।

धर्म के आधार मंदिर कला और संस्कृति के केंद्र भी रहे हैं। मूर्ति कला, स्थापत्य कला, वास्तु कला, आभूषण, वस्त्र-सज्जा और दूसरे अनेक लघु उद्योग उनके साथ जुड़े हंै। खुजराहो में मतंगेश्वर मंदिर में दिवाली के दिन कलाकारों ने भगवान को नतमस्तक प्रणाम किया और फिर नृत्य का प्रदर्शन किया। इनका उद््देश्य प्रकृति और पर्यावरण के साथ समरसता स्थापित करना भी माना गया। इसलिए हम वृक्षों की (बरगद, पीपल), पौधों की (तुलसी) पशुओं की (गाय) पक्षियों की (कौआ) नाग (संपत्ति का रक्षक) की भी पूजा करते हैं। उनके मानव हितैषी गुणों के कारण षष्ठी तिथि को उदय और अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देकर पूजा की जाती है।

बिहार का ‘छठ पूजा’ का यह पर्व भारत का पर्व बन गया है। अंत: शुद्धि के लिए छत्तीस घंटों का निर्जला उपवास जो अगले दिन सूर्य को अर्घ्य देकर समाप्त होता है उसमें वहां के पारंपरिक व्यंजन ठकुआ, कसार, खजूर के पकवान, गुड़ की खीर और अन्नकूट की रोटी खाई जाती है। सांस्कृतिक कार्यक्रम और नदी के घाटों पर आयोजन होते हैं।
घाटों पर मौसम की फसल का गन्ना, नीबू, सुथनी और कई तरह के फलों की बहार होती है। छठ का आंचलिक पर्व भारत पर्व बन गया, आम जन का धार्मिक भाव यही है। अपनी मान्यताओं और आस्थाओं के प्रति श्रद्धा और उत्साह का भाव।
‘फूलवालों की सैर’ जिसमें शोभायात्रा के साथ शहनाई वादन, फूलों के पंखे, चादरें और छाता होते हैं जिन्हें योगमाया मंदिर और दरगाह दोनों पर चढ़ाया जाता है। यह हमारे राष्ट्र की समृद्ध और मिश्रित संस्कृति का प्रतीक है। हिंदू-मुसलिम एकता का प्रतीक है जिससे सांस्कृतिक और धार्मिक सौहार्द बढ़ता है।

हिंदू धर्म में रूपक हैं, प्रतीक हैं, जो किसी न किसी रूप में मानवता के कल्याण के लिए हैं। पौराणिक कथाओं से सांस्कृतिक परंपराओं तक भारतीय मानस को समझने की आवश्यकता है। ईश्वर की दिव्यता मनुष्य के साथ विलक्षण समग्रता में है। गणेश, जो आरंभ के पर्याय हैं, दिशा देने वाले और लक्ष्य पूर्ति में सहायक हैं। महाराष्ट्र में गणेश उत्सव को बाल गंगाधर तिलक ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सांस्कृतिक चेतना के रूप में मनाया। देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना सांस्कृतिक रचनाशीलता और हमारी उत्सवधर्मिता का विकास है। लोगों की आस्था और रचनात्मक क्षमता में जीवन की संस्कृति रची जाती है। महाशिवरात्रि, श्रीराम नवमी, गुरुनानक का प्रकाश वर्ष, कृष्ण जन्माष्टमी, नागपंचमी, रक्षाबंधन धार्मिक पर्व हैं। दशहरा, होली, दिवाली आदि त्योहार हैं। देवता काशी में आकर महादेव की आरती करते हैं। इनका संबंध विभिन्न ऋतुओं के साथ भी होता है। देव आराधना, आस्था जीने का सहज अध्यात्म भाव है, जो अंतत: संस्कृति में पर्यवसित होता है, जो वास्तव में जन-जीवन की प्रणाली बन जाता है। गणेशोत्सव ‘स्थापना’ से ‘विसर्जन’ जीवन यात्रा का ही रूपक है। देव हमारी आस्था के अविभाज्य अंग हैं और आस्था जीवन का मूल भाव है।

धर्म में मानव और ईश्वर की एकरूपता सिद्ध होती है। भगवान का कोई अलग अस्तित्व नहीं। ब्रह्म की सत्ता सृष्टि से अलग नहीं। इसलिए सच्ची धार्मिक चेतना में मानव कल्याण किसी न किसी रूप में अनिवार्य है। ब्रह्मा जन्मदाता, विष्णु पालक हैं, उनकी पत्नी लक्ष्मी धन-धान्य, वैभव की देवी हैं। धन त्रेयस, धातु का क्रय, उद्यम, अनुष्ठान की समग्रता में है। यह त्योहार नहीं, जीवन शैली है, हमारी संस्कृति है। लक्ष्मी का अवतरण समुद्र मंथन से हुआ। अर्थात धन-प्राप्ति के लिए सागर मंथन जैसा उच्चतम उद्यम और उपक्रम अनिवार्य है। बिना श्रम के संपदा जीवन में फलित नहीं होती।

लक्ष्मी माया भी है। इसलिए धन के प्रति सम्मान का भाव हो, न कि अंहकार का। समृद्धि के साथ शालीनता की अवधारणा है। यह भी संपदा स्थिर नहीं है। तो भी धर्म की इस मानवीय अवधारणा को धर्म के ठेकेदारों ने, मंदिरों में मठाधीशों ने, प्रारंभ से ही छिन्न-भिन्न किया है। मंदिरों की आय समाज के दान से ही होती है। इसलिए उनके हिसाब-किताब में पारदर्शिता होनी चाहिए। लेकिन जब इसकी मांग उठी है, मंदिरों के प्रबंधक और पंडे-पुजारी विरोध का झंडा उठा लेते हैं। देश में गिने-चुने मंदिर ही होंगे जो वित्तीय पारदर्शिता और समाज के प्रति जवाबदेही के तकाजे का पालन करते हों।

मंदिरों में समर्पित छोटी बच्चियों को ईश्वर की सेविका कह कर. देवदासी कह कर महिमामंडित किया गया। पर दूसरी तरफ उन्हें पंडों, पुजारियों, रईसों की वासना पूर्ति का साधन बना दिया गया। कई मंदिर बच्चियों के उत्पीड़न, शोषण का कारण बने, जहां वे अनैतिक और भयावह जीवन जीने के लिए विवश होती रही हैं। इन्हें देवदासी कहना ईश्वर का अपमान करना है। अनेक मंदिरों में हुए कुत्सित कार्यों में हत्याओं तक का जिक्र आता है। असम, बिहार, ओड़िशा, बंगाल में बड़ी संख्या में वेश्याएं थीं जो सिफलिस के रोग से पीड़ित थीं। देवदासियों से भरे मंदिरों की कहानी दुखद है।

दक्षिण भारत में कई योगिनियां अनुसूचित जातियों की युवा स्त्रियों को वर्चस्वशाली समुदाय के सदस्यों की वेश्या होती थीं जो हर तरह की प्रताड़ना, उत्पीड़न और भेदभाव का शिकार थीं। धर्म के नाम पर यह कुप्रथा चलती रही। धर्म का एक दूसरा रूप आडंबर और ढोंग का है। धार्मिक विकृति का है। जहां धर्म के नाम पर भगवान को बीस करोड़ का मुकुट पहनाया जाता है। सर्दी में भगवान को शनील की गर्म रजाइयों में सुलाया जाता है ताकि भगवान को ठंड न लगे।

मनों दूध से भगवान का अभिषेक किया जाता है। उनके आगमन से पहले मनों दूध डाल कर रास्ते को धोया जाता है। मुंबई के गणपति को पचास किलो सोने से सजाया जाता है। भगवान को छप्पन भोज है। यह सब कितना हास्यास्पद और विसंगत है। भगवान के बंदे भूखे-नंगे, ठंड, गरीबी, बीमारी से बेहाल हैं। उनके लिए नहीं सोचा जाता।

त्रिपुटी, पुरी के जगन्नाथ या उज्जैन के महाकाल मंदिरों में लोग भक्तिभाव से और श्रद्धावश दान देते हैं। इसका उपयोग मानव कल्याण के लिए होना चाहिए। कहीं छिटपुट प्रयास भी होते हैं। जैसे जरूरतमंद लोगों को मंदिर से होने वाली आय से ऋण देने का प्रावधान है। मनसादेवी के मंदिर में चढ़ावे के सोने से सोने की र्इंटें बनेंगी, जो बैंक में रखी जाएंगी जिससे जो आमदनी होगी, उसे एक संस्कृत विद्यालय खोलने और उसके अलावा समाज सेवा के कामों में लगाया जाएगा। मंदिर में जमा होने वाली अथाह धनराशि को समाज कल्याण के कार्यों में लगाना चाहिए। शिक्षा संस्थानों में, स्वास्थ्य सेवाओं में और बेसहारा लोगों के पुनर्वास में। तभी सच्चे अर्थों में धर्म और भगवान की अवधारणा जीवन में सार्थक हो सकेगी।

एक प्रश्न और, जो आज के समय में आतंकवाद से उठा है। क्या किसी मजहब का रिश्ता हिंसा और बर्बरता से हो सकता है? जिहादी आतंकवाद को, हिंसा और बर्बरता को इस्लाम से जोड़ रहे हैं। बुतपरस्त काफिरों कों जिन्हें वे इस्लाम के दुश्मन मानते हैं, उनके खिलाफ जिहाद करना इस्लाम का फर्ज मानते हैं। कट्टरवादी इस इस्लाम से कैसे बचा जा सकेगा? हिंदू धर्म लोकतांत्रिक है और मानवीय अस्मिता से अलग नहीं है। यह उस अर्थ में धर्म नहीं है जिस अर्थ में इस्लाम या ईसाइयत है। यह आस्था और जीवन शैली है, जो विविधरूपी और बहुरूपी है। इसमें विश्व-दृष्टि अंतर्भूत है। वसुधैव कुटुंबकम, तमसो मां ज्योर्तिगमय, एकोहम बहुस्याम्- यह हमारी धार्मिक और जीवन दृष्टि है। पूर्वग्रहों से अलग, धर्म को आत्म-प्रश्न पर लौटना होगा।

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