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राजनीतिः नफरत की आग में झुलसता शिलांग

मेघालय में करीब चौहत्तर फीसद आबादी ईसाई है। इसके बाद साढ़े ग्यारह फीसद आबादी हिंदुओं की है, जबकि मुसलमान चार फीसद हैं। इसके अलावा सिखों की भी अच्छी खासी संख्या है। इन सिखों को करीब डेढ़ सौ साल पहले अंग्रेज पंजाब से यहां सफाईकर्मियों के रूप में लेकर आए थे। तब से मेघालय में सिख रह रहे हैं। लेकिन अब सिख समुदाय का यहां कारोबार फैल चुका है। मेघालय के हिंसा का मूल कारण भी यही है।

Author June 7, 2018 4:52 AM

राहुल लाल

भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मेघालय की राजधानी शिलांग अपने प्राकृतिक सौंदर्य के कारण हमेशा पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र रही है। यही कारण है कि इसे पूर्व का स्कॉटलैंड भी कहते हैं। पहाड़ों पर बसा छोटा और खूबसूरत शहर शिलांग इन दिनों हिंसा की आग में झुलस रहा है। यहां सिखों और स्थानीय खासी जनजाति के बीच तनाव इतना बढ़ गया है कि सेना बुलानी पड़ गई। हिंसा के मद्देनजर शिलांग और उसके आसपास मोबाइल, इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गर्इं। सेना लगातार फ्लैग मार्च कर रही है। शिलांग में स्थिति कितनी तनावपूर्ण है, उसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि भीड़ ने मुख्यमंत्री की मौजूदगी में सचिवालय परिसर में घुसने की कोशिश की। भीड़ ने सीआरपीएफ के एक शिविर पर भी हमला कर दिया था।

मेघालय 21 जनवरी, 1972 को अस्तित्व में आया था। भारत के पूर्वी छोर पर बांग्लादेश की सीमा से लगता हुआ ये छोटा सा राज्य है। ईसाई बहुल आबादी वाले इस राज्य में सबसे ज्यादा खासी, गारो और जयंतिया और गारो जनजाति के लोग रहते हैं। यहां की जनजाति आबादी में खासी चौंतीस फीसद, गारो साढ़े तीस फीसद और जयंतिया साढ़े अठारह फीसद हैं। अंग्रेजों के आगमन के पूर्व इन तीनों जनजातियों का अपना अलग-अलग इतिहास था। सन 1835 में ब्रिटिश हुकूमत ने मेघालय को असम का हिस्सा बना दिया था। इसके बाद जब 1905 में बंगाल विभाजन हुआ तो मेघालय पूर्वी बंगाल का हिस्सा बना दिया गया। लेकिन सन 1912 में जब बंगाल विभाजन का फैसला वापस लिया गया तो मेघालय फिर से असम का हिस्सा बन गया। सन 1921 में ब्रिटिश साम्राज्य ने जयंतिया और गारो जनजातियों को पिछड़ा घोषित कर दिया, लेकिन खासी जनजाति को इससे बाहर रखा गया।

आज मेघालय में करीब चौहत्तर फीसद आबादी ईसाई है। इसके बाद साढ़े ग्यारह फीसद आबादी हिंदुओं की है, जबकि मुसलमान चार फीसद हैं। इसके अलावा सिखों की भी अच्छी खासी संख्या है। इन सिखों को करीब डेढ़ सौ साल पहले अंग्रेज पंजाब से यहां सफाईकर्मियों के रूप में लेकर आए थे। तब से मेघालय में सिख रह रहे हैं। लेकिन अब सिख समुदाय का यहां कारोबार फैल चुका है। मेघालय के हिंसा का मूल कारण भी यही है। मेघालय के खासी, जयंतिया और गारो लोग खुद को मेघालय का मूल निवासी मानते हैं, जबकि हिंदुओं, मुसलमानों के साथ जैन, बौद्ध और सिखों को भी बाहरी मानते हैं। मेघालय की इन जनजातियों का मानना है कि इन बाहरी लोगों को राज्य से बाहर कर दिया जाए और इसके लिए वे लोग हिंसा का सहारा भी लेते रहे हैं।

मेघालय में इस तरह की हिंसा की शुरुआत 1979 में दुर्गा पूजा से हुई। दुर्गा पूजा के दिन किसी ने मूर्ति पर पत्थर फेंक दिया था। इससे नाराज लोग हिंसा पर उतर आए। कुछ समय की शांति के बाद 1988 के चुनाव से मेघालय में दबा-छिपा विद्रोह प्रारंभ हो गया। इस विद्रोह की वजह थी मेघालय में बाहरियों की आबादी में वृद्धि। इस विद्रोह का नेतृत्व किया हाइनिटवर्प अचिक लिबरेशन काउंसिल (एचएएलसी) ने, जिसे गारो और खासी जनजाति का जोरदार समर्थन हासिल था। मेघालय में बाहरी लोगों को ‘डखार’ कहा जाता है। इस काउंसिल ने राज्य सरकार से मांग की कि दूसरे राज्यों से आए लोगों को बाहर किया जाए। इस आंदोलन के शुरू होते ही एचएएलसी में फूट पड़ गई और गारो समुदाय ने स्वयं को इस काउंसिल से अलग कर लिया। गारो लोगों ने अचिक मतग्रिक लिबरेशन आर्मी बना ली, जबकि बचे हुए खासी लोगों का वाला गुट हाइनिटवर्प नेशनल लिबरेशन काउंसिल के रूप में काम करता रहा। इसके कुछ समय बाद मतग्रिक लिबरेशन आर्मी में फूट पड़ गई और अचनिक नेशनल वॉलंटियर्स काउंसिल ने इसकी जगह ले ली।

गारो और खासी समुदाय के बीच उपजे विवाद के बाद हाइनिटवर्प नेशनल लिबरेशन काउंसिल ने मेघालय को खासी लोगों का अलग राज्य बनाने की मांग कर दी। इनमें भी अचनिक नेशनल वॉलंटियर्स काउंसिल ज्यादा हिंसक हो गया। सन 2000 के बाद इस गुट ने कई बार हिंसा का सहारा लिया। आम लोगों के साथ ही पुलिस वाले भी मारे गए। इस गुट को बांग्लादेश के चरमपंथी गुटों और असम के उग्रवादी गुटों का भी साथ मिला। हिंसा का यह क्रम 2004 तक जारी रहा। इसके बाद अचनिक नेशनल वॉलंटियर्स काउंसिल ने संघर्ष विराम की घोषणा कर दी। हालांकि अवैध वसूली इत्यादि के रूप में उसकी दूसरी गतिविधियां चलती रहीं। 24 जुलाई 2007 को अचनिक वॉलंटियर्स काउंसिल के अगुआ जूलियस डोरफांग ने अपने चार साथियों के साथ शिलांग में आत्मसमर्पण कर दिया। इस घटना से आंदोलन को जबरदस्त झटका लगा। वर्ष 2004 में अचनिक नेशनल वॉलंटियर्स काउंसिल के संघर्ष विराम की घोषणा के बाद रिट्राइवल इंडिजिनस यूनीफाइड फ्रंट, यूनाइटेड अचनिक नेशनल फ्रंट, हजोंग यूनाइटेड लिबरेशन आर्मी जैसे गुटों ने सिर उठाना शुरू कर दिया।

वर्ष 2006 में लिबरेशन अचरिक एलिट फोर्स का गठन पूर्व पुलिस कमांडो पीटर मारक ने किया। इसने एक विशिष्ट रणनीति के तहत कई उग्रवादी संगठनों से हाथ मिलाया। लेकिन अगस्त, 2007 में ही पीटर और उसके दो साथी पुलिस मुठभेड़ में मारे गए। वर्ष 2008 में ही इस संगठन के कमांडर किमरी को पुलिस ने एनकाउंटर में मार दिया। इसके बाद मेघालय में शांति की पूरी कोशिश की गई। इस कोशिश का नतीजा यह रहा कि पूर्वोत्तर राज्यों में मेघालय में थोड़ी शांति स्थापित हुई।

लेकिन इस बार 31 मई की रात से शिलांग फिर से हिंसा की लपटों में घिर गया है। वहां के देम ल्यू मॉवलांग इलाके के एक पंजाबी बस्ती है, जिसमें पिछले डेढ़ सौ साल से सिख समुदाय रह रहा है। पिछले दिनों यहां खासी और सिख समुदाय के बीच एक मामूली-सी नोंकझोंक ने हिंसा का रुप ले लिया। यद्यपि शुरुआत में इस मामले को पुलिस ने शांत कर दिया था, लेकिन सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों ने हालात बिगाड़ डाले। सोशल मीडिया में पंजाबी बस्ती के लोगों के लिए अफवाह फैलाई गई कि खासी समुदाय के युवक ने किसी सिख लड़की के साथ छेड़छाड़ की, वहीं खासी लोगों के बीच अफवाह फैली कि पंजाबी बस्ती के लोगों ने एक खासी व्यक्ति को पीट-पीट कर मार डाला है। दोनों ही पक्षों में यह अफवाह आग की तरह फैल गई। पुलिस ने दोनों पक्षों को रोकने और समझाने की कोशिश की। लेकिन इससे 31 मई को पूरी रात पुलिस और खासी लोगों के बीच टकराव होता रहा। शिलांग में इस बार हालात इतने खराब हो गए कि सेना की मौजूदगी के बावजूद हिंसात्मक घटनाएं नहीं थमीं। सेना ने हिंसा के दौरान करीब दो सौ महिलाओं और बच्चों सहित पांच सौ से ज्यादा लोगों को बचाया। उपद्रवियों ने सेना के काफिले पर भी पेट्रोल बम फेंके। यानी हिंसा के लिए दंगाई तैयार बैठे थे।

शिलांग में स्थानीय लोगों का एक समूह बाहरी लोगों को मेघालय से बाहर निकालना चाहता है। जबकि जिन्हें बाहरी कहा जा रहा है, वे भी लगभग डेढ़ सौ साल से वहीं रह रहे हैं। ऐसे में दोनों पक्षों के बीच विवाद की जटिलता को समझा जा सकता है। यह एक बड़ा भावनात्मक मुद्दा है जो सदैव आग के तरह धधकता रहता है। इस आग को कभी भी एक छोटी-सी चिंगारी भड़का देती है। यह आग अभी बुझी नहीं है। इसे बुझाने के लिए आवश्यक है कि सभी पक्ष एक दूसरे का पूर्ण सम्मान करते हुए आपसी सौहार्द और विश्वास बनाए रखें। साथ ही राजनीतिक दलों को भी इस मामले में सकारात्मक रुख रखते हुए लोगों को जोड़ने का काम करना चाहिए, न कि क्षुद्र राजनीतिक लाभ के लिए मामले का राजनीतिकरण करना चाहिए। उम्मीद है, जल्द ही पूर्व का स्कॉटलैंड शिलांग फिर से अपने प्राकृतिक सौंदर्य के साथ पर्यटकों के स्वागत के लिए तैयार हो जाएगा।

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