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राजनीतिः जलवायु संकट और खतरे में जीवन

जलवायु परिवर्तन की वजह से दक्षिण एशिया में गेहूं की पैदावार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। साथ ही, वैश्विक खाद्य उत्पादन भी धीरे-धीरे घट रहा है। एक खास बात यह भी है कि जलवायु परिवर्तन से न केवल फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो रही है, बल्कि उनकी पौष्टिकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

भारत के कृषि पैदावार में वायु प्रदूषण का सीधा और नकारात्मक असर देखने को मिल रहा है। धुएं में बढ़ोतरी की वजह से अनाज के लक्षित उत्पादन में कमी देखी जा रही है।

भारत के कृषि पैदावार में वायु प्रदूषण का सीधा और नकारात्मक असर देखने को मिल रहा है। धुएं में बढ़ोतरी की वजह से अनाज के लक्षित उत्पादन में कमी देखी जा रही है। कृषि पैदावार पर वायु प्रदूषण का जो प्रभाव पड़ रहा है उसने कृषि विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है। करीब तीस साल के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए वैज्ञानिकों ने एक ऐसा सांख्यिकीय मॉडल विकसित किया है जिससे यह अंदाजा मिलता है कि घनी आबादी वाले राज्यों में वर्ष 2010 के मुकाबले वायु प्रदूषण की वजह से गेहूं की पैदावार पचास फीसद से कम रही। कई जगहों पर खाद्य उत्पादन में करीब नब्बे फीसद की कमी धुएं की वजह से देखी गई, जो कोयला और दूसरे प्रदूषक तत्त्वों की वजह से हुआ। ऐसे दुष्प्रभाव में भूमंडलीय तापमान वृद्धि और वर्षा के स्तर की भी दस फीसद भूमिका है।

संयुक्त राष्ट्र में जलवायु परिवर्तन के लिए बने अंतर-सरकारी पैनल (आइपीसीसी) रिपोर्ट में भी इसी तरह की चेतावनी दी गई थी। ‘जलवायु परिवर्तन- प्रभाव, अनुकूलन और जोखिम’ शीर्षक से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पहले से ही सभी महाद्वीपों और महासागरों में विस्तृत रूप ले चुका है। रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण एशिया को बाढ़, गर्मी के कारण मृत्यु, सूखा और खाद्य की कमी का सामना करना पड़ सकता है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले भारत जैसे देश, जो केवल मानसून पर ही निर्भर हैं, के लिए यह काफी खतरनाक हो सकता है। जलवायु परिवर्तन की वजह से दक्षिण एशिया में गेहूं की पैदावार पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। साथ ही वैश्विक खाद्य उत्पादन भी धीरे-धीरे घट रहा है। एक खास बात यह भी है कि जलवायु परिवर्तन से न केवल फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो रही है, बल्कि उनकी पौष्टिकता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है।

एशिया में तटीय और शहरी इलाकों में बाढ़ की वृद्धि से बुनियादी ढांचे, आजीविका और बस्तियों को काफी नुकसान हो सकता है। ऐसे में मुंबई, कोलकाता, ढाका जैसे शहरों पर खतरा ज्यादा मंडरा रहा है। पिछले दिनों पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने भी जलवायु परिवर्तन पर रिपोर्ट जारी करते हुए चेताया था कि यदि पृथ्वी के औसत तापमान का बढ़ना जारी रहा तो अगामी वर्षों में भारत को इसके दुष्परिणाम झेलने होंगे। इसका सीधा असर देश की कृषि व्यवस्था पर भी पड़ेगा। जिस तरह जलवायु और मौसम परिवर्तन दुनियां में भोजन, पैदावार और आर्थिक समृद्धि को प्रभावित कर रहा है, उससे लग रहा है कि आने वाले समय में जिंदा रहने के लिए जरूरी चीजें इतनी महंगी हो जाएंगी कि उससे देशों के बीच युद्ध जैसे हालात पैदा हो जाएंगे। यह खतरा उन देशों में ज्यादा होगा जहां कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है।

यूरोप, भारत सहित पूरे एशिया में बेमौसम बरसात, ठंड, गर्मी, सूखे और भूकम्प आदि ने पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है। ‘वर्ल्ड क्लाइमेट कांफ्रेंस डिक्लेरेशन एंड सपोर्टिंग डाक्युमेंट्स’ के अनुसार प्रौद्योगिकी के व्यापक विस्तार के कारण हवा में कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा तेजी से बढ़ रही है। इसलिए खाद्यान्न संकट और प्राकृतिक आपदाओं का आना हमें बार-बार चेतावनी दे रहा है कि अभी भी समय है और हम जाग जाएं, नहीं तो भविष्य में कुछ भी नहीं बचेगा।

समूचे विश्व में दो लाख चालीस हजार किस्म के पौधे और दस लाख पचास हजार प्रजातियों के प्राणी हैं। इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजनर्वेशन ऑफ नेचर एक की रिपोर्ट के मुताबिक विश्व में जीव-जंतुओं की सैंतालीस हजार से ज्यादा विशेष प्रजातियों में से एक तिहाई से अधिक प्रजातियों पर विलुप्त होने का खतरा मंडरा रहा है। इनमें स्तनधारियों की इक्कीस फीसद, उभयचरों की तीस फीसद और पक्षियों की बारह फीसद प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। वनस्पतियों की सत्तर फीसद प्रजातियों के साथ ताजा पानी में रहने वाले सरीसृपों की सैंतीस फीसद प्रजातियों और ग्यारह सौ से ज्यादा प्रजातियों की मछलियों पर भी खतरा मंडरा रहा है। ये सब इंसान के लालच और जगलों के कटाव के कारण हुआ है। गंदगी साफ करने में कौआ और गिद्ध प्रमुख हैं। गिद्ध शहरों ही नहीं, जंगलों से खत्म हो गए। लोग कहते हैं कि उल्लू से क्या फायदा, मगर किसान जानते हैं कि वह खेती का मित्र है, जिसका मुख्य भोजन चूहा है। भारतीय संस्कृति में पशु पक्षियों के संरक्षण और संवर्धन पर जोर दिया गया है। एक और बात बड़े खतरे का अहसास कराती है कि एक दशक में विलुप्त प्रजातियों की संख्या पिछले एक हजार वर्ष के दौरान विलुप्त प्रजातियों की संख्या के बराबर है।

अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘वर्ल्ड वाइल्ड फिनिशिंग ऑगेर्नाइजेशन’ ने अपनी रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि सन 2030 तक घने जंगलों का साठ फीसद भाग नष्ट हो जाएगा। वनों के कटान से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की कमी होगी और इससे वनस्पतियों और प्राकृतिक रूप से स्थापित जैव विविधता के लिए खतरा उत्पन्न होगा। मौसम के मिजाज में होने वाला परिवर्तन ऐसा ही एक खतरा है।

वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन मानव जीवन के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। अठारहवीं शताब्दी में प्रारंभ हुई औद्योगिक क्रांति ने हमें मुख्यत: जीवाश्म र्इंधन पर निर्भर बना दिया है और हम बिजली से लेकर कारखानों और कृषि तक पूरी तरह से इसी पर निर्भर हैं। लेकिन यह र्इंधन बहुत बड़ी मात्रा में ऐसी गैसों का उत्सर्जन करते हैं जो सूरज की रोशनी को पूरी तरह तक धरती पर आने से रोकते हैं और उसे वातावरण में ही रोक देते हैं। यही ग्लोबल वार्मिंग का मुख्य कारण है। इसके चलते धरती के तापमान में पहले से ही करीब एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है। इसलिए जलवायु परिवर्तन संपूर्ण मानवता के लिए बड़ा खतरा बन चुका है। एक अहम बात और है कि सौर, पवन जैसी वैकल्पिक ऊर्जा पर जोर देकर हम अपनी ऊर्जा जरूरतों के साथ-साथ जलवायु संकट पर काबू कर सकते हैं। बड़े पैमाने पर वैकल्पिक ऊर्जा के उपयोग और उत्पादन के लिए अब पूरे विश्व को एक साथ आना होगा, तभी कुछ हद तक वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में कुछ कमी आ पाएगी।

पर्यावरण पर कई वैश्विक रिपोर्ट के आने के बाद अब यह स्पष्ट है कि कोयला और उच्च कार्बन उत्सर्जन से भारत के विकास और अर्थव्यवस्था पर धीरे-धीरे बुरा प्रभाव पड़ेगा और देश में जीवन स्तर सुधारने में प्राप्त उपलब्धियां नकार दी जाएंगी। इसलिए भारत सरकार को इस समस्या से उबरने के लिए सकारात्मक कदम उठाने होंगे। सरकार के साथ-साथ समाज के स्तर पर भी हमें अपनी दिनचर्या में स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण को शामिल करना होगा। हम अपना योगदान देकर इस पृथ्वी को नष्ट होने से बचा सकते हैं। प्रकृति पर जितना अधिकार हमारा है, उतना ही हमारी भावी पीढ़ियों का भी है।

हमें यह सोचना होगा कि ऐसे विकास का क्या फायदा, जो लगातार विनाश को आमंत्रित करता हो। ऐसे विकास को क्या कहें जिसकी वजह से संपूर्ण मानवता का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया हो। जिस तरह मौसम परिवर्तन दुनिया में भोजन पैदावार और आर्थिक समृद्धि को प्रभावित कर रहा है, आने वाला समय काफी मुश्किल भरा होगा। वास्तव में पर्यावरण संरक्षण ऐसा ही है जैसे अपने जीवन की रक्षा करने का संकल्प। सरकार और समाज के स्तर पर लोगों को पर्यावरण के मुद््दे पर गंभीर होना होगा, नहीं तो प्रकृति का कहर झेलने के लिए हमें तैयार रहना होगा, और यह कहर बाढ़, सूखा, खाद्यान में कमी किसी भी रूप में हो सकता है।

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