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राजनीतिः भूख से मौत और अन्न की बरबादी

भुखमरी के कई कारण हैं लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण कारण अन्न की बरबादी है। भारत अन्न बरबाद करने में दुनिया के संपन्न देशों से भी आगे है। आंकड़ों के मुताबिक देश में हर साल उतना अन्न बर्बाद होता है जितना ब्रिटेन उपभोग करता है। भारत में कुल पैदा किए जाने वाले भोज्य पदार्थ का चालीस प्रतिशत बरबाद होता है। अर्थात हर साल भारत को अन्न की बरबादी से तकरीबन पचास हजार करोड़ रुपए की चपत लगती है।

Author June 13, 2018 5:19 AM
संयुक्त राष्ट्र की मानें तो संवेदनहीनता के कारण भूख और कुपोषण की समस्या लगातार गहरा रही है। विडंबना यह है कि अगर इस पर काबू नहीं पाया गया तो 2035 तक दुनिया की आधी आबादी भूख और कुपोषण की चपेट में होगी।

कुछ रोज पहले झारखंड के गिरिडीह जिले के मंगरगड्डी गांव में अट्ठावन साल की सावित्री देवी और चतरा जिले में पैंतालीस साल के मीना मुसहर की भूख से तड़प कर हुई मौत यह रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है कि खाद्यान्न वितरण प्रणाली में कथित सुधार और अधिक पैदावार के बावजूद भुखमरी का संकट टला नहीं है। पिछले साल सितंबर माह में भी इसी राज्य के सिमडेगा जिले के करीमती गांव में ग्यारह साल की संतोषी और धनबाद में झरिया थाना क्षेत्र में चालीस साल के रिक्शाचालक की भूख से मौत हुई थी। देश के विभिन्न राज्यों में पहले भी भूख से होने वाली मौतें सत्ता और व्यवस्था की खामियों-नाकामियों को उजागर कर चुकी हैं। 2015 के ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ के मुताबिक भारत में हर वर्ष तीन हजार से अधिक लोगों की मौत भूख से होती है। मरने वालों में सर्वाधिक संख्या बच्चों की होती है।

दुनिया भर के देशों में भुखमरी के हालात का विश्लेषण करने वाली गैर-सरकारी अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट’ (आइएफपीआरआइ) की एक रिपोर्ट से पता चला कि एशियाई देशों में भारत की स्थिति बस पाकिस्तान और बांग्लादेश से ही बेहतर है। नेपाल और म्यांमा जैसे पड़ोसी देश भारत से बेहतर स्थिति में हैं। संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट से भी उद्घाटित हुआ है कि विश्व में भूखमरी के शिकार लोगों की तादाद कम होने के बजाय लगातार बढ़ रही है। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2015 में 77 करोड़ लोग भूख पीड़ित थे जो 2016 में बढ़कर 81 करोड़ हो गए। इसी तरह 2015 में अत्यधिक भूख पीड़ित लोगों की संख्या 8 करोड़ और 2016 में 10 करोड़ थी, वह 2017 में बढ़कर 12.4 करोड़ हो गई है।

संयुक्त राष्ट्र की मानें तो संवेदनहीनता के कारण भूख और कुपोषण की समस्या लगातार गहरा रही है। विडंबना यह है कि अगर इस पर काबू नहीं पाया गया तो 2035 तक दुनिया की आधी आबादी भूख और कुपोषण की चपेट में होगी। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक भुखमरी के शिकार अधिकतर लोग विकासशील देशों में रहते हैं और इनमें से भी सर्वाधिक एशिया और अफ्रीका में। और इनमें भी सर्वाधिक संख्या भारतीयों की है। भुखमरी के ढेर सारे कारण हैं लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण कारण अन्न की बरबादी है। भारत अन्न बरबाद करने के मामले में दुनिया के संपन्न देशों से भी आगे है। आंकड़ों के मुताबिक देश में हर साल उतना अन्न बर्बाद होता है जितना ब्रिटेन उपभोग करता है। भारत में कुल पैदा किए जाने वाले भोज्य पदार्थ का चालीस प्रतिशत बरबाद होता है। अर्थात हर साल भारत को अन्न की बरबादी से तकरीबन पचास हजार करोड़ रुपए की चपत लगती है। साथ ही बरबाद भोजन को पैदा करने में पच्चीस प्रतिशत स्वच्छ जल का इस्तेमाल होता है और साथ ही कृषि के लिए जंगलों को भी नष्ट किया जाता है। इसके अलावा बरबाद हो रहे भोजन को उगाने में 30 करोड़ बैरल तेल की भी खपत होती है।

यही नहीं, बरबाद हो रहे भोजन से जलवायु प्रदूषण का खतरा भी बढ़ रहा है। उसी का नतीजा है कि खाद्यान्न में प्रोटीन और आयरन की मात्रा लगातार कम हो रही है। खाद्य वैज्ञानिकों की मानें तो कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्सर्जन की अधिकता से भोजन से पोषक तत्त्व नष्ट हो रहे हैं जिसके कारण चावल, गेहूं, जौ जैसे प्रमुख खाद्यान्न में प्रोटीन की कमी होने लगी है। आंकड़ों के मुताबिक चावल में 7.6 प्रतिशत, जौ में 14.1 प्रतिशत, गेहूं में 7.8 प्रतिशत और आलू में 6.4 प्रतिशत प्रोटीन की कमी दर्ज की गई है। अगर कार्बन उत्सर्जन की यही स्थिति रही तो 2050 तक दुनिया भर में पंद्रह करोड़ लोग इस नई वजह के चलते प्रोटीन की कमी का शिकार हो जाएंगे।

एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक भारतीयों के प्रमुख खुराक से 5.3 प्रतिशत प्रोटीन गायब हो जाएगा। इस कारण 5.3 करोड़ भारतीय प्रोटीन की कमी से जूझेंगे। अगर भोज्य पदार्थों में प्रोटीन की मात्रा में कमी आई तो भारत के अलावा उप-सहारा अफ्रीका के देशों के लिए भी स्थिति भयावह होगी। इसलिए कि यहां लोग पहले से ही प्रोटीन की कमी और कुपोषण से जूझ रहे हैं। बढ़ते कार्बन डाइ आक्साइड के प्रभाव से प्रोटीन ही नहीं, आयरन की कमी की समस्या भी बढ़ेगी। दक्षिण एशिया और उत्तर अफ्रीका समेत दुनिया भर में पांच वर्ष से कम उम्र के 35.4 करोड़ बच्चों और 1.06 करोड़ महिलाओं के इस खतरे से ग्रस्त होने की आशंका है। इसके कारण उनके भोजन में 3.8 प्रतिशत आयरन कम हो जाएगा। फिर एनीमिया से पीड़ित होने वाले लोगों की संख्या बढ़ेगी। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन की रिपोर्ट बताती है कि सरकार की कई कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद भारत में पिछले एक दशक में भुखमरी की समस्या में वृद्धि हुई है। देश में आज भी तीस करोड़ लोग हर रोज भूखे पेट सोने को मजबूर हैं जबकि सरकारी गोदामों में हर वर्ष हजारों करोड़ रुपए का अनाज सड़ जाता है। अगर गोदामों के जरूरी भंडारण से अतिरिक्त अनाज को गरीबों में वितरित किया जाए तो भूख और कुपोषण से निपटने में मदद मिलेगी।

विश्व बैंक ने कुपोषण की तुलना ‘ब्लैक डेथ’ नामक उस महामारी से की है जिसने अठारहवीं सदी में यूरोप की जसंख्या के एक बड़े हिस्से को निगल लिया था। विश्व बैंक के आंकड़ों पर गौर करें तो भारत में कुपोषण का दर लगभग पचपन प्रतिशत है जबकि उप सहारीय अफ्रीका में यह दर सत्ताईस प्रतिशत के आसपास है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि भारत में हर साल भूख और कुपोषण के कारण मरने वाले पांच साल से कम उम्र के बच्चों की संख्या दस लाख से भी ज्यादा है। दक्षिण एशिया में भारत कुपोषण के मामले में सबसे बुरी हालत में है।

एसीएफ की रिपोर्ट बताती है कि भारत में कुपोषण की व्यापकता जितनी है उतनी पूरे दक्षिण एशिया में और कहीं देखने को नहीं मिलती। अच्छी बात यह है कि केंद्र सरकार ने भूख और कुपोषण से निपटने के लिए राष्ट्रीय पोषण मिशन का खाका तैयार कर ली है जिसके तहत महिलाओं और बच्चों को पूरक पोषण दिया जाना सुनिश्चित हुआ है। सरकार ने इस मिशन को कामयाब बनाने के लिए जमीनी स्तर पर सूचना प्रौद्योगिकी के जरिए निगरानी की भी व्यवस्था कर ली है। महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय ने इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए राष्ट्रीय तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भागीदारी सुनिश्चित करने के दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

इस मिशन को जमीनी आकार देने में आंगनबाड़ियों की प्रमुख भूमिका होगी और इसके लिए सरकार ने विश्व बैंक की सहायता से सुदृढ़ीकरण तथा पोषण सुधार कार्यक्रम से संबंधित समेकित बाल विकास सेवा प्रणाली के आठ राज्यों आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान तथा उत्तर प्रदेश के 2534 सर्वाधिक पिछड़े ब्लॉकों में दो लाख भवन बनाने की हरी झंडी दिखाई है। इसके अलावा असम, ओड़िशा तथा तेलंगाना में मनरेगा योजना के अंतर्गत अगले चार वर्षों में प्रतिवर्ष पचास हजार मकान बनाया जाना सुनिश्चित हुआ है। लेकिन बात तो तब बनेगी जब देश में बरबाद हो रहे अन्न का सदुपयोग करते हुए करोड़ों लोगों का पेट भरा जाएगा। भोजन की बरबादी रोके बिना भुखमरी, कुपोषण और गरीबी से नहीं निपटा जा सकता।

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