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आर्थिक विजय स्तूपों की असली तस्वीर

आधिकारिक रिपोर्टों की ओर देखें तो लगता है कि देश अचानक तरक्की के वे मरहले पार कर गया, जिसका सपना कभी देखा गया था।

आर्थिक विजय स्तूपों की असली तस्वीर
सांकेतिक फोटो।

सुरेश सेठ

भारत का केंद्रीय रिजर्व बैंक घरेलू मुद्रास्फीति के दबाव को रोकने के लिए रेपो रेट में आक्रामक रुख बनाए हुए है, लेकिन इसके साथ स्टार्टअप निवेश के आंदोलन, खेती-बाड़ी को लघु और कुटीर उद्योगों के साथ जोड़ने और सहकारी आंदोलन को पुनर्जीवित करने का प्रयास सफल होता दिखाई नहीं दे रहा। इसीलिए लगता है कि सपनों की बुलंदियां चाहे जितनी भी ऊंची हों, लेकिन वास्तविकता उससे परे कोई और तस्वीर दिखा रही है।

सितंबर का महीना देश की आर्थिकी के रण में जैसे विजय पताकाएं लहराता आया है। आधिकारिक रिपोर्टों की ओर देखें तो लगता है कि देश अचानक तरक्की के वे मरहले पार कर गया, जिसका सपना कभी देखा गया था। एक देश एक कर, बहुत बड़ा सपना था, जिसमें जीएसटी उभरा और अभी जो नया आंकड़ा आया है, वह बता रहा है कि अगस्त में जीएसटी संग्रह 1.40 लाख करोड़ रुपए से पार चला गया। कभी सोचा गया था कि एक लाख करोड़ रुपए की प्राप्ति देश के लिए इष्टतम प्राप्ति होगी। शुरू के वर्षों में तो यह प्राप्ति इससे कहीं पीछे रह गई।

अब कोरोना के बाद पैदा हुई मांग में सुधार, महंगाई की ऊंची दरों या कर मशीनरी का बेहतर अनुपालन, इनमें से किसकी या इन सबकी कृपा है कि जीएसटी इन बुलंदियों तक पहुंच गया है। दूसरी ओर रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास साहब का बयान आ गया कि महंगाई के विरुद्ध हमने जो अभियान शुरू किया था उसमें विजय प्राप्ति होने लगी है। अनुमान है कि अगले वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में महंगाई कम होकर पांच फीसद के स्तर पर आ जाएगी।

जहां तक भारत को डिजिटल बना देने का संबंध है, आंकड़ा बता रहा है कि हम दुनिया में डिजिटल लेनदेन में सबसे आगे चले गए। यहां रोजाना 28.4 करोड़ रुपए का डिजिटल लेनदेन हो रहा है और 11.37 करोड़ किसानों को दो लाख करोड़ से अधिक की मदद दे दी गई है। इलेक्ट्रानिक्स और आइटी मंत्रालय कहता है कि इस क्षेत्र में भारत की सफलता की कहानी एक उदाहरण है। विकासशील देश ही नहीं, बल्कि विकसित देश भी इससे सीख लें। नागरिकों के जीवन में सुधार आ गया। शासन में सुधार के लिए प्रौद्योगिकी के उपभोग का यह प्रमुख देश बन गया।

उधर मैकिंजी ऐंड कंपनी के पश्चिमी विशारद भी भारत की तारीफ करते हुए नहीं थकते। वे कह रहे हैं कि दुनिया के लिए भविष्य की प्रतिभा का कारखाना है भारत। मैकिंजी कहता है कि हम इसी साल दिसंबर में भारत आएंगे। इस समय इस कंपनी में भारत के पांच हजार लोग हैं। बड़े प्रतिभावान हैं। इनकी संख्या हम दोगुनी कर देंगे। हमारी सफलता का कारण जो बताया जा रहा है, वह है वैश्विक आपूर्ति को पूरी करने वाली कंपनियां, कामकाजी आबादी और डिजिटल पैमाने में छलांग। हमारे पास सब कुछ है। बड़ी संख्या में काम करने वाले लोग हैं।

बहुराष्ट्रीय कंपनियां वैश्विक आपूर्ति कर रही हैं और 2047, जब हम सोचते हैं कि अपनी अर्थव्यवस्था का आकार पांच गुना बढ़ा देंगे यानी उसको 27 अरब डालर तक ले जाएंगे, 2029 में इसे पांच अरब डालर तक पहुंचा देना हमारा सपना तो है ही। तब हमारे भारतीय कौशल का यह चमत्कार होगा कि कुल कामकाजी आबादी में हमारी हिस्सेदारी बीस फीसद हो जाएगी। विनिर्माण के लिए हमारे देश में इतनी संभावनाएं हैं कि इनका अगर पूरा उपयोग कर लिया जाए तो बड़ी शक्तियां भी भारत का लोहा मान जाएंगी।

कितनी अच्छी बातें हैं, कितने अच्छे आंकड़े हैं। भारत की 142 करोड़ जनता इन स्वप्नमुखी आंकड़ों को देख कर हर्षित और प्रफुल्लित हो सकती है। अभी वह आजादी का अमृत महोत्सव मना कर हटी है। उसके सामने पच्चीस साल का विकास और मेहनत का पथ बिछा दिया गया है, जिस पर चलेंगे तो 2047 में भारत एक विकसित देश बन जाएगा। एक प्रफुल्लित देश बन जाएगा और उसके अच्छे दिन पहचाने नहीं जाएंगे।

मगर आज जब इस पहचान के चंद चिह्न असल रूप से पहचानना चाहते हैं, तो पाते हैं कि बहुत कुछ है, जो केवल वायवीय स्तर पर ही हुआ। घोषणाओं के स्तर पर ही हुआ। सफल आंकड़ों के स्तर पर ही हुआ और जब लोगों ने अपनी जेबें तलाशीं तो उन्हें लगा कि वे एक मिथ्या आडंबर में जी रहे हैं। दुनिया की साख निर्धारण करने वाली कंपनी मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने 2022 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि का अनुमान घटा कर 7.7 फीसद कर दिया। जबकि इसी मूडीज ने इससे पहले यह अनुमान 8.8 फीसद बताया था।

आर्थिक विशारद कहते हैं कि ऊंची ब्याज दरें जहां निवेश को हतोत्साह करेंगी, वहां अवसादग्रस्त मंडी की मंदी अवस्था उसे और भी ठंडा कर देगी। मानसून अप्रत्याशित रहा। देश के पचपन फीसद भाग में औसत से कम बारिश हो गई और पैंतालीस फीसद में वो धारासार बारिश हुई कि बादल फट रहे हैं, बाढ़ आ रही है, धन-संपदा की हानि हो रही है। इसके साथ विश्व भर में चाहे वह रूस-यूक्रेन तनाव की वजह से हो या अमेरिका द्वारा अपनी मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के प्रयासों में अपनी फेडरल ब्याज दरों को बढ़ाने का प्रयास, इसने भारत से विदेशी निवेश को भगोड़ा कर दिया है।

चाहे भारत का केंद्रीय रिजर्व बैंक घरेलू मुद्रास्फीति के दबाव को रोकने के लिए रेपो रेट में आक्रामक रुख बनाए हुए है, लेकिन इसके साथ स्टार्टअप निवेश के आंदोलन, खेती-बाड़ी को लघु और कुटीर उद्योगों के साथ जोड़ने और सहकारी आंदोलन को पुनर्जीवित करने का प्रयास सफल होता दिखाई नहीं दे रहा। इसीलिए लगता है कि सपनों की बुलंदियां चाहे जितनी भी ऊंची हों, लेकिन वास्तविकता उससे परे कोई और तस्वीर दिखा रही है। इसके साथ ही भारत की मूल समस्याएं हल नहीं हो पा रहीं।

सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी की है। हमने यह तो कह दिया कि भारत के आर्थिक विकास में इस वित्तवर्ष की पहली तिमाही में 13.7 प्रतिशत की अप्रत्याशित वृद्धि प्राप्त कर ली है, लेकिन यह वृद्धि देश के बेरोजगारों के हिस्से में कितनी आई है और बड़े घरानों के हिस्से में कितनी, यह शोध की बात होगी। भारत पचहत्तर वर्ष पहले चला था, एक प्रजातांत्रिक समाजवादी व्यवस्था की स्थापना के लिए, जहां गरीब और अमीर में कोई भेद नहीं होगा। सही ढंग से जीने के अवसर सबको मिलेंगे और तरक्की करने में कोई इसलिए पिछड़ा नहीं रह जाएगा कि वह गरीब घर का बेटा है।

जन कल्याण योजनाएं इसीलिए शुरू की गई थीं, लेकिन अब वे रेवड़ी संस्कृति के दबाव में फंसती हुई दिखाई दे रही हैं। इसीलिए महंगाई के आंकड़े आम जनता की जेबें तराशने में लगे हैं। चोरबाजारी, कालाबाजारी के अहलकार अपना-अपना खेल खेलने में निमग्न हैं और ऐसी बातें क्यों सामने आ रही हैं कि देश की युवा पीढ़ी के लिए देश में रोजगार की व्यवस्था की गति इतनी धीमी है कि उसे निराश होकर विदेश की ओर पलायन करना पड़ता है और वहां भी आजकल उसके लिए दरवाजे बंद हो रहे हैं।

इधर भारत का विदेशी कर्ज 8.2 प्रतिशत बढ़ कर 620.7 अरब डालर तक पहुंच गया और हमारा विदेशी मुद्रा भंडार जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार में देश की साख होता है, वह तीन अरब डालर क्यों घट गया? हम कह सकते हैं कि भारत दुनिया में पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया। हमने 2021 की आखिरी तिमाही में ब्रिटेन को पछाड़ दिया।

हमारी तेज विकास दर दुनिया की शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं का मुकाबला कर सकती है, लेकिन दूसरी ओर दूध के मूल्य में वृद्धि से एक-तिहाई परिवारों ने अपनी खपत क्यों घटा दी है? नई शिक्षा नीति व्यवसाय के नए मील पत्थर प्रस्तुत करने के बजाय आइलैट अकादमियों में बैंड प्राप्त करने की अंधी दौड़ क्यों सामने ला रही है? क्या हमारी नीतिगत व्यवस्था में कुछ ऐसा गलत है, जिसकी पहचान हम नहीं कर पा रहे और उपलब्धियों के झंझावात में अपना सही रास्ता तो नहीं भूल रहे, जिसे आम आदमी के गिर्द रहना चाहिए।

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