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राजनीतिः वर्षाजल को सहेजने का समय

पानी सबकी जरूरत है, मनुष्य और पशु-पक्षियों से लेकर वनस्पतियों तक। और इसका कोई विकल्प नहीं है, यानी पानी का काम हम किसी और चीज से नहीं ले सकते। फिर, पानी का उत्पादन नहीं हो सकता। उसे सिर्फ प्रदूषण से बचाया और सहेजा जा सकता है। इसलिए वर्षाजल संचयन सहित हमें जल संरक्षण के सारे तरीके अपनाने होंगे।

Author July 9, 2018 2:58 AM
सही मायने में मात्र एक प्रतिशत पानी मानव जाति के उपयोग के लिए उपलब्ध है। ऐसी स्थिति में प्रत्येक मनुष्य का दायित्व बनता है कि वह अपने हिस्से का पानी पहले से ही संग्रहीत करके रखे।

देवेंद्र राज सुथार

मानसून का महीना हर किसी को आनंद से सराबोर करने वाला होता है। इस समय नील व्योम काली मेघों के माध्यम से वसुधा को अपनी असीम जलबूंदों से तर-बतर करने को उत्साहित व आतुर दिखाई पड़ता है। मनोहर, मनभावन, मनमोहक व मन को तृप्त करने वाले इस माह में आकाश से कभी झमाझम, कभी फुहार रिमझिम, तो कभी बूंदाबांदी के रूप में बरसने वाली जलबूंदों में नहा कर मस्ती व अल्हड़ता से हर कोई झूमने-गाने को विवश हो जाता हैं। चहुंओर वातावरण में शीतलता भरी छुअन घुल जाने से प्राणी-जगत को भीषण गर्मी से राहत मिलने लगती है, तो वहीं इस समय रोमांस, नेह और प्रेम का पारा भी परवान चढ़ने लगता है। वस्तुत: मानसून में अजीब-सी मादकता है, इसके जादू से मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी व पादप भी अपने को बचा नहीं पाते हैं।

भारत में पेयजल संकट एक प्रमुख समस्या है। भूमिगत जल का स्तर लगातार नीचे जा रहा है और इस वजह से पीने के पानी की किल्लत बढ़ रही है। सिकुड़ती हरित पट्टी इसका मुख्य कारण है। पेड़ों की व्यापक मौजूदगी की वजह से जहां पर्याप्त मात्रा में वर्षा हासिल होती है, वहीं यही पेड़ भूमिगत जल का स्तर बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। लेकिन द्रुत गति से होने वाले विकास-कार्यों ने हमारी हरित पट्टी की तेजी से बलि ली है। उसी का नतीजा है कि न सिर्फ भूमिगत जल का स्तर नीचे गया है, बल्कि वर्षा में भी लगातार कमी आई है। गौरतलब है कि भारत में दो सौ साल पहले लगभग इक्कीस लाख, सात हजार तालाब थे। साथ ही, लाखों कुएं, बावड़ियां, झीलें, पोखर और झरने भी। हमारे देश की गोदी में हजारों नदियां खेलती थीं, पर आज वे नदियां हजारों में से केवल सैकड़ों में ही बची हैं। वे सब नदियां कहां गर्इं, कोई नहीं बता सकता।

जिस भारत में सत्तर प्रतिशत हिस्सा पानी से घिरा हो, वहां आज स्वच्छ जल का उपलब्ध न हो पाना विकट समस्या है। आज देश में करीब साठ करोड़ लोग पानी की गंभीर किल्लत का सामना कर रहे हैं। करीब दो लाख लोग स्वच्छ पानी न मिलने के चलते हर साल जान गंवा बैठते हैं। नीति आयोग द्वारा जारी ‘समग्र जल प्रबंधन सूचकांक’ रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है। इस रिपोर्ट में कहा गया है, सन 2030 तक देश में पानी की मांग उपलब्ध जल वितरण के मुकाबले दोगुनी हो जाएगी। इसका मतलब है कि करोड़ों लोगों के लिए पानी का गंभीर संकट पैदा हो जाएगा और देश के जीडीपी में छह प्रतिशत की कमी देखी जाएगी। इस बड़ी समस्या को अकेले या कुछ मुट्ठी भर लोग मिल कर नहीं सुलझा सकते हैं। जल की कमी की समस्या को सुलझाने के लिए जल संरक्षण का व्यापक अभियान चलाना होगा। जल संरक्षण ही जल बचाना है।

वर्षा जल संचयन कई मायनों में महत्त्वपूर्ण है। वर्षा जल का उपयोग घरेलू काम मसलन घर की सफाई, कपड़े धोने और खाना पकाने के लिए किया जा सकता है। वहीं औद्योगिक उपयोग की कुछ प्रक्रियाओं में भी इसका उपयोग किया जा सकता है। गर्मियों में वाष्पीकरण के कारण होने वाली पानी की किल्लत को ‘पूरक जल स्रोत’ के द्वारा कम किया जा सकता है, जिससे बोतलबंद पानी की कीमतें भी स्थिर रखी जा सकेंगी। यदि एक टैंक में पानी का व्यापक रूप से संचयन करें, तो साल भर पानी की पूर्ति के लिए हमें जलदाय विभाग के बिलों के भुगतान से निजात मिल सकती है। वहीं वर्षा जल संचयन को छोटे-छोटे माध्यमों में एकत्रित करके हम बाढ़ जैसी विपदा से बच सकते हैं। इसके अतिरिक्त वर्षा जल का उपयोग भवन निर्माण, जल प्रदूषण को रोकने, सिंचाई करने, शौचालयों आदि कार्यों में बेहतर व सुलभ ढंग से किया जा सकता है।

वर्षा जल संचयन वर्तमान में कई वैज्ञानिक व परंपरागत विधियां द्वारा किया जा सकता है, जिसमें सतह जल संग्रह प्रणाली के तहत भू-सतह पर गिरने वाले पानी को भूतल में जाने से रोका जा सकता है। फिर ड्रेनेज पाइप का उपयोग इन प्रणालियों में पानी के निर्देशन के लिए किया जा सकता है। वहीं छत प्रणाली के तहत संचित पानी को किसी अन्य माध्यम से स्वच्छ किए बिना ही इसका मानव-हित में उपयोग किया जा सकता है। इसके जरिए छत पर गिरने वाले पानी को कंटेनरों या टैकों में निर्देशित किया जाता है, इन टैंकों को आमतौर पर ऊंचा किया जाता है, जब टैप खोला जाता है, पानी उच्च दबाव में बह जाता है।

बांध जैसी वर्षा जल संचयन की विधि व्यक्तिगत तौर पर महंगी है, और यह सुलभ भी नहीं है, पर सार्वजनिक व सरकारी तौर पर बांध परियोजनाओं का सफल निर्माण बारिश के जल को संग्रहीत करने में काफी कारगर साबित हो सकता है। बांध जैसे प्रकल्पों में जलराशि को लंबे समय तक बांध कर इसका उपयोग नहरों के माध्यम से सिंचाई के प्रयोजनों के लिए किया जा सकता है। इसके लिए सरकार को बांध निर्माण परियोजना पर जोर देना चाहिए। वहीं भूमिगत टैंक प्रणाली के तहत छत पर एकत्रित जल को पाइप के माध्यम से भूमि पर बनाए गए टैंक में संग्रहीत किया जा सकता है। भूमिगत टैंक बारिश के पानी की कटाई के लिए बहुत अच्छा है, क्योंकि इससे जल वाष्पीकरण की दर कम हो जाती है।

भारत की बढ़ती जनसंख्या के कारण पानी की मांग में दिनोंदिन वृद्धि आंकी जा रही है। जल की कमी के कारण देश में आए दिन होने वाली अशांति व असंतोष की घटनाएं हमारा ध्यान खींचती रहती हैं। अभी शिमला में हुए भीषण जल संकट का ताजा उदाहरण हमारे सामने हैं। अगर अब भी हम सचेत नहीं हुए तो दक्षिण अफ्रीकी शहर केपटाउन की तरह भारत को भी पानी की राशनिंग करनी पड़ सकती है और अपने हिस्से का पानी पाने के लिए लोगों को रोज घंटों कतार में खड़े रहना होगा। हालांकि धरती का लगभग तीन चौथाई भाग जल से घिरा हुआ है, पर इसमें से 97 प्रतिशत पानी खारा है जो पीने योग्य नहीं है, पीने योग्य पानी की मात्रा सिर्फ तीन प्रतिशत है। इसमें भी दो प्रतिशत पानी ग्लेशियर और बर्फ के रूप में है।

इस प्रकार सही मायने में मात्र एक प्रतिशत पानी मानव जाति के उपयोग के लिए उपलब्ध है। ऐसी स्थिति में प्रत्येक मनुष्य का दायित्व बनता है कि वह अपने हिस्से का पानी पहले से ही संग्रहीत करके रखे। राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों और गुजरात के कुछ इलाकों में पारंपरिक रूप से घर के अंदर भूमिगत टैंक बना कर जल संग्रह करने का चलन है। इस परंपरा को अन्य राज्यों में लागू कर हम जल संकट की गंभीरता को कम कर सकते हैं।

कठोर कानून के द्वारा नदियों में छोड़े जाने वाले अपशिष्ट पर लगाम लगा कर जल प्रदूषण को रोका जा सकता है और वर्षा चक्र को बाधित होने से बचाया जा सकता है। कहने का लब्बोलुआब यह है कि पानी का काम पानी ही करता है, पैसा नहीं। बचपन से हमें ‘जल ही जीवन है’ का पाठ पढ़ाया जाता रहा है। अब समय की मांग है कि इस जीवन (जल) के प्रति गंभीरता दिखाते उसको सहेजना शुरू कर दें। पानी सबकी जरूरत है, मनुष्य और पशु-पक्षियों से लेकर वनस्पतियों तक। और इसका कोई विकल्प नहीं है, यानी पानी का काम हम किसी और चीज से नहीं ले सकते। फिर, पानी का उत्पादन नहीं हो सकता। उसे सिर्फ प्रदूषण से बचाया और सहेजा जा सकता है। इसलिए वर्षाजल संचयन सहित हमें जल संरक्षण के सारे तरीके अपनाने होंगे।

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