read article about right evaluation methodology of talented students - राजनीतिः परीक्षा, परिणाम और पैमाना - Jansatta
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राजनीतिः परीक्षा, परिणाम और पैमाना

ऐसा कोई अध्ययन जानकारी में नहीं आया है कि सीबीएसई, किसी अन्य राष्ट्रीय बोर्ड या किसी राज्य के बोर्ड ने उन सौ या पचास ‘टॉपर’ बच्चों की आगे की प्रगति का अध्ययन किया हो जिनके अंक पंचानबे फीसद से अधिक आए हों। यदि ऐसा हुआ होता तो अध्यापकों, अभिभावकों और बच्चों को अंकों की इस अंधी दौड़ की हकीकत का पता चल जाता।

सत्तर-अस्सी के दशक में बोर्ड परीक्षा में सत्तर फीसद अंक पा जाना किसी भी बच्चे को छोटे शहर और कस्बे में हीरो बना देता था।

बोर्ड परीक्षा के परिणाम इस वर्ष भी चर्चा का विषय बने रहे। अनेक परिवारों में परीक्षा परिणाम आने के बाद खुशी की लहर दौड़ जाती है। अंक जितने अधिक हों, प्रसन्नता उतनी ही बढ़ जाती है। इस बार सीबीएसई में कक्षा दस और बारह में प्रथम स्थान पाने वाले पांच बच्चों के अंक पांच सौ में से चार सौ निन्यानवे रहे। दोनों परीक्षाओं में एक-एक लाख से अधिक बच्चों ने नब्बे फीसद से अधिक अंक प्राप्त किए। प्रसन्नता की लहर सारे देश में देखी जा सकती है। यह भी सही है कि जो स्थिति बनी है, वह अनेक प्रकार की चिंताओं को भी जन्म दे रही है। मूल्यांकन की वर्तमान पद्धति ऐसे मुकाम पर पहुंच गई है जहां वह अब बच्चों की प्रतिभा का सही मूल्यांकन करने में समर्थ नहीं रह गई है। जो हो रहा है वह एक मशीनी प्रक्रिया मात्र बन कर रह गया है।

तीस मई को एक अत्यंत हृदय-विदारक खबर छपी, जिसे अधिकांश लोगों ने परीक्षा परिणाम आने के बाद होने वाली आत्महत्याओं की कड़ी में ही देखा, ठीक वैसे ही जैसे आजकल राजनेता किसानों की आत्महत्या को केवल गिनती में इजाफा मानते हैं। इन दो बच्चों के अंक उनसठ और सत्तर फीसद थे। वे बच्चे अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हुए थे, फिर उनकी दुखद मौत का कारण क्या या कौन था? यह अंकों की उस दौड़ का परिणाम है जिसमें सीबीएसई जैसी संस्थाएं फंस गई हैं। इस स्थिति से निकलने का विकल्प युद्ध-स्तर पर ढूंढ़ा जाना चाहिए। वैसे यदि सामान्यजन भी परीक्षा परिणामों और बढ़े हुए अंकों का उत्सव मना लेने के बाद आज के प्राप्तांकों को 1970-80 पर ले जाकर देखें तो वे चिंता में पड़ जाएंगे। सभी स्कूल बोर्ड और सीबीएसई जैसी संस्थाओं को जनता को स्पष्ट करना चाहिए कि अंकों की इस दौड़ को उन्होंने किन परिस्थितियों में अपनाया और क्या लाभ देखे? क्या परिवर्तन शिक्षाविदों और मूल्यांकन विशेषज्ञों की संस्तुति पर हुआ या किसी मंत्री या मंत्रालय की कृपा दृष्टि इसका स्रोत रही है? क्या ‘मॉडरेशन’ और ‘ग्रेस मार्क्स’ में सदाशयता ही तो इस दौड़ की जननी नहीं बन गई? क्या शैक्षिक संस्थाओं को अकादमिक नेतृत्व न देकर उन्हें नौकरशाहों को सौंपना असफल रहा है?

यह तो सभी जानते हैं कि राज्य-स्तरीय बोर्डों ने राष्ट्रीय स्तर के बोर्ड से ही प्रेरणा लेकर अपने यहां भी वही दिशा पकड़ी। एक अन्य प्रश्न भी उठाया जा रहा है कि यदि राज्यों में मुख्यधारा की शिक्षा के लिए एक बोर्ड होता है तो केंद्रीय स्तर पर भी एक ही क्यों नहीं होना चाहिए? देश के सभी बोर्डों की स्वायत्तता स्वीकार्य होनी चाहिए, मगर किसी एक बोर्ड को मनमाने ढंग से- गैर-शैक्षिक कारणों से- मानकों, मापदंडों और मूल्यांकन पद्धतियों से छेड़छाड़ की आजादी नहीं होनी चाहिए। प्राप्तांकों में अंधाधुंध बढ़ोतरी के विश्लेषण के समय जन-मानस में जो प्रश्न उभर कर सामने आए हैं, उनका वेबाक विश्लेषण किया जाना चाहिए।

इस वर्ष सीबीएसई की कक्षा बारहवीं परीक्षा में बहत्तर हजार से ज्यादा बच्चों ने नब्बे फीसद से अधिक अंक प्राप्त किए। बारह हजार से ज्यादा बच्चे पिंच्यानवे फीसद के ऊपर हैं। इनमें से भी कितने घोर निराशा में होंगे, क्योंकि दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रवेश का कट-आफ निन्यानवे फीसद के ऊपर होगा। इतने अंक प्राप्त कर यदि छात्र-छात्रा को अपेक्षित विषय या विश्वविद्यालय में प्रवेश न मिले और उसके पास विदेश जाकर पढ़ने के संसाधन न हों, तो उसकी निराशा और हताशा का अनुमान लगाना कठिन नहीं होगा। ऐसा कोई अध्ययन जानकारी में नहीं आया है कि सीबीएसई, किसी अन्य राष्ट्रीय बोर्ड या राज्य के बोर्ड ने उन सौ या पचास ‘टॉपर’ बच्चों की आगे की प्रगति का अध्ययन किया हो जिनके अंक पंचानबे फीसद से अधिक आए हों। यदि ऐसा हुआ होता तो अध्यापकों, अभिभावकों और बच्चों को अंकों की इस अंधी दौड़ की हकीकत का पता चल जाता। यह भी ज्ञात हो जाता कि ट्यूशन और कोचिंग की आगे के जीवन में कितनी सार्थकता या निरर्थकता है। मेरी चिंता यह है कि आगे भी उन्हें अनेक परीक्षाएं देनी होंगी; उनमें इतने अंक न आने पर निराशा और हताशा इस बच्चे को नहीं, पूरे परिवार को होगी।

सत्तर-अस्सी के दशक में बोर्ड परीक्षा में सत्तर फीसद अंक पा जाना किसी भी बच्चे को छोटे शहर और कस्बे में हीरो बना देता था। उस मूल्यांकन व्यवस्था में ऐसी कौन-सी कमियां थीं जिन्हें अब सुधार लिया गया है? मैं तो अपने जीवन के शैक्षिक अनुभव के आधार पर उन सभी बच्चों से, जिनके पचासी फीसद से अधिक अंक आए होंगे, कहूंगा कि वे खुद सोचें कि उनकी सबसे अधिक रुचि किस विषय या क्षेत्र में है? ऐसा क्या है जो वे बहुत चाहते हुए भी नहीं सीख पाए या कर नहीं पाए? क्या वे संगीतकार या क्रिकेटर बनाना चाहते हैं, मगर उन्हें मजबूरी में गणित और विज्ञान पढ़ना पड़ रहा है? क्यों न अब और आगे पढ़ाई के साथ साथ वह अपनी रूचि के क्षेत्र में भी कुछ समय दें, और इसका परिणाम देखें! वे किसी के भी दबाव में आगे का रास्ता तय न करें और अपनी प्रतिभा के निखार में अपने प्रयत्नों पर विश्वास करें।

सीबीएसई एक स्व-वित्तपोषित स्वायत्त संस्था है। इसे मानव संसाधन विकास मंत्रालय से प्राप्त हर निर्देश का अकादमिक विश्लेषण करने का अधिकार प्राप्त है। प्रारंभिक वर्षों में इसे अकादमिक संस्था के रूप में आगे बढ़ाया गया। धीरे-धीरे नौकरशाही का प्रभाव बढ़ा और इसे भी एक प्रशासनिक संस्था मान कर नियुक्तियां होने लगीं। परिणामस्वरूप इसकी स्वायत्तता केवल कागजों पर रह गई। कई बार तो वर्षों तक इसके कार्यभार की जिम्मेवारी मंत्रालय के किसी अधिकारी को अतिरिक्त प्रभार के रूप में सौंप दी गई। इस सबके परिणामस्वरूप मंत्रालय से प्राप्त हर निर्देश का पालन करना ही इसकी कार्य-संस्कृति बन गई। यदि ऐसा न हुआ होता तो मूल्यांकन और बोर्ड परीक्षा की सारगर्भिता और उपयोगिता इस हाल में नहीं पहुंची होती।

आज जो भी स्थिति बनी है उसमें निजी स्कूलों, कोचिंग संस्थानों और बड़ी संख्या में माता-पिता का योगदान भी है और इसमें सभी कुछ सकारात्मक ही हो, ऐसा नहीं है। कोचिंग संस्थान स्कूलों के प्रबंधन से सांठगांठ कर कमाई करते हैं, अनेक स्थानों पर अध्यापक स्कूलों में कम और कोचिंग संस्थानों में अधिक समय देते हैं। कोचिंग प्रबंधक अपने यहां के बच्चों को अधिक से अधिक अंक दिलाने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है। सभी जानते हैं कि इसमें क्या-क्या शामिल है। अधिकांश निजी स्कूलों में बच्चों को निर्धारित पुस्तकों के अलावा हर विषय में कई और पुस्तकें भी लगभग जबरदस्ती खरीदवाई जाती हैं। बच्चों पर तनाव बढ़ता है।

अधिकांश पढ़े-लिखे अभिभावक बच्चों पर अधिक अंक पाने का दबाव बनाते रहते हैं। यदि बच्चे के साप्ताहिक टेस्ट में भी कम अंक आ जाएं, या पड़ोसवाले के बच्चे से कम हो जाएं, तब तो आफत ही टूट पड़ती है। ऐसी परिस्थितियों में भले ही उसके अंक टयूशन या कोचिंग के कारण बढ़ जाएं, उसका व्यक्तित्व विकास तो कमजोर पड़ ही जाता है। अंकों की गलाकाट प्रतिस्पर्धा किसी भी प्रकार से स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इसके मनोवैज्ञानिक और संवेदनात्मक प्रभाव घोर नकारात्मकता की ओर ले जाते हैं। बिना देरी किए मूल्यांकन प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन करना होगा। बच्चों को समानता के अवसर तभी मिलेंगे जब हर स्कूल में मूलभूत सुविधाएं और अकादमिक प्रावधान उपलब्ध हों। असमान स्थितियों में बच्चों को डाल कर उनकी परीक्षा लेना, समानता के अवसर देने की संविधान की मूल भावना के विपरीत आचरण है। सुधारों का प्रारंभ यहीं से होना चाहिए।

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