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राजनीतिः प्लास्टिक कचरे से मुक्ति जरूरी

बड़े पैमाने पर प्लास्टिक के कचरे और बेकार सामान की मात्रा बढ़ी है। इससे भी बड़ी समस्या यह सामने आई है कि प्लास्टिक के इस कचरे को जहां-तहां फेंका जा रहा है। विडंबना यह है कि जहां भी लोग पिकनिक के लिए जाते हैं, यहां तक कि जंगलों, पर्वतों की चोटियों, रिवर राफ्टिंग कैंपों और नदियों के किनारों तक पर प्लास्टिक का कचरा छोड़ आते हैं। अधिकांश देशों में निम्न कोटि के प्लास्टिक व पॉलीथिन पर पूर्ण या आंशिक रोक लगने के बावजूद दुनिया में हर साल करीब एक खरब पॉलीथिन थैलियों का उपयोग हो रहा है।

Author July 5, 2018 03:10 am
प्लास्टिक कचरे के नियंत्रण और निष्पादन में दिक्कत इसलिए भी आती है कि अन्य कचरों के साथ ही प्लास्टिक का कचरा मिला हुआ होता है।

वीरेंद्र कुमार पैन्यूली

इस बार विश्व पर्यावरण दिवस पर पूरी दुनिया ने प्लास्टिक प्रदूषण को मात देने का संकल्प किया। 27 मई को ‘मन की बात’ के संबोधन में प्रधानमंत्री ने भी निम्न श्रेणी के प्लास्टिक और पॉलीथिन उत्पादों का उपयोग नहीं करने की अपील की थी। अपील वांछित थी, क्योंकि पांच जून को पर्यावरण दिवस का अंतरराष्ट्रीय मेजबान भारत ही था। पर्यावरण दिवस पर सारा जोर प्लास्टिक प्रदूषण को मात देने पर रहा। आज के वक्त में किसी भी ऐसे घर, संस्थान या दफ्तर की कल्पना करना मुश्किल है जो प्लास्टिक रहित हो। वर्ष 1869 में एक सिंथेटिक पॉलीमर के रूप में जब प्लास्टिक का अविष्कार हुआ था तो प्लास्टिक को भविष्य की संभावना वाले माध्यम के रूप में देखा गया था।

प्लास्टिक शब्द ग्रीक भाषा से लिया गया है, जो ऐसे पदार्थों के लिए प्रयुक्त होता है जिन्हें आसानी से विभिन्न प्रारूपों में ढाला जा सकता है। घरों में बाल्टियां, मग, झाड़ू, कूड़ेदान, गमले, फूल व फूलदान भी प्लास्टिक के ही होते हैं। नल, टोंटियां, पाइप लाइनें, निजी व सार्वजनिक पानी की टंकियां, सार्वजनिक कूड़ेदान भी प्लास्टिक से बने हैं। सफर के लिए अटैचियां, टिफिन बाक्स, खेल के सामान, बरसातियां, पानी की बोतलें, दूध के कैन, यहां तक कि दरवाजे, खिड़की, चौखट तक प्लास्टिक के बन रहे हैं। हल्के होने से पहाड़ों में प्लास्टिक फर्नीचर पहुंचाना आसान हो गया है। जीवन शैली से जुड़े प्रसाधन और खाद्य व पेय सामग्रियां तक प्लास्टिक में बंद मिल रही हैं। आर्थिक पायदान में बढ़ोतरी के साथ परिवारों में इनकी खपत तेजी से बढ़ी है। इस तरह सुविधाजनक किफायती प्लास्टिक की पैठ विश्वव्यापी बन चुकी है।

इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि प्लास्टिक से धातुओं और पेड़ों की भी बचत हुई है। धातु उत्पादन, उसके शोधन और भारी होने से ढुलाई में जो अत्यधिक ऊर्जा लगती है, परोक्ष रूप से उसकी भी बचत होती है। प्लास्टिक के पैकेटों में चीजों को जल्दी खराब होने से बचाने और आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करने में मदद भी मिली है। लेकिन इन सबका कुल मिलाकर जो नुकसान हुआ है, वह यह कि इससे बड़े पैमाने पर प्लास्टिक के कचरे और बेकार सामान की मात्रा बढ़ी है। इससे भी बड़ी समस्या यह सामने आई है कि प्लास्टिक के इस कचरे को जहां-तहां फेंका जा रहा है। विडंबना यह भी है कि जहां भी लोग पिकनिक के लिए जाते हैं, यहां तक की जंगलों, पर्वतों की चोटियों, रिवर राफ्टिंग कैंपों और नदियों के किनारों तक पर प्लास्टिक का कचरा छोड़ आते हैं। अधिकांश देशों में निम्न कोटि के प्लास्टिक व पॉलीथिन पर पूर्ण या आंशिक रोक लगने के बावजूद दुनिया में हर साल करीब एक खरब पॉलीथिन थैलियों का उपयोग हो रहा है। भारत में रोजाना पंद्रह हजार टन से ज्यादा प्लास्टिक का कचरा पैदा होता है। हैरानी की बात तो यह है कि छह हजार टन से ज्यादा कूड़ा इकट्ठा न होने के कारण इधर-उधर बिखर जाता है।

प्लास्टिक कचरे के नियंत्रण और निष्पादन में दिक्कत इसलिए भी आती है कि अन्य कचरों के साथ ही प्लास्टिक का कचरा मिला हुआ होता है। प्लास्टिक का कचरा बड़े शहरों में पांच से दस प्रतिशत तक होता है। दूसरी बड़ी दिक्कत यह है कि जिन प्लास्टिक थैलियों और सामग्रियों आदि पर अदालती रोक लगती है, उनका भी धड़ल्ले से अवैध भंडारण, वितरण और उपयोग होता है। इसलिए प्लास्टिक पर रोक के लिए सरकारों को भी दृढ़ इच्छाशक्ति दिखानी होगी, वरना हर बार न्यायालयों या हरित प्राधिकरण जैसी संस्थाओं को हस्तक्षेप करना पड़ेगा। उत्तराखंड का ही उदाहरण लें। यहां राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने गंगा नदी के किनारे बसे नगरों में गंगोत्री से हरिद्वार तक प्लास्टिक के सभी सामान- पॉलीथिन की थैलियों, प्लेट, प्याले, कटोरी, चम्मच आदि के उपयोग, भंडारण, उत्पादन और वितरण पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था। जून, 2018 में नैनीताल हाईकोर्ट ने भी राज्य में रिवर राफ्टिंग जैसे खेलों पर रोक लगाते हुए संज्ञान लिया कि नदियों के किनारे प्लास्टिक कचरा जमा हो रहा है। अधिकांश राज्य बहाना बनाते हैं कि उनके राज्यों में पॉलीथिन बाहर से आ रही है।

सुप्रीम कोर्ट पहले ही आगाह कर चुका है कि अगर प्लास्टिक पर पूरी तरह से रोक नहीं लगाई गई तो अगली पीढ़ी के सामने परमाणु बम से भी ज्यादा गंभीर खतरा होगा। अभी भी देश के सारे राज्यों में प्लास्टिक पर पाबंदी नहीं है। जहां है, वहां उसकी प्रभावी निगरानी नहीं हो रही है। पूरे देश में ही नगरीय क्षेत्रों में जल भराव और पानी को प्रदूषित करने का बड़ा कारण इस्तेमाल के तत्काल बाद फेंक दिया जाने वाला प्लास्टिक है। मुंबई में वर्ष 2005 में भयंकर बरसात के बाद जलभराव के जो हालात बन गए थे, उनका बड़ा कारण जगह-जगह पॉलीथिन के कचरे से जल निकासी प्रणाली का अवरुद्ध हो जाना था। नहरों के पानी के साथ किसानों के खेतों में जब पॉलीथिन पहुंचता है तो खेतों से उन्हें हटाने का काम बढ़ जाता है। पॉलीथिन की थैलियों सहित प्लास्टिक के बर्तनों और पैकेजिंग सामग्रियों का अगर न्यूनतम इस्तेमाल हो तो इससे भी प्लास्टिक कचरे की समस्या कम हो सकती है।

प्लास्टिक प्रदूषण से बचने के लिए हमें सबसे पहले प्लास्टिक के थैलों का इस्तेमाल बंद करना होगा। इनके स्थान पर कपड़े के थैले का उपयोग करना चाहिए। प्लास्टिक का कचरा कम करने की दिशा में यह बड़ा कदम साबित हो सकता है। दूसरी बात, कचरा कम से कम पैदा हो और उसे जहां-तहां न फेंकने की आदत बनाएं। प्लास्टिक कचरा या अन्य कचरा नियत स्थलों पर ही डाला जाना चाहिए। इसे पानी में तो बिल्कुल नहीं डालना चाहिए। सामयिक यही है कि जब तक प्लास्टिक को पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना खत्म करने की कोई वैज्ञानिक विधि ईजाद नहीं होती है, तब तक इसी रणनीति पर चला जाए कि बेकार फेंके जाने वाले प्लास्टिक को फिर से उपयोग में लाया जाए और नए प्लास्टिक व पॉलीथिन के उत्पादन को बहुत सीमित कर दिया जाए। जो प्लास्टिक पुन: उपयोग के लिए उपयुक्त न हो, उसके सुरक्षित प्रबंधन की व्यवस्था की जाए। बहुत लंबे समय तक प्लास्टिक के कचरे को लैंड फिल्स में भी नहीं रखा जाना चाहिए।

अब कई देशी कंपनियां ऐसी हैं जो बेकार प्लास्टिक को उपयोग में लाती हैं। भारतीय पेट्रोलियम संस्थान देहरादून ने प्लास्टिक कचरे को उच्च कोटि के परिवहन र्इंधन में बदलने की तकनीक विकसित की है। यही नहीं, प्लास्टिक युक्त कचरे से बिजली बनाने का काम भी संस्थान ने किया है। सड़क निर्माण तक में कुछ प्रतिशत प्लास्टिक का उपयोग हो सकता है। कई शहरों में प्लास्टिक के कचरे को मिला कर सड़कें बनाई भी गई हैं। प्लास्टिक कैसे नष्ट हो, इसका तरीका निकालने के लिए वैज्ञानिक जुटे हैं। परंतु इसका प्रसार कम से कम हो, यह सरकारों और प्रशासन की निष्क्रियता पर न्यायिक परिधि का विषय बनता जा रहा है। जिस प्लास्टिक को पुन:उपयोग में न लाया जा सके, उसका निपटान कैसे हो ताकि पर्यावरण को कम से कम नुकसान हो, इस पहलू पर लगातार नव विचार व नवाचार की आवश्यकता है।

कटु यथार्थ यही है कि आज प्लास्टिक का विकल्प प्लास्टिक ही नजर आ रहा है। इसलिए ऐसे जीवाणुओं की खोज जारी है जो प्लास्टिक कचरे के ढेरों को ठिकाने लगा सकते हैं। इसमें कुछ सफलता भी हाथ लगी है। दूसरी तरफ, ऐसे प्लास्टिक उत्पादन की दिशा में बढ़ा जा रहा है जिसे नष्ट भी किया जा सके। ऐसा नहीं है कि जैवीय प्रक्रियाओं से विघटित होने वाला प्लास्टिक पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाता है। उससे भी कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन आदि गैसें निकलती हैं। इसलिए अब ऐसा प्लास्टिक बनाने की दिशा में काम चल रहा है जो प्लास्टिक तो हो, पर पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाए।

 

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