ताज़ा खबर
 

राजनीतिः रस्म अदायगी के पेड़

चारों ओर ‘पेड़ लगाओ’ का शोर सुनाई पड़ता है। बड़ी संख्या में पेड़ लगाए भी जाते हैं। लेकिन असल सवाल इन पौधों को सहेजने का है, क्योंकि पौधारोपण की औपचारिकता भर निभाई जाती है, इन्हें पेड़ बनने तक सहेजने की कोई योजना नहीं होती। मानसून में रोपे गए अधिकतर पौधे पनपने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। पौधे लगाना ही नहीं, उनका संरक्षण करना भी आवश्यक है।

विकास योजनाओं के नाम पर हमेशा से वन संपदा की अनदेखी हुई है। यही वजह है कि पिछले कुछ दशकों से ग्रीन हाउस गैसों का प्रभाव इतना बढ़ा है कि पृथ्वी के औसतन तापमान में भी बढ़ोतरी हो गई है।

बरसात के मौसम की शुरुआत होते ही पर्यावरण को सहेजने के प्रयास शुरू हो जाते हैं, जिनके तहत सरकारी अधिकारी, नेता, सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के कार्यकर्ता और यहां तक कि आमजन भी, हर वर्ष वृक्षारोपण अभियान में खूब उत्साह दिखाते हैं। बरसात में देश में वृक्षारोपण के अनगिनत आयोजन भी होते हैं। चारों ओर ‘पेड़ लगाओ’ का शोर सुनाई पड़ता है। बड़ी संख्या में पेड़ लगाए भी जाते हैं। हाल के कुछ बरसों में तो हर वर्ष बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण किया जाता है। लेकिन असल सवाल इन पौधों को सहेजने का है। पौधारोपण की औपचारिकता भर निभाई जाती है, इन्हें पेड़ बनने तक सहेजने की कोई योजना नहीं होती। हर साल पौधे रोपने के तो रेकार्ड बनाए जाते हैं, पर उन्हें बचाने के मामले में कोई गंभीरता नहीं दिखती। मानसून में रोपे गए अधिकतर पौधे पनपने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। यही वजह है कि पेड़ लगाना ही नहीं, उनका संरक्षण करना भी आवश्यक है।

दरअसल, बढ़ते प्रदूषण और वृक्षों की कमी से जो पर्यावरण असंतुलन पैदा हो रहा है उससे मुकाबला करने का एकमात्र रास्ता अधिक से अधिक पेड़ लगाना ही है। हालिया बरसों में आई जागरूकता के चलते अब जोर-शोर से वृक्षारोपण के कई अभियान चलाए जाते हैं। बावजूद इसके एक ओर जंगल खत्म हो रहे हैं, तो दूसरी ओर लगाए गए पेड़ों को सहेजने की फिक्र तक नहीं की जाती। नतीजतन धरती का बढ़ता तापमान, प्रदूषण और प्रकृति से बढ़ती दूरी खुद इंसान की जिंदगी ही दूभर बना रही है। ‘द लांसेट’ पत्रिका के अनुसार, हर साल वायु प्रदूषण के कारण दस लाख से ज्यादा भारतीय अपनी जान गंवाते हैं। ऐसे में यह समझना मुश्किल नहीं कि हरियाली सहेजने के प्रयास कितने जरूरी हैं।

वर्तमान में देश के कुल क्षेत्रफल के इक्कीस प्रतिशत हिस्से में जंगल हैं। लेकिन तमाम कारणों से जंगलों का क्षेत्रफल तेजी से घट रहा है। सेंटर फॉर ग्लोबल डवलपमेंट ने यह चेतावनी जारी की है कि यदि पेड़ के घटने की रफ्तार इसी गति से जारी रही तो वर्ष 2050 तक विश्व मानचित्र से भारत के क्षेत्रफल के बराबर जंगल समाप्त हो जाएंगे। भारतीय वन सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के समग्र वन क्षेत्रों में एक चौथाई उत्तर-पूर्व के राज्यों में है। लेकिन हाल के वर्षों में उत्तर-पूर्व के राज्यों में भी वन क्षेत्र में कमी आई है। हाल में जारी हुई नेचर जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार भारत में सिर्फ पैंतीस अरब पेड़ हैं, यानी एक व्यक्ति के लिए सिर्फ अट्ठाईस पेड़ ही बचे हैं। बावजूद इसके नए पौधों की देखभाल की लेकर कोई गंभीरता नहीं दिखती। कभी ये सिंचाई के अभाव में या तो सूख जाते हैं, तो कभी मवेशी खा जाते हैं। सड़कों के किनारे हों या किसी सरकारी दफ्तर का परिसर, आबोहवा को शुद्ध करने में योगदान देने वाले हजारों पेड़-पौधे देखभाल के अभाव में दम तोड़ देते हैं।

पिछले कुछ दशकों में बढ़ती जनसंख्या और जरूरतों से वनों पर जैविक दबाव बढ़ा है। विकास के नाम पर पेड़ों की अंधाधुंध कटाई जारी है। जंगलों के खत्म होने से जुड़ा एक अध्ययन बताता है कि पिछले पच्चीस साल में वैश्विक वन क्षेत्रफल चार करोड़ तेरह लाख हैक्टेयर से घट कर तीन करोड़ निन्यानवे लाख हैक्टेयर रह गया है। अध्ययन के मुताबिक अकेले भारत में ही हर साल पच्चीस हजार हैक्टेयर जंगल गैरवानिकी उपयोग की भेंट चढ़ जाता है। दुखद ही है कि हद दर्जे तक बढ़ीं इंसान की आवश्यकताएं प्रकृति का संतुलन बिगाड़ने पर आमाद हैं। प्राकृतिक-परिवेश को ध्वस्त कर विनाश को न्योता देने वाले गैर जिम्मेदार व्यवहार के वाबजूद कई स्वयंसेवी संगठनों के आंकड़े बताते हैं कि देश में पेड़ों की संख्या बढ़ी है। वर्ष 2015 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत के वनों के क्षेत्रफल में पांच हजार वर्ग किलोमीटर से ज्यादा की वृद्धि हुई है।

पिछले कुछ सालों में प्रदूषण से जुड़े सभी वैश्विक सर्वे बताते हैं कि भारत के महानगरों की आबोहवा सांस लेने लायक भी नहीं बची है। हमारे यहां तमाम बड़े शहर गैस चैंबरों में तब्दील हो गए हैं। केवल प्रदूषण जनित रोगों से देश में प्रतिदिन डेढ़ सौ लोग मौत के मुंह में समा रहे हैं। जहरीली हवा से उपजे इस सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का एक बड़ा हल परिवेश में हरियाली बढ़ाना ही है। लेकिन इस सिलसिले में एक बात ध्यान में रहनी चाहिए वह यह कि प्राकृतिक जंगल का कोई विकल्प नहीं है। हो यह रहा है कि सामाजिक वानिकी के नाम पर इस तरह का वृक्षारोपण होता है जो उस इलाके हवा-पानी से मेल नहीं खाता, न उनसे स्थानीय समुदायों को कोई वनोपज मिलता है। इसलिए ज्यादा से ज्यादा प्रयास कुदरती जंगलों को बचाने का ही होना चाहिए।

दरअसल, हम प्रकृति से लेना तो सीख गए हैं, पर उसे कुछ भी लौटाने की समझ खो बैठे हैं। निसंदेह प्रकृति मनुष्य की आवश्यकताओं की पूर्ति का सामर्थ्य रखती है, पर इंसान इससे सब कुछ छीनने में लगा है। होना तो यह चाहिए था कि तेजी से बढ़ती आबादी वाले भारत जैसे देश में प्रकृति को सहेजने के अतिरिक्त प्रयास किए जाते। लेकिन इंसान की सांसों के लिए शुद्ध हवा देने वाले पेड़ ही संरक्षण के अभाव में सांस की आस में दम तोड़ देते हैं। यही वजह है कि वन संपदा के संरक्षण की बात हो या नए पौधे लगा कर उनकी देखभाल करने की। देश के किसी भी राज्य में कोई गंभीरता नहीं दिखती। ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें दूर-दराज के गांवों में वृक्ष लगाने के नाम पर केवल कागजी कार्यवाही भर की गई है। आंकड़े बताते हैं कि औद्योगिक परियोजनाओं की वजह से अब तक भारत में लगभग चौदह हजार वर्ग किलोमीटर जंगल काट दिए गए हैं। यह सच है विकास योजनाओं की रफ्तार भी रोकी नहीं जा सकती, पर उसी रफ्तार से पर्यावरण सहेजने के कार्य तो किए ही जा सकते हैं। इसीलिए वृक्षारोपण का विचार ही काफी नहीं है, पौधों को सहेजने की कार्यप्रणाली विकसित करना भी जरूरी है।

विकास योजनाओं के नाम पर हमेशा से वन संपदा की अनदेखी हुई है। यही वजह है कि पिछले कुछ दशकों से ग्रीन हाउस गैसों का प्रभाव इतना बढ़ा है कि पृथ्वी के औसतन तापमान में भी बढ़ोतरी हो गई है। धरती के तापमान में हो रही अप्रत्याशित बढ़ोतरी भारत जैसे देशों के वाकई खतरे घंटी है, क्योंकि पर्यावरण असंतुलन के चलते मौसम का मिजाज भी बिगड़ रहा है। प्राकृतिक आपदाएं और जहरीली आबोहवा जीवन के लिए दंश बन गए हैं। इसका कारण भी पर्यावरण के प्रति हमारी उपेक्षा है। गांवों-कस्बों से लेकर महानगरों तक तेजी से कटते वृक्ष और अंधाधुंध हो रहा निर्माण कार्य कई प्राकृतिक आपदाओं को न्योता देने वाला साबित हो रहा है। बीते एक दशक में देश के मुख्य शहरों में ही पक्के निर्माण पांच सौ गुना बढ़े हैं। पर्यावरण में असंतुलन के कारण बाढ़ और सूखे जैसी समस्याएं खड़ी हो गई हैं। इसका प्रभाव सीधे तौर पर कृषि पर भी पड़ रहा है। यही वजह है कि वृक्ष लगाने के दायित्व निर्वहन के साथ-साथ उनकी देखरेख करने का कर्तव्य निभाना भी जरूरी है। पर्यावरण को सहेजने के लिए वृक्षारोपण करना कोई औपचारिकता नहीं बल्कि अनिवार्यता है। धरती की हरियाली को सहेजने के लिए अधिक से अधिक पेड़ लगाने और उन्हें बचाने के प्रति गंभीरता से सोचना आवश्यक है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App