नए संकट में समाज

देश के कुछ विधानसदनों में तो माननीय विधायक तक सत्र के दौरान अपने मोबाइल पर अश्लील फिल्में देखते हुए पाए गए। मीडिया में उनकी चर्चा भी खूब हुई। लेकिन ऐसी हरकतें करने वाले माननीयों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई, यह खबर कभी पढ़ने को नहीं मिली।

Raj Kundra
सांकेतिक फोटो।

अतुल कनक

हाल में एक जाने-माने व्यवसायी और हिंदी फिल्मों की एक अभिनेत्री के पति को पिछले दिनों मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार किया। पुलिस का आरोप है कि यह व्यक्ति का अश्लील फिल्में बनाने का कारोबार कर रहा था और पूर्णबंदी के दौरान इसने सोशल मीडिया पर अश्लील फिल्मों को जारी कर करोड़ों रुपए कमाए। भारतीय दंड संहिता की धारा-292 के अनुसार अश्लील सामग्री की बिक्री और वितरण अवैध है। लेकिन यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि इंटरनेट पर ऐसी ढेर सारी सामग्री मौजूद है, जिस तक किसी भी स्मार्टफोन उपयोक्ता की पहुंच बड़ी आसान है।

इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि सस्ते इंटरनेट प्लान ने जहां उपभोक्ताओं को सूचनाओं के विस्तृत तंत्र तक पहुंचने में मदद की है, वहीं एक बड़ी आबादी को सस्ती और अश्लील सामग्री की लत भी लगा दी। उच्छृंखल मानसिकता वाले लोगों ने सस्ते मोबाइल डेटा का उपयोग यौन कुंठाएं पैदा करने वाले वीडियो और फिल्में देखने में खुल कर किया। इस प्रवृत्ति ने उन लोगों की चांदी कर दी, जो लोगों की इस विकृत मानसिकता का लाभ अपना आर्थिक उल्लू सीधा करने में करते रहे हैं।

भारतीय परंपराओं में व्यक्ति के जीवन में यौन भावनाओं के अस्तित्व के महत्त्व को स्वीकार किया गया है। काम को धर्म, अर्थ और मोक्ष के साथ एक पुरुषार्थ का दर्जा दिया गया है। लेकिन पुरुषार्थ कोई उच्छृंखल क्रीड़ा नहीं होती, अपितु एक मर्यादा के साथ संपन्न किया गया सामाजिक दायित्व होता है। सामान्य तौर पर प्राचीन भारतीय समाज मनुष्य की यौन आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति के प्रति बहुत उदार था और समाज में इस अभिव्यक्ति को भी बहुत सर्जनात्मक तरीके से व्यक्त करने की परंपरा रही है। वात्स्यायन द्वारा रचा गया ग्रंथ कामसूत्र और कोणार्क, खजुराहो जैसे मंदिरों की बाहरी दीवारों पर बने युगल अंकन इस बात का प्रमाण हैं। लेकिन भारतीय जीवन दर्शन का आग्रह यही था कि यह अभिव्यक्ति भी इस तरह से हो कि जीवन में कुंठा की बजाय सौंदर्यबोध जगाए। इस संबंध में एक रोचक मान्यता का उल्लेख किया जा सकता है।

दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में कुछ मंदिरों को ‘भंडदेवरा’ कहा जाता है। भंड शब्द की उत्पत्ति लोकभाषा के बंड शब्द से हुई है जिसे शरारती व्यक्ति के लिए विशेषण के तौर पर प्रयोग किया जाता है। संभवत: मंदिरों का यह नाम उनकी बाहरी दीवारों पर विविध क्रीड़ारत स्त्री-पुरुषों की प्रतिमाओं के प्रचुर उत्कीर्णन के कारण पड़ा। बारां जिले के रामगढ़ कस्बे में एक उल्कामुखी पर्वत पर स्थित भंडदेवरा इस तरह के सभी मंदिरों में सबसे बड़ा और सबसे सुरक्षित है। मान्यता है कि पति-पत्नी के अलावा अन्य रिश्तों में आबद्ध स्त्री-पुरुष यदि भंडदेवरा परिसर में एक साथ प्रवेश करेंगे तो अंधे हो जाएंगे। लोक आज भी इस मान्यता को एक दैवीय निर्देश समझ कर निभाता है। वस्तुत: यह मान्यता इस संभावना की ओर इंगित करती है कि यदि पति-पत्नी के अलावा अन्य स्त्री-पुरुष एक साथ इस मंदिर परिसर में प्रवेश करेंगे तो कामांध हो सकते हैं या फिर शरमा कर आंखें बंद कर सकते हैं। लोक जीवन की मर्यादाओं को अपने ही अंदाज में सुरक्षित रखने की कोशिश करता है।

दुर्भाग्य से अश्लील फिल्मों के संदर्भ में इस तरह की सुरक्षा सरकारें भी सुनिश्चित नहीं कर सकीं। ऐसे प्रकरण भी सामने आए हैं जब किसी बलात्कार के बाद अपराधियों ने कबूला कि उन्होंने अपराध की साजिश अपने फोन पर अश्लील फिल्म देखने के बाद रची। अस्सी के दशक की बात है। उन दिनों तो इंटरनेट तक बहुत कम लोगों की पहुंच हो पाई थी। लेकिन वीडियो कैसेट के माध्यम से अश्लील फिल्मों का धंधा पैर पसारने लगा था। राजस्थान के आदिवासी बहुत बांसवाड़ा जिले में एक छोटा-सा होटल वाला लोगों से पैसे लेकर एक कमरे में अश्लील फिल्में दिखाने का धंधा करता था। उसके ग्राहकों में ज्यादातर मजहूर और आदिवासी हुआ करते थे।

मामला तब खुला जब एक दिन कुछ महिलाओं ने उस दुकान के बाहर प्रदर्शन किया। प्रदर्शन करने वाली महिलाओं का कहना था कि उनके पति न केवल अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा अश्लील फिल्में देखने में खत्म कर देते हैं, बल्कि घर लौटने पर अपनी पत्नियों से अपेक्षा करते हैं कि वे वैसे ही सब करें जैसी फिल्म में कथित नायिका ने की थी। वैसा नहीं करने पर पुरुष मारपीट करते थे। यह वही दौर था जब जम्मू- कश्मीर की एक सौंदर्य प्रतियोगिता की विजेता का अश्लील वीडियो सामने आने की खबर मीडिया में सुर्खियों में रही थी। जब वीडियो कैसेट को वीडियो प्लेयर पर देखा जाता था, तब तो फिर भी अश्लीलता के नाखून किसी बंद कमरे या कैबिन तक सीमित रहा करते थे, लेकिन स्मार्टफोन ने तो अश्लीलता को मानो हर कहीं विचरने का लाइसेंस दे दिया है। देश के कुछ विधानसदनों में तो माननीय विधायक तक सत्र के दौरान अपने मोबाइल की स्क्रीन पर अश्लील फिल्में देखते हुए पाए गए। मीडिया भी उनकी चर्चा भी खूब हुई। लेकिन ऐसी हरकतें करने वाले माननीयों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई, यह खबर कभी पढ़ने में नहीं मिली। जबकि लोकतंत्र में ऐसे नेताओं के खिलाफ की गई कार्रवाई आम आदमी को भी कुछ संदेश दे सकती थी।

यौनेच्छाओं को उद्वेलित करने का कारोबार आदिम है, क्योंकि यह सभ्य समाज में भी आदिम अमयार्दाओं को पोषित करता है। दुनिया भर में इन दिनों अश्लील फिल्मों का कारोबार फल-फूल रहा है। अनेक देशों में अश्लील सामग्री का निर्माण और वितरण प्रतिबंधित है। लेकिन इंटरनेट पर ऐसी लाखों साइटें हैं जो किसी न किसी रूप में उपभोक्ता तक प्रतिबंधित सामग्री पहुंचा ही देती हैं। पश्चिमी जीवन की उन्मुक्तता ने तो अश्लीलता को एक बड़े बाजार में तब्दील कर दिया है। सन 2003 में यह अनुमान लगाया गया था कि उस साल दुनिया में कामुकता बढ़ाने वाली सामग्री की बिक्री तीस लाख डालर तक पहुंच जाएगी और उसी साल विजनगेन नामक एक पत्रिका का कहना था कि तीन साल में ही अमेरिका में अश्लील फिल्मों का व्यापार सात करोड़ डॉलर के आंकड़े को छू लेगा।

यह पंद्रह साल पुरानी बात है। तब से अब तक दुनिया की नदियों में होकर बहुत-सा पानी समुद्र में पहुंच गया है। फ्री मोबाइल डेटा और इंटरनेट ने हर आदमी के लिए अश्लील साइटों तक पहुंचना सबसे आसान कर दिया है। हालांकि देश की सर्वोच्च अदालत के निर्देश पर भारत सरकार ने आठ सौ से अधिक अश्लील साइटों को प्रतिबंधित किया है, लेकिन इंटरनेट पर तो उनकी संख्या लाखों में हैं। ये साइटें कई तरह से लोगों के जीवन को बर्बाद करती हैं। एक सर्वेक्षण में पाया गया कि अमेरिका में बलात्कार के दोषी पाए गए तिरपन फीसदी लोगों ने इंटरनेट पर पहले अश्लील फिल्में देखी थी। अश्लील सामग्री ने बच्चों के प्रति अपराध बढ़ाए हैं।

जिन लोगों की खासी सामाजिक प्रतिष्ठा है, जिन्हें दुनिया उनकी सकारात्मक या सर्जनात्मक उपलब्धियों के लिए जानती है, वे भी धनार्जन के लालच में नीली फिल्मों के काले कारोबार से जुड़े दिखें तो संवेदनशील लोग चौंकते हैं। हालांकि सब जानते हैं कि धन का लालच व्यक्ति को कई बार अविवेकी बना देता है। पिछले दिनों मुंबई में पकड़े गए नामचीन व्यापारी के अश्लील फिल्मों के निर्माण के प्रकरण में जांच एजेंसियां और कानून तो अपना-अपना काम करेंगे ही, लेकिन यह चुनौती तो समाज को ही स्वीकार करनी होगी कि वह ऐसी सामग्री के दुष्प्रभावों के प्रति लोगों को जागरूक करे। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि अश्लील फिल्में न केवल मनुष्य का पारिवारिक जीवन तहस-नहस कर देती हैं, बल्कि उसे ऐसे मनोरोगों का भी शिकार बना देती हैं कि जीवन आनंद की अनुभूति से कोसों दूर हो जाता है।

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