ताज़ा खबर
 

गदर में शहीद शहादत

छह दिनों तक टनों बर्फ के नीचे दबे लांसनायक हनुमनथप्पा के बहादुर दिल के धड़कते रहने की खबर ने देश के करोड़ों दिलों की धड़कनों को एक कर दिया था।

Author Published on: February 22, 2016 2:45 AM

छह दिनों तक टनों बर्फ के नीचे दबे लांसनायक हनुमनथप्पा के बहादुर दिल के धड़कते रहने की खबर ने देश के करोड़ों दिलों की धड़कनों को एक कर दिया था। सियाचिन की सर्वाधिक ऊंचाई पर स्थित सोनम चौकी जहां तापमान शून्य से चालीस डिग्री नीचे चला जाता है और सौ किलोमीटर की रफ्तार से बर्फीली हवाएं चलती हैं वहां हिंद की सरहदों को महफूज रखने के कर्तव्य में जुटे लांसनायक हिंदनायक बन चुके थे। ऐसा बहुत कम समय आता है जब देश के लोग धर्म, जाति, लिंग और आर्थिक वर्ग के बैनरों के नीचे से अपना सिर निकाल एक नागरिक के तौर पर खड़े हो जाते हैं।
हनुमनथप्पा की बहादुर सांसों ने कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक के लोगों को कई तरह की गैरबराबरियों को भुला हिंद की अवाम के तौर पर खड़ा कर दिया। करोड़ों लोगों की दुआएं खबरों की सुर्खियां बनने लगीं और इस सैनिक का दर्द दिलों की दूरियों को पाटने के लिए दवा बनने लगा।
लेकिन इस बाजार के दौर में हर चीज की कसौटी इसके बिक सकने की क्षमता है, न कि उसके जज्बे का उफान। लिहाजा पहले दिन जिस हनुमनथप्पा के लिए दुआओं की बाढ़ आई थी, आंखों में नमी थी, उसका पानी अगले दिन से ही उतरना शुरू हो गया। आलम यह रहा कि हनुमनथप्पा के अंतिम संस्कार की खबर पढ़ने के लिए अखबार के अंदर के पन्नों पर निगाहें दौड़ानी पड़ीं और सभी खबरिया चैनलों को खंगालना पड़ा, क्योंकि देशभक्ति के इस रंग पर हावी थी एक गदर की खबर जो बाजार के हिसाब से ज्यादा बिकाऊ थी।
तो क्या यही है खबरनवीसों के पेशे का इंसाफ? इसने एक सर्वोच्च सम्मान के हकदार के बलिदान को बाजार की कसौटी पर रख कर जिबह कर दिया। हालांकि ऐसा कोई पहली बार तो हुआ नहीं है। लिहाजा इस बार जरूरत अपने अंदर झांकने की है। बाजार की तेज दौड़ में हांफने के दौरान किसी मील के पत्थर पर बैठ थोड़ी देर सोच लिया जाए। लेकिन सच से मुंह मोड़ना उतना भी आसान नहीं। आईने के सामने खड़े होकर आप खुद को अपनी छवि को लेकर बरगला तो सकते हैं, पर उससे सुर्खरू नहीं हो सकते। क्योंकि असलियत अपने स्वाभाविक स्वरूप में आपके सामने होती है। चूंकि कांच के घर में रह कर दूसरे पर पत्थर उछालना भी उतना आसान नहीं, इसलिए इस बार आलोचना के दायरे में सब हैं। सिर झुकाए हम भी।
कुदरत की सबसे खतरनाक जगहों में से एक सियाचिन में हिंद की सरहद की रक्षा में हनुमनथप्पा की शहादत पर अरावली की खूबसूरत पहाड़ियों के बीच बने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रांगण में गूंजे नारे हावी हो गए। सियाचिन के सूरमा के जिंदाबाद की जगह ‘भारत की बर्बादी’ के नारों ने ली। जमा देने वाले मौसम में भारत के कुछ मील की सरहदों की रक्षा के जज्बे पर देश को टुकड़े-टुकड़े करने की चाह चढ़ बैठी।
अब सब उसी तरफ घूम गए। बाजार की जंग में शहादत को एक बार और शहीद होना पड़ा। खबर को बेचना है और हिंसा को बिकना है, सबसे बड़ी बोली के साथ। काश, जेएनयू के परिसर में देश के मुर्दाबाद के नारे लगाने वालों ने एक क्षण को भी याद किया होता कि हनुमनथप्पा ने अपनी नौकरी का सबसे ज्यादा समय दुर्गम इलाकों में बिताया था। सियाचिन में ड्यूटी देने वाले हर जवान को अहसास होता है कि वे कभी भी बर्फीली कब्र में समा सकते हैं, किसी भी कुदरती कहर का शिकार हो सकते हैं। अगर वे अपने दिमाग में बैठा लें कि चंद मीलों के लिए क्यों जान कुर्बान की जाए तो आगे देश का एक इंच भी सुरक्षित नहीं बचेगा।
लेकिन देशहित की यह बात शायद पुराने फैशन की है। अगर आप ‘अल्ट्रा’ न बने, राष्टÑ राज्य को चुनौती नहीं दी, प्रतिक्रियावादी नहीं हुए तो मजा क्या! किसान, जवान और विज्ञान की बातें छोड़ ‘अफजल गुरु के कातिलों की जिंदगी पर शर्मिंदा’ होकर आप अलग दिखने की कोशिश करते हैं, अपना बाजार बनाते हैं।
दरअसल, हनुमनथप्पा जब आखिरी सांस की जंग लड़ रहे थे, तभी गुमराहकुन नौजवानों का एक दल जेएनयू के परिसर में संसद पर हमलों के दोषी अफजल गुरु की बरसी पर कार्यक्रम की इजाजत मांग रहा था। हनुमनथप्पा की उखड़ती सांसों के जरिए जब देश के लोग नागरिक की तरह व्यवहार करना सीख रहे थे, तभी जेएनयू से निकले बगावत के नारों ने बाजार पकड़ लिया। हमें पता नहीं, वे किससे आजादी की मांग कर गदर की बात कह रहे थे। लेकिन इस ‘बौद्धिक केंद्र’ में लांसनायक के लिए सभा करने की जरूरत महसूस नहीं की गई।
सियाचिन के बर्फीले तूफान की गिरफ्त में आए इस जवान को अगर अपनी अंतिम सांस लेनी ही थी तो ऐसी कोई सभा शायद ही उनकी कोई मदद कर पाती। लेकिन एक समर्पित भावना का इजहार-ए-खयाल तो निश्चित ही कर जाती। जेएनयू में जो हुआ उससे जाहिर है कि देश की युवा पीढ़ी किस दिशा में जा रही है।
युवा मन का दिशाभ्रमित हो जाना उतना हैरतअंगेज नहीं, जितना आश्चर्यजनक गुरुजनों का व्यवहार है जो उसके सही रास्ते पर लाने के अपने कर्तव्य से बड़ी सुविधा से विमुख हो जाते हैं। यह कह कर कि ये सब छात्र बड़े हैं, अपना भला-बुरा समझते हैं। लेकिन एक संकट के खड़े हो जाने के बाद यही गुरुजन कहते हैं कि बच्चे हैं, इनकी बात को उतनी भी गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। गुरुजनों की यह छद्म संजीदगी कहीं से भी अनुकरणीय नहीं है। ऐसे में चिंता का बड़ा विषय गुरुजनों का व्यवहार भी है।
बहरहाल, खेद इस बात का है कि सभी खुद को हालात के हाथों मजबूर होने का बहाना लेकर बच निकलना चाहते हैं। बड़ी खबर की तलाश में जुटे पेशेवर भी हनुमनथप्पा से बड़ी खबर के आते ही अपना रुख बदल लेते हैं। लेकिन यह कितना उचित है, इस पर सवाल लाजमी है, क्योंकि हनुमथप्पा की मौत महज एक जवान की मौत नहीं है। यह मिसाल है एक जवान के जीवट की और उसके सर्वोच्च बलिदान की। बर्फ की कब्र में दफन होकर भी अपनी सांसों की डोर को थाम कर बाहर निकले इस जवान ने तो देश के लिए अपने जज्बे का लोहा मनवा लिया, लेकिन क्या हम सब उस जज्बे को वैसी ही निष्ठा से ले पाए।
कहीं हमने हनुमनथप्पा के बलिदान के सामने किसी भी ‘बड़ी खबर’ को बड़ा मान कर चूक तो नहीं की। समय है अपने गिरेबां में झांकने का। रही बात हनुमनथप्पा की, तो वे तो करोड़ों दुआएं समेट कर चले गए और आने वाली पीढ़ियों का सलाम लेते ही रहेंगे। जब तक हिंद की आन रहेगी, उनकी शहादत की शान भी रहेगी। हिंदनायक को तो बस सलाम।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories