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राजनीतिः बाघों की फिक्र किसे है

जंगलों में जबरन घुसे विकास ने जानवरों के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगाना शुरू कर दिया है। वनोन्मूलन के कारण बाघों की रिहाइश में कमी आ रही हैं, जिससे उनकी संख्या घटती जा रही है। वहीं दूसरा कारण बाघों की तस्करी है। बाघों के साम्राज्य में डिजिटल कैमरे की घुसपैठ और पर्यटन की खुली छूट के कारण तस्कर आसानी से बाघों तक पहुंच रहे हैं।

Author June 11, 2018 04:46 am
जनसामान्य को चाहिए कि वे वन्यप्राणियों को दया व सहानुभूति की दृष्टि से देखें और ऐसे उत्पादों का बहिष्कार करें जिन्हें बनाने में वन्यजीवों के अंगों का इस्तेमाल किया जाता है।

देवेंद्रराज सुथार

देश में बाघों की लगातार कम होती संख्या सरकार और पशुप्रेमियों के लिए चिंता का विषय है। कभी लोगों के बीच अपनी दहाड़ से दहशत पैदा कर देने वाले बाघ आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। आज बाघों की आठ में से पांच प्रजातियां ही बची हैं। ‘वर्ल्ड वाइल्ड लाइफनामक संस्था का अनुमान है कि 2022 तक बाघ जंगल से विलुप्त हो जाएंगे। बढ़ते शहरीकरण और सिकुड़ते जंगलों ने जहां बाघों से उनका आशियाना छीना है, वहीं मानव ने भी बाघों के साथ क्रूरता बरतने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, जिसका परिणाम हमारे सामने है।

राष्ट्रीय बाघ सर्वेक्षण प्राधिकरण की रिपोर्ट के मुताबिक 2017 में 115 बाघों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। इनमें बत्तीस मादा और अट्ठाईस नर थे। बाकी बाघों की पहचान नहीं हो सकी। 2017 में बाघों की मौत के मामले में मध्यप्रदेश अव्वल रहा। वहां उनतीस बाघों की मौत हुई। इसके बाद महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तराखंड और असम हैं। चौरासी प्रतिशत बाघों की मौत इन्हीं पांच राज्यों में हुई। आंकड़ों के अनुसार देखें तो साल 2016 में 120 बाघों की मौत हुई थी, जो साल 2006 के बाद सबसे अधिक थी। साल 2015 में अस्सी बाघों की मौत की पुष्टि हुई थी। इससे पहले साल 2014 में यह संख्या 78 थी। आज दुनिया में केवल 3,890 बाघ बचे हैं। अकेले भारत में दुनिया के साठ फीसद बाघ पाए जाते हैं। लेकिन भारत में बाघों की संख्या में बीते सालों में काफी गिरावट आई है। एक सदी पहले भारत में कुल एक लाख बाघ हुआ करते थे। यह संख्या घट कर आज महज पंद्रह सौ रह गई है। ये बाघ अब भारत के दो फीसद हिस्से में रह रहे हैं।

गति और शक्ति के लिए पहचाने जाते बाघों की संख्या में इस गिरावट के पीछे कई कारण हैं। पहला कारण तो यह है कि निरंतर बढ़ती आबादी और तीव्र गति से होते शहरीकरण की वजह से दिनोंदिन जंगलों का स्थान कंकरीट के मकान लेते जा रहे हैं। यों कहें कि जंगलों में जबरन घुसे विकास ने जानवरों के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगाना शुरू कर दिया है। वनोन्मूलन के कारण बाघों की रिहाइश में कमी आ रही हैं, जिससे उनकी संख्या घटती जा रही है। वहीं दूसरा कारण बाघों की तस्करी है। बाघों के साम्राज्य में डिजिटल कैमरे की घुसपैठ और पर्यटन की खुली छूट के कारण तस्कर आसानी से बाघों तक पहुंच रहे हैं। चीन में कई देसी दवाएं और शक्तिवर्द्धक पेय बनाने में बाघ के अंगों के इस्तेमाल के बढ़ते चलन की वजह से भी बाघों की तस्करी की जा रही है। अन्य देशों के कुछ लोग अपने लालच के चलते बाघों की तस्करी और शिकार करके उनके अंगों को चीन भेज रहे हैं।

विशेषज्ञों ने एशिया में बाघों की आबादी की बढ़ोतरी के लिए 42 वनक्षेत्रों को मुफीद पाया है, लेकिन कई देशों में इन वनक्षेत्रों की हालत में सुधार नहीं आने के कारण बाघों की वंशवृद्धि नहीं हो पा रही है। इन वनक्षेत्रों पर भूमाफियों की कुदृष्टि भी बाघों की घटती संख्या के लिए बड़ा कारण साबित हो रही है। बाघों को बीमारियों से भी खतरा बढ़ रहा है। वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि अभयारण्यों के आसपास रहने वाले कुत्ते संक्रामक बीमारी फैला रहे हैं, जो बाघों के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। इसके अलावा करंट, आपसी संघर्ष, रेल और सड़क दुर्घटनाओं में बाघों के मारे जाने के अलावा उन्हें जहर देकर मारे जाने की घटनाएं भी सामने आई हैं। गौर करने वाली बात तो यह भी है कि अधिकतर बाघों की मौत इंसानी बस्तियों में बाघों के घुसने पर और शिकारियों के हाथों हुई है और हो रही है। जंगलों में पानी के अभाव के कारण अकसर बाघ मानव बस्तियों तक आने के लिए विवश हो रहे हैं। इसके चलते कई बार बाघों के सिर पानी के बर्तन में फंसने की खबरें आती रही हैं।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बाघ पारिस्थितिकी के लिए भी महत्त्व रखता है। पारिस्थितिकी पिरामिड तथा आहार शृंखला में बाघ सबसे बड़ा उपभोक्ता है। आज बाघ संरक्षण देश ही नहीं, दुनिया के समक्ष भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। संरक्षण के अभाव में बाघ से मिलने वाले लाभ से भी हमें वंचित रहना पड़ रहा है। भारत में भारतीय वन्यजीवन बोर्ड द्वारा 1972 में शेर के स्थान पर बाघ को भारत के राष्ट्रीय पशु के रूप में माना गया था। इसके बाद सरकार ने बाघों की कम होती संख्या को देखते हुए 1973 में ‘बाघ बचाओ परियोजनाशुरू की थी, जिसके तहत चुने हुए बाघ आरक्षित क्षेत्रों को विशिष्ट दर्जा दिया गया और वहां विशेष संरक्षण-प्रयास किए गए। इसी परियोजना को अब ‘नेशनल टाइगर अथॉरिटी(राष्ट्रीय बाघ प्राधिकरण) बना दिया गया है। बाघों की सुध लेने के लिए 29 जुलाई को ‘विश्व बाघ दिवस भी मनाया जाता है।

बाघ को बचाने के लिए सरकार ने योजना व नीतियां बनाने में कोई कसर नहीं रखी है। लेकिन इतने इंतजाम के बाद भी बाघों की संख्या निरंतर कम क्यों होती जा रही है? सच तो यह है कि राज्य सरकारों के उदासीन रवैए और घूस की प्रवृत्ति ने संरक्षण के नाम पर बाघों तक पहुंचने वाले लाभ को बीच में ही निगल लिया है। इस कारण बाघ संरक्षण के सरकारी इंतजाम ‘सफेद हाथीसाबित हो रहे हैं। सरकार ने वन्यजीव संरक्षण के लिए कई कानून बना रखे हैं। वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत बाघ को मारने पर सात साल की सजा प्रावधान है। लेकिन लचर स्थिति के कारण विरले ही किसी को सजा हो पाती है।

इन हालात में आवश्यकता इस बात की है कि जंगल टास्क फोर्स का गठन किया जाना चाहिए और उसे पुलिस के समकक्ष अधिकार दिए जाएं। वन्यजीवों व जंगल से जुड़े मामलों के निपटारे के लिए विशेष ट्रिब्यूनल की स्थापना और सूखे व किसी भी आपदा जैसे कि आग वगैरह पर तुरंत और प्रभावी कार्रवाई के लिए आपदा प्रबंधन टीमों का गठन होना चाहिए। वन विभाग को बेहतर और आधुनिक साजो-सामान और अधिक अधिकार दिए जाएं, जिससे वे शिकारियों व लकड़ी तस्करों का मुकाबला कर पाएं। कानून का पालन सुनिश्चित करने और खुफिया तंत्र विकसित करने की जरूरत है। वनों और उनमें रहने वाले प्राणियों के बारे में लोगों को जागरूक करना पड़ेगा। अगर सभी लोगों को इस समस्या के दूरगामी परिणाम पता होंगे तो निश्चित रूप से राजनैतिक पार्टियों के घोषणापत्रों में इस मुद््दे को भी प्रमुखता से स्थान मिलेगा और सत्ता में आने पर कोई ठोस कदम उठाया जाएगा।

जनसामान्य को चाहिए कि वे वन्यप्राणियों को दया व सहानुभूति की दृष्टि से देखें और ऐसे उत्पादों का बहिष्कार करें जिन्हें बनाने में वन्यजीवों के अंगों का इस्तेमाल किया जाता है। गाहे-बगाहे शहरी क्षेत्र में घुस आए किसी भी जंगली जानवर को जान से न मारें। बरसों से चली आ रही योजनाओं और घोषणाओं के हाल देख कर लगता है कि सघन वनों से इंसानी दखल बिलकुल समाप्त कर देना चाहिए। बाघों ने प्राचीनकाल से जंगलों पर राज किया है, अगर उन्हें उनके हाल पर भी छोड़ दिया जाए तो शायद सब अपने-आप ठीक होने लगेगा, पर इसके लिए हमें जंगलों से अपने पैर वापस खींचने होंगे। अब प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने के लिए कहीं कुछ हिस्सा तो हमें भी प्रकृति को वापस देना ही होगा। आखिरकार हमें समझना होगा कि विकास यदि साझी विरासत जल, जंगल और जमीन को नुकसान पहुंचा रहा है तो वह विकास नहीं, बल्कि विनाश है।

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