ताज़ा खबर
 

राजनीतिः हताशा के त्रासद हासिल

आज हमें गलाकाट प्रतिस्पर्धा के माहौल में व्यक्ति की उस हताशा भरे जीवन की मनोदशा को भी समझना पड़ेगा, जहां वह जीवन की तल्ख सच्चाइयों से मुंह चुरा कर भाग रहा है और लोगों की देखा-देखी जीवन को हताशा से भर रहा है। सच यह है कि जीवन में हताशा की शुरुआत तनाव से होती है जो उसे खुदखुशी तक ले जाती है।

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में आत्महत्या के निदान के तौर पर सरकारों को सलाह दी गई है कि आत्महत्या की मीडिया रिपोर्टिंग सही तरीके से हो।

यह बात सुनने में कुछ अजीब-सी लगती है कि देश और समाज की तमाम बड़ी-बड़ी समस्याओं को मात देने वाले लोग खुद ही मौत को गले लगा रहे हैं। हैरत की बात तो यह है कि मध्य प्रदेश के आध्यात्मिक संत और गुरु के रूप में चर्चित भय्यू जी महाराज ने मौत को गले लगा लिया। इससे पहले अपनी बहादुरी और काबिलियत के लिए मशहूर महाराष्ट्र के एक आइपीएस अधिकारी हिमांशु रॉय ने आत्महत्या कर ली थी। यह विडबंना ही है कि खतरनाक अपराधियों से लोहा लेने वाला एक दिन खुद ही अपनी जिंदगी से हार गया। हाल में उत्तर प्रदेश के एक अपर पुलिस अधीक्षक ने दफ्तर में ही सर्विस रिवाल्वर से गोली मार कर आत्महत्या कर ली। कहने की जरूरत नहीं कि हमें आजकल ऐसी खबरें रोजाना सुनने और पढ़ने को मिल रहीं हैं। स्थिति यह है कि विश्व के कई विकासशील देशों के साथ भारत भी आज युवाओं में आत्महत्या की बढ़ती दर और प्रवृति को लेकर परेशान है। कहना न होगा कि मिश्रित और उदारवादी अर्थव्यवस्था से जुड़े विकासशील देशों के अनेक हिस्सों में लगातार युवा आत्महत्याओं की गूंज साफ सुनाई दे रही है। शायद इसी वजह से पूरे विश्व में हर साल दस सितंबर को ‘वर्ल्ड सुसाइड प्रीवेंशन डे’ मनाया जाता है।

आखिर ऐसा क्या है कि बच्चों से लेकर किशोर, छात्र-छात्राएं, बड़े-बूढ़े, महिलाएं, निर्धन, किसान और व्यापारी के साथ कमजोर से लेकर ताकतवर लोग तक जीवन जीने के बजाय मौत को गले लगा रहे हैं। इस संबंध में विश्व स्वास्थय संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने पिछले दिनों पहली बार वैश्विक स्तर पर आत्महत्या को लेकर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इस रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों के लोग अधिक आत्महत्या कर रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि विकसित देशों में महिलाओं के मुकाबले पुरुषों में आत्महत्या की दर अधिक है। लेकिन दूसरी ओर विकासशील देशों में महिलाओं के बीच आत्महत्या की दर अधिक पाई गई है। आंकड़ें बताते हैं कि दुनिया में हर चालीस सेकेंड में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है और हर साल आठ लाख लोग खुदकुशी करते हैं।

डब्ल्यूएचओ के आंकड़ें बताते हैं कि आबादी के प्रतिशत के लिहाज से गुयाना, उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के हालात ज्यादा चिंताजनक हैं जहां एक लाख की आबादी पर आत्महत्या की दर क्रमश: 44.2, 38.5 व 28.9 फीसद रही। रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक स्तर पर पंद्रह से उनतीस वर्ष के आयु वर्ग में आत्महत्या की दर 35.5 फीसद रही है। रिपोर्ट की खास बात यह है कि इसमें अवसाद को आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण करार दिया है। हालांकि पंद्रह से उनतीस वर्ष के बीच बीमारियां तो कम होतीं हैं। परंतु यह उम्र का वह पड़ाव है जब युवाओं का सारा ध्यान भविष्य बनाने की ओर अधिक होता है। इसलिए जाहिर-सी बात है कि कैरियर बना पाने में नाकाम नौजवान अवसादग्रस्त होकर मौत को गले लगा लेते हैं। आॅस्ट्रेलियन इंस्टीट्यूट आॅफ सुसाइड एंड प्रीवेंशन के निदेशक का कहना है कि आत्महत्या को लेकर वैश्विक स्तर पर इससे पहले कोई आंकड़े जारी नहीं हुए थे। वह इसलिए, क्योंकि इससे पहले आत्महत्या को कोई बीमारी न मान कर इसे लोगों के नकारात्मक व्यवहार का प्रमुख कारण माना जाता था। इस अध्ययन से एक अच्छी शुरुआत हुई है और आंकड़ों के आधार पर ऐसे मामलों में इसके निदान के प्रयास तेज किए जा सकते हैं।

आत्महत्या के मामले में भारत की स्थिति काफी चिंताजनक होती जा रही है। डब्ल्यूएचओ के आंकड़े बताते हैं कि पिछले साल दुनिया में आठ लाख से भी अधिक लोगों ने आत्महत्या की। इनमें तकरीबन दो लाख भारतीय थे। भारत में प्रति एक लाख लोगों में आत्महत्या की दर 21.1 फीसद रही। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े भी बताते हैं कि भारत में आत्महत्या की दर वैश्विक आत्महत्या दर के मुकाबले बढ़ी है। वास्तविक स्थिति यह है कि पूरी दुनिया में कुल आत्महत्या करने वाले लोगों में तेईस फीसद से ज्यादा भारतीय हैं। भारत में पिछले दो दशकों की आत्महत्या दर बढ़ी है। आज भारत में 37.8 फीसद आत्महत्या करने वाले लोग तीस साल से भी कम उम्र के हैं। दूसरी ओर चवालीस साल तक के लोगों के आत्महत्या की दर इकहत्तर फीसद तक बढ़ी है। आंकड़े बताते हैं कि केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के साथ में पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में आत्महत्या की घटनाओं का आंकड़ा 56.2 फीसद तक पहुंच गया। जबकि आत्महत्या की 43.8 फीसद घटनाएं तेईस राज्यों और सात केंद्र शासित प्रदेशों में दर्ज हुर्इं। उत्तर भारत के राज्यों अर्थात पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में एक लाख लोगों पर आत्महत्या की दर मात्र पांच फीसद पाई गई है। इसका सीधा-सा अर्थ यह हुआ कि उत्तर भारत के मुकाबले दक्षिण के राज्यों में आत्महत्या की दर अधिक होने के साफ संकेत मिल रहे हैं।

आत्महत्या से जुड़ी यह समस्या आज हमें यह सोचने-समझने को मजबूर कर रही है कि आखिर भारतीय संस्कृति से जुड़े परिवार, प्रेम, नैतिकता, आदर्श, मानदंड, स्नेह, वात्सल्य, पारस्परिक बातचीत और साझेदारी जैसी सामाजिक संस्थाओं का मानव जीवन में असर कम क्यों होता जा रहा है? कई बार हम बच्चों, युवाओं, महिलाओं और किसानों के बीच बढ़ती आत्मघाती घटनाओं के लिए परीक्षाओं में तनाव व दबाव, निराशा, प्रेम में असफलता, गैर-बराबरी, बेरोजगारी, गरीबी व नशे की लत जैसे कारकों को दोषी ठहराते हैं। कड़वा सच यह है कि ये दशाएं तो कमोवेश प्रकारांतर से प्रत्येक देश व काल में मौजूद रही हैं। परंतु पहले लोग इतनी बड़ी संख्या में और इतनी जल्दी मौत के सामने हथियार नहीं डाल देते थे। इसलिए आज हमें गलाकाट प्रतिस्पर्धा के माहौल में व्यक्ति की उस हताशा भरे जीवन की मनोदशा को भी समझना पड़ेगा, जहां वह जीवन की तल्ख सच्चाइयों से मुंह चुरा कर भाग रहा है और लोगों की देखा-देखी जीवन को हताशा से भर रहा है। सच यह है कि जीवन में हताशा की शुरुआत तनाव से होती है जो उसे खुदखुशी तक ले जाती है। देश की हेल्थ प्रोफाइल रिपोर्ट भी बताती है कि बढ़ती महत्त्वाकांक्षाएं, एक दूसरे से आगे निकल जाने की गलाकाट होड़ और मोटी पगार वाली नौकरी की चिंता आज लगातार लोगों को सता रही है।

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट में आत्महत्या के निदान के तौर पर सरकारों को सलाह दी गई है कि आत्महत्या की मीडिया रिपोर्टिंग सही तरीके से हो। दूसरे, देश में अल्कोहल को लेकर ठोस नीति बनाई जाए। तीसरे, आत्महत्या के प्रयास करने वालों की उचित देखभाल की जाए। कुल मिला कर कहना न होगा कि आत्महत्या की घटनाएं विशुद्ध रूप से समाजशास्त्रीय घटना है। आत्महत्या का समाज शास्त्र बताता है कि जब सामाजिक बदलाव के तीव्र दौर में परंपरागत रूप से स्थापित सामाजिक जीवन को संचालित करने वाले मानक खारिज होने लगते हैं और जल्दी से नए समाज के मानक सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से आकार नहीं ले पाते हैं तो नए माहौल में लोग ऊहापोह की स्थिति में पहचान के संकट से घिर कर अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं। यही स्थिति मानसिक अवसाद और हताशा को जन्म देती है, जिसकी अंतिम परिणति आत्महत्या के रूप में होती है। इसका निवारण न तो कानून के द्वारा संभव है, न ही आत्महत्या के विचार से घिरेलोगों को समझाने-बुझाने से। सही बात यह है कि आज समाज में प्रेम, स्नेह, परिवार व पड़ोस में स्वजनों व पड़ोसी मित्रों के सुख-दुख को मिल कर बांटना, अपने परिश्रम पर पूर्ण भरोसा करना, जीवन में आई चुनौतियों का डट कर मुकाबला करना और सफल लोगों की असफलताओं से सीख लेकर ही आत्महत्या जैसे घातक कदम पर काबू पाया जा सकता है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App