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राजनीतिः अंतिम अरण्य का दुख

आधुनिकता का सही अर्थ ग्रहण न कर पाने वाले लोग जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ‘यूज ऐंड थ्रो’ का सिद्धांत अपना बैठे हैं। उन्हें रिश्ते भी घर में दैनिक जरूरत में इस्तेमाल होने वाली वस्तु लगने लगे हैं। यह आत्मकेंद्रित मानसिकता का नतीजा है, जो न सिर्फ खतरनाक है, बल्कि आने वाले समय में हमारी नई पीढ़ियों की बुनियाद कमजोर कर सकती है।

कोई अपने पिता को, जिसने उसके भविष्य की खातिर अपनी सारी उम्र खपा दी, तो कोई अपनी मां को, जिसने उसे अपने शरीर के भीतर आकार दिया, खुद गीले में रह कर सूखे में सुलाया, जीवन की इस चुनौतीपूर्ण अवस्था में अकेले जूझने के लिए छोड़ रहा है।

कोई अपने पिता को, जिसने उसके भविष्य की खातिर अपनी सारी उम्र खपा दी, तो कोई अपनी मां को, जिसने उसे अपने शरीर के भीतर आकार दिया, खुद गीले में रह कर सूखे में सुलाया, जीवन की इस चुनौतीपूर्ण अवस्था में अकेले जूझने के लिए छोड़ रहा है। माता-पिता अपनी संतान को लाख जतन करके पालते-पोसते हैं, पढ़ाते-लिखाते हैं, शादी-ब्याह करते हैं और फिर आखिर में जीवन भर की शेष पूंजी उसके हवाले करके इस संसार से अपनी विदाई की बाट जोहने लगते हैं। लेकिन वही संतान, अपवादों को छोड़ दें तो, अपने कर्तव्य भूल जाती है। ‘हेल्पेज इंडिया’ की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली देश के उन पांच शहरों में शुमार है, जहां बुजुर्ग बेहद बेहाल-बदहाल हैं। सर्वे के मुताबिक देश के एक चौथाई बुजुर्ग उत्पीड़न झेलने को मजबूर हैं। दुर्व्यवहार के शिकार बयासी फीसद बुजुर्ग घर-परिवार की प्रतिष्ठा के मोह में कहीं शिकायत नहीं करते। और, जो शिकायत करना चाहते हैं, उन्हें यह नहीं मालूम कि वे इस बाबत किससे सहायता ले सकते हैं।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने ‘मेंटेनेंस ऐंड वेलफेयर ऑफ पैरेंट्स ऐंड सीनियर सिटीजंस एक्ट-2007’ के तहत बुजुर्गों के संरक्षण और सहायता के लिए कई प्रावधान कर रखे हैं। इसी तरह उत्तर प्रदेश सरकार ने भी वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम-2010 लागू कर रखा है, जिसके तहत माता-पिता की प्रताड़ना और उनके भरण-पोषण संबंधी मामलों की सुनवाई की जिम्मेदारी उप-जिलाधिकारियों पर है। माता-पिता को भरण-पोषण के लिए हर माह दस हजार रुपए तक की धनराशि अपने बच्चों से पाने की व्यवस्था है। ऐसा न करने पर बच्चों को तीन माह की सजा हो सकती है। अधिनियम के मुताबिक, माता-पिता के लिए भोजन-पानी, कपड़े और आवास की व्यवस्था बच्चों का दायित्व है। अगर कोई शख्स अपने माता-पिता को प्रताड़ित करता है, खाना-खर्च नहीं देता है और घर से निकाल देता है, तो उसका यह कृत्य अपराध की श्रेणी में आता है तथा ऐसे मामलों की सुनवाई अधिनियम की धारा-5 के तहत करने का प्रावधान है।

बीते छह जून को दक्षिणी दिल्ली के जिला मजिस्ट्रेट अमजद टाक ने एक वृद्ध दंपति की याचिका पर सुनवाई करते हुए उनके बेटे-बहू को उनका मकान खाली करने का आदेश जारी किया। अदालत ने ‘मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पैरेंट्स एंड सीनियर सिटीजंस ऐक्ट-2007’ और ‘दिल्ली माता-पिता व वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल-कल्याण नियम’-2009 और 2016 का हवाला देते हुए कहा कि याची के बेटे-बहू न सिर्फ उनका मकान खाली करें, बल्कि वृद्ध दंपति को शांतिपूर्ण ढंग से अपना जीवन व्यतीत करने दें। अपनी याचिका में वृद्ध दंपति ने बेटे-बहू के दुर्व्यवहार से बचाने और मकान से उन्हें बेदखल करने की गुहार लगाई थी।

अभी ज्यादा दिन नहीं बीते, जब गुजरे जमाने की अभिनेत्री गीता कपूर के निधन की खबर आई थी। कहने के लिए तो उनकी दो औलादें थीं, लेकिन अपनी वृद्धावस्था और तनहाई में उन्हें अपनों का साथ नहीं मिला। पिछले एक साल से मुंबई स्थित वृद्धाश्रम ‘जीवन आशा’ में अपने पुत्र-पुत्री का इंतजार करते-करते गीता कपूर की हालत बिगड़ती गई। खबर पाकर फिल्मकार अशोक पंडित और रमेश तौरानी ने उन्हें अंधेरी स्थित निजी अस्पताल में दाखिल कराया, जहां उन्होंने दम तोड़ दिया। गीता कपूर ने पाकीजा, रजिया सुलतान समेत सौ से ज्यादा फिल्मों में काम करके शोहरत हासिल की। लेकिन जीवन की सांध्य वेला में जब उन्हें सहारे की जरूरत पड़ी, तो औलादों ने मुंह मोड़ लिया। उनका बेटा कोरियोग्राफर है और बेटी एयर होस्टेस। काम आए सहकर्मी, जिन्होंने पहले इलाज के बिलों का भुगतान करके उन्हें वृद्धाश्रम भेजा और बाद में भी अंतिम सांस तक उनके साथ खड़े रहे।

यह विडंबना नहीं, तो और क्या है कि एक बेटा अस्पताल में दाखिल अपनी मां को एटीएम से पैसे निकालने का बहाना बना कर अकेला छोड़ जाता है और फिर मुड़ कर नहीं देखता। और, एक एयर होस्टेस बेटी वृद्धाश्रम में रह रही मां की कोई खोज-खबर नहीं लेती। बाद में मौत की खबर मिलने पर चुपचाप आकर मां का अंतिम संस्कार करके वापस लौट जाती है। यह सब सिर्फ गीता कपूर पर नहीं गुजरा, बल्कि देश की एक बड़ी बुजुर्ग आबादी बेगानों जैसा जीवन जीने को मजबूर है। बीती नौ मई को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कानपुर के जिलाधिकारी को एक ऐसे बुजर्ग दंपति की सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया, जिन्हें उनके बेटा-बहू परेशान करते और घर से निकालने की धमकी देते थे।

कानपुर के इस बुजुर्ग दंपति ने याचिका दाखिल की थी कि बेटा और बहू उनके साथ रहते हैं और परेशान करते हैं, धमकाते हैं कि घर से बेदखल कर देंगे। बुजुर्ग दंपति ने सुरक्षा दिलाने और बेटे-बहू को घर से बेदखल करने की मांग करते हुए अदालत को बताया कि फरवरी 2018 में उन्होंने जिला प्रशासन से भी गुहार लगाई थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसी तरह एसडीएम सदर, कानपुर अदालत ने भी नौ-दस मई को दो ऐसे मामलों का निस्तारण किया, जो गुजारा भत्ते से संबंधित थे। पहले मामले में मां ने बेटे के खिलाफ भरण-पोषण भत्ता देने के वायदे से मुकरने का आरोप लगाया, तो अदालत ने बेटे की तत्काल गिरफ्तारी के आदेश जारी किए। दूसरे मामले में तिहत्तर वर्षीय बुजुर्ग ने अपनी विधवा बहू पर आरोप लगाया कि वह दिवंगत बेटे की पेंशन लेने के साथ-साथ उनका पुश्तैनी मकान भी बेचने की फिराक में है, लेकिन भरण-पोषण भत्ता देने से इनकार रही है। इस पर अदालत ने बहू को हिदायत दी कि वह न सिर्फ अपने श्वसुर को हर माह छह हजार रुपए भरण-पोषण भत्ता दे, बल्कि उनका पुश्तैनी मकान बेचने की कोशिश से बाज आए।

एक अरब तैंतीस करोड़ की आबादी वाले हमारे देश में बुजुर्गों की संख्या दस करोड़ से भी ज्यादा है। अनुमान है कि यह आंकड़ा साल 2050 आते-आते बत्तीस करोड़ से ज्यादा होगा। संयुक्तराष्ट्र जनसंख्या कोष द्वारा जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के बानवे फीसद बुजुर्ग शौच-स्नान जैसी जरूरतों में सहायता से वंचित हैं। अधिकतर बुजुर्ग अवसाद, संधिवात, मधुमेह और आंख संबंधी बीमारियों से ग्रसित हैं और महीने में औसतन ग्यारह दिन बीमार रहते हैं। ‘हेल्पेज इंडिया’ की एक अन्य रिपोर्ट बताती है कि बुजुर्गों का एक बड़ा हिस्सा आए दिन भूखे पेट सोने को मजबूर है। बुजुर्गों को सरकार की ओर से जो पेंशन दी जा रही है, वह इतनी कम है कि उससे महीने भर तो क्या, चार दिन भी बसर नहीं हो सकता। देश के विभिन्न हिस्सों में पेंशन-राशि भी अलग-अलग है।

यही नहीं, केवल पच्चीस फीसद बुजुर्ग सरकारी पेंशन का लाभ पा रहे हैं। अपवादों को छोड़ दें, तो अधिकतर बुजुर्ग जीवन-भर दोनों हाथों से कमाने के बावजूद अंतिम वेला में कौड़ी-कौड़ी को मोहताज हैं। सबसे ज्यादा परेशानी उन बुजुर्गों को होती है, जिनके पास आय का कोई स्रोत नहीं है। दरअसल, आधुनिकता का सही अर्थ ग्रहण न कर पाने वाले लोग जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में ‘यूज ऐंड थ्रो’ का सिद्धांत अपना बैठे हैं। उन्हें रिश्ते भी घर में दैनिक जरूरत में इस्तेमाल होने वाली वस्तु लगने लगे हैं। यानी जो सामान पुराना अथवा काम लायक न रह जाए, उसकी मौजूदगी अपने इर्द-गिर्द अखरने लगी है। यह आत्मकेंद्रित मानसिकता का नतीजा है, जो न सिर्फ खतरनाक है, बल्कि आने वाले समय में हमारी नई पीढ़ियों की बुनियाद कमजोर कर सकती है। आज जरूरत इस बात की है कि सरकार निराश्रित वृद्धों के लिए ठोस नीति और योजना बनाए और सभी राज्यों में उन्हें बतौर पेंशन एक समान और उचित धनराशि देने की व्यवस्था करे, ताकि वे सम्मानजनक ढंग से गुजर-बसर कर सकें।

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