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राजनीतिः बढ़ती आबादी, घटता खाद्यान्न

दुनिया के सभी लोग पेट भरने के लिए केवल नौ या दस पादप प्रजातियों पर आश्रित हैं। समस्या यह है कि ये सारे स्रोत अपने उत्पादन का सर्वाधिक स्तर छू चुके हैं। यहां तक कि नवीकृत स्रोत भी हमेशा के लिए रहने वाले नहीं है। ऐसी स्थिति में लोग अन्य विकल्पों की बात करते हैं। लेकिन जब कई सारे खाद्य स्रोत एक साथ खत्म होने को हों तो किसे विकल्प बनाया जाए?

कई खाद्यान्न और खाद्य पदार्थ अपने सर्वाधिक उत्पादन को छू कर अब ढलान की ओर उन्मुख हैं। यानी उनकी पैदावार दर कम हो रही है।

दुनिया की आबादी जिस रफ्तार से बढ़ रही है, उस हिसाब से खाद्यान्न उत्पादन नहीं बढ़ रहा है। इसके साथ-साथ खेती की जमीन भी खराब हो रही है। यूरोपीय आयोग के संयुक्त अनुसंधान केंद्र की रिपोर्ट ‘वर्ल्ड एटलस आॅफ डेजर्टीफिकेशन’ के आंकड़ों के अनुसार आने वाले कुछ ही वर्षों में दुनिया भर में खाने के लाले पड़ने वाले हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि भारत, चीन और उप-सहारा अफ्रीकी देशों में स्थिति सबसे गंभीर होगी। रिपोर्ट के मुताबिक जलवायु परिवर्तन की वजह से प्रदूषण, भू-क्षरण और सूखा पड़ने से पृथ्वी के तीन चौथाई भूमि क्षेत्र की गुणवत्ता खत्म हो गई है। सदी के मध्य तक यह आंकड़ा बहुत अधिक बढ़ने की आशंका है। अगर ऐसे ही भूमि की गुणवत्ता खत्म होती रही तो इससे कृषि पैदावार को नुकसान होगा। वर्ष 2050 तक वैश्विक अनाज उत्पादन काफी कम हो जाएगा।

कई खाद्यान्न और खाद्य पदार्थ अपने सर्वाधिक उत्पादन को छू कर अब ढलान की ओर उन्मुख हैं। यानी उनकी पैदावार दर कम हो रही है। इनमें अंडे, मांस, सब्जियां, सोयाबीन, गेहूं और चावल समेत 21 खाद्य पदार्थ शामिल हैं। इसे दुनिया की खाद्य सुरक्षा के लिए एक बड़े संकट की तरह देखा जा रहा है। साल 2006 में सर्वाधिक स्तर छूने के बाद चिकन का उत्पादन सुस्त हो गया। दूध और गेहूं ने अपना सर्वाधिक उत्पादन स्तर 2004 में छू लिया। चावल इससे पहले 1988 में ही सर्वाधिक उत्पादन का रिकार्ड बना कर ढलान की ओर है। ऐसे में इतने कम समयावधि के बीच कई सारे अहम खाद्य स्रोतों के उत्पादन में गिरावट दुनिया के सामने बड़ी चिंता का विषय है।

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दुनिया की आबादी 2050 में लगभग नौ अरब हो जाएगी। इसके लिए मौजूदा खाद्यान्न उत्पादन से दोगुने की जरूरत पड़ेगी। इसलिए संकट गहरा है। भारत जैसे कृषि प्रधान देशों को इसके लिए अभी से नए उपाय करने होंगे। इसके साथ ही अपनी आबादी पर भी लगाम लगानी होगी। वेल यूनिवर्सिटी, मिशीगन स्टेट यूनिवर्सिटी और जर्मनी के हेमहोल्ज सेंटर फॉर एनवायरमेंट रिसर्च के एक ताजा अध्ययन के मुताबिक परीक्षण किए गए इक्कीस खाद्यान्नों में सोलह खाद्यान्न स्रोत 1988 से 2008 के बीच अपना सर्वाधिक उत्पादन दे चुके हैं। इसके अलावा दुनिया के सभी लोग अपना पेट भरने के लिए केवल नौ या दस पादप प्रजातियों पर आश्रित हैं।

समस्या यह है कि ये सारे स्रोत अपने उत्पादन का सर्वाधिक स्तर छू चुके हैं। यहां तक कि नवीकृत स्रोत भी हमेशा के लिए रहने वाले नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी स्थिति में लोग अन्य विकल्पों की बात करते हैं। एक स्रोत के खत्म होने पर दूसरे स्रोत पर निर्भर होने की बात की जाती है, लेकिन जब कई सारे खाद्य स्रोत एक साथ खत्म होने को हों तो किसे विकल्प बनाया जाए? जाहिर तौर पर यह एक बड़ा संकट है। एक ऐसा बिंदु जहां पर किसी फसल, जंतु या अन्य किसी खाद्य सामग्री की उत्पादन दर मंद पड़ जाती है। इस बिंदु और समय के बाद कुल उत्पादन में लगातार वृद्धि तो होती है, लेकिन उत्पादन दर कम हो जाती है। यहीं से चीजें गलत दिशा में जाने लगती हैं। यह स्थिति किसी खतरे की घंटी जैसी होती है। तेजी से बढ़ रही आबादी अपने आवास, खेती, कारोबार और बुनियादी ढांचे को तैयार करने के लिए जमीन का इस्तेमाल कर रही है। कृषि सहित अन्य भोजन के स्रोतों के लिए जमीन कम होती जा रही है। इसके साथ ही ज्यादा खाद्यान्न पैदा करने के लिए जमीन और पानी का अधिकाधिक इस्तेमाल किया जाने लगा है। लिहाजा खत्म होते इन संसाधनों से भविष्य में खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि को बड़ा झटका लग सकता है।

संयुक्त राष्ट्र के टिकाऊ विकास एजंडे के तहत दुनिया भर के राष्ट्राध्यक्षों ने भूमि क्षेत्र को रेगिस्तान बनने से बचाने, भूमि व मिट्टी की गुणवत्ता लौटाने के प्रयास करने के लिए प्रतिबद्धता दिखाई थी। इस एजंडे के तहत उस भूमि को भी रखा गया था जो मरुस्थल बन गई है, जहां सूखे या बाढ़ का प्रकोप रहता है। उनका लक्ष्य था कि 2030 तक समूची पृथ्वी के भूमि क्षेत्र को उसकी गुणवत्ता लौटाई जा सके। इसके बावजूद अब तक किसी भी देश ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। भारत में भी जिस खेती पर देश की करोड़ों जिंदगियां गुजर-बसर कर रही हैं, उसका हाल भी अच्छा नहीं है। खेती की भूमि की उर्वरता और क्षरण को लेकर कई अध्ययन हुए हैं। पर पहली बार अमदाबाद के स्पेस एप्लिकेशन सेंटर ने सत्रह अन्य एजंसियों की मदद से पूरे देश की कृषि भूमि की दशा का ब्योरा पेश किया है। इसके अनुसार देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का चौथाई हिस्सा रेगिस्तान में तब्दील हो गया है। कुल बत्तीस फीसद भूमि की गुणवत्ता घटी है।

वहीं देश की उनहत्तर फीसद जमीन शुष्क क्षेत्र में शुमार की गई है। जमीन की गुणवत्ता को जल्द ही खराब होने से बचाने का बड़ा अभियान शुरू नहीं किया गया तो देश की आबादी के बड़े हिस्से के लिए न सिर्फ आजीविका का संकट और गहरा जाएगा, बल्कि जैव-विविधता का जबर्दस्त नुकसान होगा। जमीन की गुणवत्ता कई तरह से खराब हो रही है। अब तक राजस्थान और कुछ हद तक गुजरात को रेगिस्तान के लिए जाना जाता है। मगर यह अध्ययन बताता है कि रेगिस्तान की प्रक्रिया बर्फीली वादियों और जंगलों के लिए मशहूर जम्मू और कश्मीर तक में चल रही है। राजस्थान का 21.77 फीसद, जम्मू और कश्मीर का 12.79 फीसद और गुजरात का 12.72 फीसद क्षेत्र रेगिस्तान बन चुका है।

हाल में अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान (आइएफपीआरआइ) के शोधपत्र में बताया गया है कि गुजरात में 2000 से कृषि मूल्यवर्धन साढ़े नौ फीसद सालाना की दर से बढ़ रहा है जो भारत की विकास दर के मुकाबले दोगुने से भी अधिक है और पंजाब में हरित क्रांति के दौरान हासिल की गई विकास दर के मुकाबले अधिक है। इसके अलावा हजारों की संख्या में चेक डैम बनाए गए हैं, ड्रिप सिंचाई को बढ़ावा दिया गया है और ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क नेटवर्क में भारी बढ़ोत्तरी की गई है। गुजरात में कपास के किसान समृद्ध हैं, जबकि विदर्भ में किसानों को आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। गुजरात में शुरू हुई श्वेत क्रांति इक्कीसवीं सदी में भी जारी है।

वर्ष 2050 तक भारत की आबादी एक अरब साठ करोड़ से ऊपर हो जाएगी। इसके साथ ही खाद्यान्न की मांग भी दोगुनी बढ़ जाएगी। पर कृषि के विस्तार के लिए हमारे पास सीमित संभावनाएं ही बची हैं। लेकिन खाद्य आपूर्ति बढ़ाने के लिए इसकी जरूरत तो पड़ेगी ही। हरित क्रांति के दौरान हमने फसलों की पैदावार को तीन से छह फीसद तक बढ़ा लिया था, अब यह बस एक फीसद की रफ्तार से बढ़ रही है। कुछ जगह तो इस पर विराम ही लग गया है। खाद्य विशेषज्ञों के अनुसार मांग के मुताबिक मौजूदा खाद्यान्न उत्पादन का दोगुना लक्ष्य हासिल करना मुश्किल है। इस भयावह स्थिति से बचने के लिए मिट्टी संरक्षण, टिकाऊ जमीन और जल के सीमित उपयोग की नीतियां कृषि, जंगल और जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में लागू करनी होगी। अमूल्य संसाधनों के उपयोग के तौर-तरीके बदलने होंगे। हमें खान-पान की शैली में बदलाव के साथ मितव्ययी तरीका अपनाना होगा। अभी विश्व में जितना खाद्यान्न उत्पादन होता है, उसका तीस से चालीस फीसद बर्बाद हो जाता है। इस बर्बादी को बचा कर हम अपनी खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं।

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