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राजनीति: मकसद से भटकता G-20

जी-20 में यूरोपीय संघ का हस्तक्षेप भी बहुत बढ़ा है। यूरोपीय संघ में शामिल देशों और यूरोपीय संघ के साथ मिल कर व्यवसाय की नवनीतियों और कार्ययोजनाओं पर ध्यान लगाए जी-20 के एकाधिक सदस्य देशों की मंशा के अनुरूप जी-20 देशों के मध्य क्रिप्टो करेंसी के विनिमय को अपनाने पर विचार हो रहा है। जिस तरह यूरोपीय संघ जी-20 में अपनी संघीय कार्यनीतियों के अनुसार हस्तक्षेप कर रहा है, उस स्थिति में जी-20 की प्रासंगिकता और प्रामाणिकता ही संदिग्ध लगने लगी है।

जी-20 समूह के सदस्यों में अर्जेंटीना, आॅस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, मेक्सिको, रूस, सउदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, तुर्की, ब्रिटेन, अमेरिका जैसे देश और यूरोपियन संघ सम्मिलित हैं। (एजंसी)

अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में आयोजित तेरहवां जी-20 शिखर सम्मेलन विश्व की आर्थिक और व्यापारिक गतिविधियों को एक अंतरराष्ट्रीय नियम के अधीन लाकर स्थिरता व संतुलन प्रदान करने के संकल्प के साथ संपन्न हुआ। दक्षिण अमेरिका के भू-भाग पर यह आयोजन पहली बार हुआ। जी-20 में अमीर और गरीब देश हैं। लेकिन अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि जी-8 को लेकर विश्व के प्रमुख देशों में जैसे मतभेद उभरे थे और जिन कारणों से जी-8 की स्थापना के उद्देश्यों और लक्ष्यों को हासिल नहीं किया जा सका, कमोबेश वही स्थिति आज जी-20 में भी बनती जा रही है। यह समूह विश्व में जिस समान आर्थिक विनिमय, कारोबार के संतुलित परिचालन और वैश्विक अर्थव्यवस्था को भ्रष्टाचार मुक्त व पारदर्शी बनाने के संकल्प के साथ अस्तित्व में आया था, उस पर कोई काम नहीं हो रहा है। जी-20 जैसे समूह की स्थापना का मकसद अर्द्ध-विकसित और विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था को विकसित देशों के समान बनाने का भी था। लेकिन इस दिशा में भी अपेक्षित सफलता के संकेत नहीं मिल रहे हैं। कुल मिला कर जी-20 का मंच सदस्य देशों की द्विपक्षीय और त्रिपक्षीय वार्ताओं का मंच बन कर रह गया है।

जी-20 समूह के सदस्यों में अर्जेंटीना, आॅस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, इटली, जापान, मेक्सिको, रूस, सउदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, तुर्की, ब्रिटेन, अमेरिका जैसे देश और यूरोपियन संघ सम्मिलित हैं। जी-20 में स्वतंत्र रूप में उन्नीस देश और यूरोपीय संघ शामिल हैं। यूरोपीय संघ की ओर से इस समूह में यूरोपीय आयोग और यूरोपीय केंद्रीय बैंक प्रतिभागिता करता है। सामूहिक रूप में जी-20 की विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में 85 फीसद, वैश्विक व्यापार में 80 फीसद (यदि यूरोपीय संघ के परस्पर-व्यापार को छोड़ दें तो 75 फीसद) की सहभागिता है। जी-20 के सदस्य देशों में विश्व की दो-तिहाई जनसंख्या रहती है और इनके पास विश्व के कुल भू-क्षेत्र का लगभग आधा भू-क्षेत्र है। इस समूह में वैश्विक अर्थव्यवस्था, व्यापार और मुद्रा आधारित लाभांश के वितरण संतुलन के संबंध में इन बीस देशों की सरकारों और केंद्रीय बैंक के गर्वनरों की सहभागिता होती है। जी-20 की स्थापना को बीस साल होने जा रहे हैं। इस समूह को बनाने का मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय वित्तीय स्थिरता के संवर्द्धन से संबंधित नीति पर चर्चा करना था। सन 2008 तक जी-20 अपने स्थापित वित्तीय लक्ष्यों को पाने की दिशा में अधिक सक्रिय नहीं था।

स्थापना के समय से ही जी-20 समूह की सदस्यता के लिए निर्धारित नीतियों की विश्व के अनेक विचारकों द्वारा आलोचना की जाती रही और साल-दर साल आयोजित होने वाले इसके शिखर सम्मेलनों का वामपंथी समूहों और अन्य विरोधी संगठनों द्वारा विरोध किया जाता रहा है। संभवत: जी-20 की ऐसी कमियों को लेकर ही अर्जेंटीना के पूर्व राष्ट्रपति क्रिस्टीना फर्नांडेज डे किर्चनर ने सम्मेलन के विरोध में एक समानांतर सम्मेलन आयोजित किया, जिसे अर्जेंटीना में जटिल विचारों का प्रथम विश्व मंच पुकारा जा रहा है। क्रिस्टीना ने जी-20 विरोधी सम्मेलन में अर्जेंटीना के वर्तमान राष्ट्रपति की आर्थिक नीतियों और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से मिलने वाले कर्जों की आलोचना की और सरकार की तुलना जर्मनी के नाजियों से की। इस विरोध में उरुग्वे के पूर्व राष्ट्रपति जोस मुजिका भी निमंत्रित थे, पर उन्होंने अर्जेंटीना के साथ अपने देश के संबंधों के बिगड़ने के भय से इसमें शामिल होना उचित नहीं समझा।

पिछले उन्नीस वर्षों से जी-20 विभिन्न वैश्विक वित्तीय समस्याओं को लेकर एक समेकित नीति बनाता आया है, पर फिर भी समूह के सदस्य देशों और दूसरे देशों की अर्थव्यवस्थाएं संतुलित नहीं हो पार्इं और न ही वैश्विक व्यापार की कार्य दशाएं सुव्यवस्थित हो सकीं। जी-20 ने इस बार के सम्मेलन में अपनी व्यापारिक और वित्तीय कठिनाइयों के संदर्भ में तीन विचार बिंदु प्रस्तुत किए हैं। पहला- भावी कार्य, दूसरा- विकास हेतु अवसंरचना और तीसरा, दीर्घकालिक खाद्य आपूर्ति पर आधारित विकास।

वास्तव में जी-20 की स्थापना जिन वित्त व्यवस्थाओं की जटिलताओं का उन्मूलन करने के लिए की गई थी, वह समूह के कार्यक्रमों में प्रमुखता से नहीं उठाई जा रहीं। इसके विपरीत जी-20 जैसा मंच संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयोग द्वारा बताई गई सामाजिक, धार्मिक, असमानता और भुखमरी जैसी समस्याओं पर चर्चा करने और इस दिशा में अपने भावी कार्यक्रम निर्धारित करने का माध्यम बनता जा रहा है। यही कारण है, जो जी-20 जैसा मंच अपनी स्थापना के सामूहिक कार्य उद्देश्यों की पूर्ति में कम और सदस्य देशों की द्विपक्षीय और त्रिपक्षीय वार्ताओं में उठने वाली समस्याओं का समाधान करने में अधिक कायर्शील हो रहा है।
जी-20 में यूरोपीय संघ का हस्तक्षेप भी बहुत बढ़ा है। यूरोपीय संघ में शामिल देशों और यूरोपीय संघ के साथ मिल कर व्यवसाय की नवनीतियों और कार्ययोजनाओं पर ध्यान लगाए जी-20 के एकाधिक सदस्य देशों की मंशा के अनुरूप जी-20 देशों के मध्य क्रिप्टो करेंसी के विनिमय को अपनाने पर विचार हो रहा है। जिस तरह यूरोपीय संघ जी-20 में अपनी संघीय कार्यनीतियों के अनुसार हस्तक्षेप कर रहा है, उस स्थिति में जी-20 की प्रासंगिकता और प्रामाणिकता ही संदिग्ध लगने लगी है। जी-20 का अहम सदस्य ब्रिटेन, जो 2015 से यूरोपीय संघ से बाहर जाने के लिए ब्रेक्जिट जैसा जनमत संग्रह आंदोलन चला रहा है, भला वह जी-20 में यूरोपीय संघ की किसी भी नीति का समर्थन कैसे कर सकता है! इसी तरह की विभिन्न विसंगतियों को लेकर जी-20 के अन्य देश परस्पर विवादों से घिरे हुए हैं।

आज जी-20 अपनी स्थापना के उद्देश्यों से भटक रहा है। लेकिन भारत की पहल के कारण इस बार जी-20 में नौ सूत्रीय विषयों को लेकर सर्वसहमति बनी और इस पर काम करने की दृढ़ता प्रदर्शित की गई है। इसमें देश छोड़ कर भागे आर्थिक अपराधियों को पकड़ने, उनके धन-संसाधन और व्यवसाय का अधिग्रहण करने के लिए आवश्यक कानूनों और प्रत्यर्पण संधियों को आसान और लचीला बनाने पर रजामंदी हुई। भारत की ओर से आतंक के वित्त-पोषण को भी आर्थिक अपराध में शामिल करने का ठोस तर्क दिया गया, जिसे जी-20 में शामिल और आतंक पीड़ित अधिसंख्य देशों ने गंभीरता से स्वीकार किया। जी-20 से अलग दुनिया के शक्तिशाली देशों की दो त्रि-पक्षीय बैठकें हुर्इं। एक बैठक में अमेरिका, जापान और भारत तो दूसरी में रूस, चीन और भारत शामिल थे। रूस, चीन और भारत बारह साल बाद एक साथ एक मंच पर थे। इन तीनों देशों ने संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और दूसरे अंतरराष्ट्रीय प्रभाव वाले संस्थानों में सुधारों पर चर्चा करते हुए जी-20 में शामिल शक्तिशाली यूरोपीय राष्ट्रों को संकेत दिया कि वे उक्त संस्थानों पर एकाधिकार की नीति का त्याग करें।

अमेरिका और जापान के साथ हुई बैठक में भारत ने दक्षिण एशियाई भू-भागों व दक्षिण चीन सागर में चीन की विस्तार, अधिकार वादी कूटनीति पर अपना पक्ष रखा, तो रूस और चीन के साथ हुई वार्ता में उसने विश्व में समाजार्थिक संतुलन साधने के लिए रूस व चीन को साम्राज्यवाद की धारणा त्यागने का संकेत दिया। जी-20 के अलावा ब्रिक्स देशों के प्रमुखों का भी एक सम्मेलन हुआ। वैसे तो जी-20 के बहाने भारत, जापान, अमेरिका, चीन, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और अन्य देशों द्वारा विभिन्न समस्याओं को लेकर द्विपक्षीय और त्रिपक्षीय वार्ता करना गलत नहीं और कहीं न कहीं ऐसी वार्ताएं जी-20 की सामूहिक भावना को ही बल प्रदान करेंगी, परंतु समूह-20 वास्तव में जिन वित्त संबंधी वैश्विक कार्यों के लिए गठित हुआ था, प्राथमिकता के आधार पर उस संबंध में कुछ नहीं हो पा रहा है।

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