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राजनीतिः मनुष्य सिर्फ संसाधन नहीं

कई बार ऐसा लगता है कि जानकारी न होने, लोगों से राय-मशविरा न करने या बाहरी संस्कृति के प्रभाव के कारण भी नाम बदल दिए जाते हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत में शिक्षा मंत्रालय इसी नाम से जाना गया। उसमें संस्कृति शब्द भी जुड़ा था जो तर्क-संगत ही था। मगर 1985 में इस मंत्रालय का नाम बदल कर ‘मानव संसाधन विकास मंत्रालय’ कर दिया गया। क्या मनुष्य केवल एक संसाधन है?

क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था मनुष्य को एक संसाधन मात्र मान कर उसे स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक की शिक्षा दे रही है?

किसी भी देश में शिक्षा के क्षेत्र में ऐसी कोई समस्या नहीं होगी जो भारत में भी कहीं न कहीं पाई न जाती हो। इनमें से एक, जो लोगों के ध्यान में लगभग नहीं आती है वह स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक के नाम को लेकर है। अकसर नेता नाम बदल देते हैं और जनता उस ओर ध्यान नहीं देती है क्योंकि वह अपनी अनगिनत तात्कालिक समस्याओं से जूझ रही होती है। नवोदय विद्यालयों की संकल्पना और स्थापना का प्रारंभ राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व-काल में हुआ। अनेक वर्षों बाद फाइल पर एक पंक्ति के आदेश ने नाम बदल कर ‘जवाहर नवोदय विद्यालय’ कर दिया! पंडित नेहरूके प्रति असीम श्रद्धा रखने वाले भी जानते और मानते हैं कि यदि नाम में किसी व्यक्ति का नाम जोड़ा ही जाना था तो वह राजीव गांधी का होना चाहिए था!

कई बार ऐसा लगता है कि जानकारी न होने, लोगों से राय-मशविरा न करने, या बाहरी संस्कृति के प्रभाव के कारण भी नाम बदल दिए जाते हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत में शिक्षा मंत्रालय इसी नाम से जाना गया। उसमें संस्कृति शब्द भी जुड़ा था जो तर्क-संगत ही था। मगर 1985 में इस मंत्रालय का नाम बदल कर ‘मानव संसाधन विकास मंत्रालय’ कर दिया गया। मानव संसाधन शब्द सबसे पहले जॉन आर कमन्स नाम के अर्थशास्त्री ने अपनी पुस्तक ‘द डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ वेल्थ’ में 1983 में किया था, बाद में 1910-30 तक इसका उपयोग उद्योगों में मालिकों-कर्मचारियों के संबंधों के संदर्भ में होता रहा। उन मालिकों के लिए कर्मचारी संसाधन थे! स्पष्ट था कि मंत्रालय का नाम बदलने से जो संकल्पना का गूढ़ अंतर आया उसे पीवी नरसिंह राव जैसे विद्वान तो जानते अवश्य रहे होंगे मगर चुप रहे।

क्या मनुष्य केवल एक संसाधन है? भारतीय दर्शन और चिंतन तो ऐसा नहीं मानता है। यहां तो मानव ‘अमृतस्य पुत्र:’ है। ‘अहं ब्रह्मास्मि’ का घोष करता है। स्वामी विवेकानंद कह गए हैं कि शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य में विद्यमान पूर्णता को उजागर करना ही है। चिंतन, मनन, अन्वेषण, विश्लेषण, कल्पना, संकल्पना, उत्सुकता, सर्जनात्मकता, सेवा, सहायता, संबंध जैसे अनेक गुण, प्रथाएं और कौशल मानव से ही जुड़े हैं। मनुष्य और प्रकृति के संवेदनशील संबंधों को बनाए रखने का उत्तरदायित्व प्रकृति का नहीं, केवल मनुष्य का है। प्रकृति संसाधन प्रदान करती है, मनुष्य उनका उपयोग यों करे कि उनकी क्षति-पूर्ति लगातार होती रहे। मनुष्य इसमें असफल हुआ है और अपने अज्ञान तथा अहं के कारण हवा, पानी जैसे जीवनदायी संसाधनों की गहन समस्याओं से जूझ रहा है। फिर भी आशा की किरण तो मनुष्य ही है और रहेगा। उसे केवल संसाधन मान लेना स्वीकार्य नहीं हो सकता।

क्या भारत की शिक्षा व्यवस्था मनुष्य को एक संसाधन मात्र मान कर उसे स्कूल से लेकर विश्वविद्यालय तक की शिक्षा दे रही है? तब तो यह कहने वाले उत्साहित होंगे कि भारत के श्रेष्ठ व्यावसायिक संस्थान ‘साइबर सहायक’ ही प्रशिक्षित कर रहे हैं जो मल्टी-नेशनल की सेवा में लग कर ही अपने व्यक्तित्व-विकास को संपूर्ण मान लेते हैं। डॉ हरिसिंह गौड़ ने शिक्षा के क्षेत्र में सराहनीय योगदान किया। सागर विश्वविद्यालय उसका जीता-जागता उदाहरण बना। वे अपनी वसीयत में स्पष्ट लिख गए थे कि विश्वविद्यालय में उनका नाम न जोड़ा जाए। मगर सत्तासीनों नें उसे नहीं माना और विश्वविद्यालय में उनका नाम जोड़ दिया।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय में महामना पंडित मदन मोहन मालवीय का नाम जोड़ने की चर्चा भी कई बार चली, मगर यह संतोष का विषय है कि लोगों ने उसे स्वीकार नहीं किया। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रांगण में प्रवेश करने वाले हर व्यक्ति को महामना की जीवंत उपस्थिति का आभास स्वत: ही हो जाता है। लोगों का प्रेम और स्नेह ही महामना के प्रति उचित कृतज्ञता ज्ञापन है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के उद्देश्य तथा उसे प्राप्त जनसहयोग आज लगभग अकल्पनीय हो गए हैं। अब तो निजी विश्वविद्यालय जो ‘डीम्ड यूनिवर्सिटी’ के तौर पर जाने जाते रहे हैं, हर तरफ खड़े हो रहे हैं।

इनके द्वारा विश्वविद्यालय शब्द के प्रयोग पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आपत्ति उठाई और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उसके मुताबिक आदेश प्रसारित भी कर दिए हैं। वैसे तो राज्य सरकारों द्वारा स्थापित अधिकतर विश्वविद्यालय भी इस लायक नहीं हैं कि उन्हें यह नाम मिल सके, क्योंकि न तो वहां आवश्यक भौतिक संसाधन हैं और न ही उचित संख्या में प्राध्यापक! कुलपति छोटे-छोटे अनुदान के लिए सचिवालय के चक्कर लगाते रहते हैं। विश्वविद्यालय तथा स्कूलों के स्तर पर यह भी ध्यान देने योग्य है कि इनमें से कई डॉ एपीजे अब्दुल कलाम, डॉ सीवी रमण, डॉ राधाकृष्णन जैसे महान लोगों के नाम पर संस्था खोल देते हैं और इन नामों की गरिमा का कोई ध्यान नहीं रखते हैं। इस पर नियंत्रण के प्रावधान या तो हैं ही नहीं या संबंधित संस्थाएं उनका उपयोग करने का साहस नहीं जुटा पा रही हैं।

पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ (एक सरकारी विश्वविद्यालय) अपनी साख के लिए जाना जाता है। अब आप अकसर एक और विज्ञापन देख सकते हैं जो ‘चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़’ की तारीफ के पुल बांधता है। भारत के पहले नियोजित शहर चंडीगढ़ के कर्ता-धर्ता यह क्यों नहीं समझ पाते हैं कि इससे अनावश्यक रूप से भ्रांतिपूर्ण स्थिति पैदा होती है जिसे सुधारा जाना चाहिए। निजी विश्वविद्यालयों को शहरों के नाम देना क्यों प्रतिबंधित नहीं होना चाहिए? वैसे लोग जानते हैं कि अधिकतर निजी विश्वविद्यालयों में किन लोगों का और किस प्रकार अर्जित धन लगा है और क्यों वहां मनमानी फीस वसूलने के बाद भी स्नातकों को स्तरीय प्रशिक्षण नहीं मिल पाता है। आशा करनी चाहिए कि आगे चलकर इस श्रेणी के उच्च शिक्षा संस्थान अपनी साख बढ़ाने और जन-स्वीकार्यता पाने के लिए शिक्षा की गुणवत्ता की ओर अधिक ध्यान देंगे तथा अधिकाधिक लाभांश कमाने की प्रवृत्ति पर स्वयं ही अंकुश लगाएंगे।

शिक्षा जगत में नामों को लेकर पब्लिक के साथ यदि कहीं सबसे बड़ा मजाक हुआ है तो वह ‘पब्लिक’ शब्द को लेकर हुआ है। इसका उपयोग तो केवल उन स्कूलों के लिए उपयुक्त है जो सरकार द्वारा जनता से शुल्क के रूप में जुटाई गई धनराशि से किए गए आबंटन से चलते हों। पब्लिक सेक्टर बैंकिंग, पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग जैसे उपयोग उचित हैं। मगर क्या कोई पूंजीपति कोई उद्योग लगा कर उसके साथ पब्लिक शब्द का उपयोग कर सकता है? उन स्कूलों को बड़ी बेशर्मी से औपचारिक तौर पर भी पब्लिक स्कूल कहा जाता है जिनमें केवल समृद्ध परिवार अपने बच्चे भेज सकते हैं!

भारत के एक नामी-गिरामी पब्लिक स्कूल ‘चेन’ के स्कूल दुबई जैसे देशों में भी हैं। वहां इन्हें पब्लिक शब्द इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है और इन्हें ‘प्राइवेट’ शब्द का अपने नाम में कानूनन प्रयोग करना होता है। निजी स्कूलों को भारत में भी प्राइवेट या निजी या स्व-वित्त-पोषित शब्द इस्तेमाल करने का नियम होना चाहिए। सरकारी स्कूल कई जगह ‘सरकारी’ शब्द का प्रयोग करते हैं। केवल इन्हीं के लिए ‘पब्लिक स्कूल’ शब्द का प्रयोग किया जा सकता है। भारी फीस लेने वाले और देश के अधिकतर नागरिकों के बच्चों के लिए अनुपलब्ध निजी स्कूलों को ‘पब्लिक’ शब्द अपने नामों में प्रयोग करने का नैतिक अधिकार तो कभी था ही नहीं। विदेशियों द्वारा यह प्रचलित किया गया और यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी धड़ल्ले से इसका प्रयोग हो रहा है। सीबीएसई जैसी संस्थाएं भी इस दिशा में निर्णय ले सकती हैं, राज्य सरकारें भी आवश्यक नियमावली में संशोधन कर सकती हैं।

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