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राजनीति: हिमालय पर गहराता संकट

हिमालय के अनेक क्षेत्रों में अत्यधिक व अनियंत्रित खनन से वनों व खेती-किसानी को भारी नुकसान पहुंचा है। खनन से कारण ही यहां अनेक स्थानों पर भू-स्खलन और बाढ़ की समस्या ने विकराल रूप धारण किया है। हजारों गांवों के समक्ष आज अस्तित्व का संकट खड़ा है। दरअसल, आज उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बेतहाशा दोहन, जंगलों में आग व अन्य प्राकृतिक कारणों से जड़ी बूटियां व औषधीय प्रजातियां भी नष्ट होती जा रही हैं।

Author Updated: November 7, 2020 5:13 AM
हिमालय पर खनन और ग्लोबल वार्मिंग से प्राकृतिक संपदा को क्षति।

लालजी जायसवाल

विश्व की प्रसिद्ध पर्वत शृंखलाओं में से एक हिमालय अपने में धरती की पारिस्थितिक विविधता को समेटे हुए है। साथ ही, भारत जैसे देश के लिए यह बहुत बड़ा रक्षा कवच भी है। आध्यात्मिक दृष्टि से भी हिमालय की सर्वोच्चता जगजाहिर है। यह विश्व के जैव विविधता वाले छत्तीस प्रमुख क्षेत्रों में से एक है। साढ़े पांच लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्रफल में फैले इस पारिस्थितिकीय तंत्र में जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की हजारों प्रजातियां हैं। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआइ) की 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक हिमालय में जंतुओं की तीस हजार तीन सौ सतहत्तर प्रजातियां और उप-प्रजातियां हैं।

हिमालय में मौजूद वनस्पतियों की कुल कितनी प्रजातियां हैं, इसका सटीक आंकड़ा अभी उपलब्ध नहीं है। हालांकि भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के मुताबिक पूरे देश में उनचास हजार से अधिक वनस्पति प्रजातियां और उप-प्रजातियां हैं। इनमें साढ़े दस हजार वनस्पति प्रजातियां असल में बीजीय पौधों (सीड प्लांट) की श्रेणी में आती हैं। हिमालयी आर्किड पादप संसार की सबसे प्राचीन वनस्पतियों में से एक है जो अपने खूबसरत फलों और फूलों जिनमे खुबानी, हिंसर, किनगोड़, खैणु, तूंग, खड़ीक, भीमल, आमड़ा, कीमू, गूलर, भमोरा, भिनु सहित जंगली फलों की ऐसी सौ से ज्यादा प्रजातियां हैं, जो पहाड़ को प्राकृतिक रूप में संपन्नता प्रदान करती हैं। हिमालय में यह सात सौ मीटर से करीब तीन हजार मीटर तक की ऊंचाई पर पाए जाते हैं। उत्तराखंड राज्य में इसकी लगभग दो सौ पचास प्रजातियां पहचानी गई हैं, लेकिन आज ज्यादातर प्रजातियां अपना वजूद खोने की कगार पर आ गई हैं। जीव विज्ञानियों का कहना है कि कम से कम पांच या छह प्रजातियां तो विलुप्ति की कगार पर हैं, जिनमें स्केरलेट गाला, सुपर चीफ, आरगन स्पोर प्रमुख हैं।

विशेषज्ञ मानते हैं कि आर्किड और दूसरी दुर्लभ प्रजातियों को बचाने के लिए इन वनस्पतियों के आर्थिक महत्त्व को समझना और स्थानीय लोगों के लिए उन्हें उपयोगी बनाना जरूरी है। उत्तराखंड सरकार दावा कर रही है कि वह आर्किड को पारिस्थितिकीय पर्यटन का जरिया बनाना चाहती है, ताकि राज्य के लोगों को इससे आमदनी हो और संवेदनशील इलाकों में पाई जाने वाली ऐसी वनस्पतियों के प्रति जागरूकता बढ़े। बहुत सी प्रजातियां हैं जिनका महत्व अभी भी हमें नहीं मालूम, लेकिन कल हो सकता है कि वह प्रजाति अपने गुणों के कारण बहुत अहम हो जाए।

इस लिहाज से भी जैव विविधता को बचाने की बहुत जरूरत है। वनस्पतियों के व्यावसायिक महत्त्व को अब दुनिया भर में अनुभव किया रहा है। किसी पेय द्रव्य में एक बूटी की सुगंध आ जाने से उसकी कीमत कई गुना बढ़ जाती है। जैसे- यासार्गंुबा कीड़ा मरने के बाद पहाड़ियों पर घास-पौधों के बीच बिखरता है। इन्हीं मृत कीड़ों का उपयोग आयुर्वेद में किया जाता है, जो प्राय: अत्यन्त दुर्लभ जड़ी बूटी की श्रेणी में है। हिमालयी क्षेत्रों में जड़ी बूटियों के संरक्षण के लिए तमाम परियोजनाएं चल रही हैं। जड़ी-बूटी का विश्व बाजार तेजी से उभर रहा है। इसलिए इसका सतत प्रबंधन बेहद जरूरी है।

आज विडंबना यह है कि मानवीय गतिविधियों ने हिमालय को झुकाने का प्रयास किया है और यह सब उस स्थिति में हो रहा है जब दुनिया के कई विज्ञानियों ने इस बात को साबित कर दिया है कि बांध पर्यावरण के लिए भीषण खतरा हैं और दुनिया के दूसरे देश अपने यहां से धीरे-धीरे बांधों को कम करते जा रहे हैं। पिछले कुछ दशकों से हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों का इतना अंधाधुंध दोहन किया गया है कि यहां का पारिस्थितिकी तंत्र ही गड़बड़ा गया है। वर्ष 2013 में उत्तराखंड में आई त्रासदी के पीछे मुख्य कारण ही पर्यावरण से छेड़छाड़ था।

आए दिन हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन की घटनाएं हो रही हैं, लेकिन समस्या यह है कि हमारी सरकारें कदापि यह विचार नहीं करतीं कि हिमालय का संरक्षण पूरे देश का दायित्व है। वह देश का गौरव है, स्वाभिमान है, प्राण है। जीवन के सारे आधार यथा- जल, वायु, मृदा, जंगल आदि हिमालय की ही देन हैं। आज भी देश की तकरीबन पैसठ फीसद आबादी का आधार हिमालय ही है। यदि उसी हिमालय की पारिस्थितिकी प्रभावित होगी तो हमारा देश प्रभावित हुए बिना कैसे रह सकता है!

हिमालय के अनेक क्षेत्रों में अत्यधिक व अनियंत्रित खनन से वनों व खेती-किसानी को भारी नुकसान पहुंचा है। खनन से कारण ही यहां अनेक स्थानों पर भू-स्खलन और बाढ़ की समस्या ने विकराल रूप धारण किया है। हजारों गांवों के समक्ष आज अस्तित्व का संकट खड़ा है। दरअसल, आज उच्च हिमालयी क्षेत्रों में बेतहाशा दोहन, जंगलों में आग व अन्य प्राकृतिक कारणों से जड़ी बूटियां व औषधीय प्रजातियां भी नष्ट होती जा रही हैं। हाल में चेतावनी दी गई थी कि हिमालय क्षेत्र के बंजर होने की दिशा में बढ़ने की शुरुआत हो चुकी है।

इससे पहाड़ी क्षेत्रों की पारिस्थितिकी को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। निश्चित तौर पर पहाड़ी इलाकों में पर्यटन को बढ़ावा देना राजस्व के अलावा स्थानीय लोगों के रोजगार की दृष्टि से जरूरी माना जा सकता है, लेकिन सनद रहे कि इसकी आड़ में हिमालयी राज्यों की सरकारें होटल, पिकनिक स्थल, शॉपिंग मॉल आदि विकसित करने, बिजली, खनन और दूसरी विकास परियोजनाओं और सड़कों के विस्तार के नाम पर निजी कंपनियों को मनमाने तरीके से पहाड़ों और पेड़ों को काटने की धड़ल्ले से अनुमति भी दे रही हैं जो हिमालय के विनाश का बड़ा कारण बन रहा है।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर हिमालय को कौन बचाए? इस संबंध में प्रकृतिे संरक्षण के इस सिद्धांत का कोई ज्यादा मतलब नहीं रह जाता कि जो इसका भोग कर रहा है वही बचाए, क्योंकि हिमालय का ज्यादा लाभ वहां के निवासी नहीं उठाते और जो लाभ लेते हैं वे इसके संरक्षण में कोई भागीदारी नहीं करते।

देश के बढ़ते शहरों, उनकी असीमित आवश्यकताओं और विलासिता के जुनून ने धरती के संतुलन को खूब बिगाड़ा है। आज बड़े- बड़े बांधों ने शहरों में ऊर्जा और उद्योग तो पनपाए, लेकिन हिमालय में वीरानी और भय का माहौल भी पैदा कर दिया। इसलिए आज संसाधनों के सही वितरण के साथ रोजगार और व्यवसाय को पर्यावरण से जोड़ने की जरूरत है, ताकि लोग खुद ही इसे बचाने के लिए आगे आएं। अब भी समय है कि लोगों को एक साथ जोड़ कर हिमालय की चिंता की शुरुआत हो। अन्यथा खाली होता हिमालय हमें और बड़ी चिंता में डाल देगा।

हिमालय में भी जीवन है, जान है, इसलिए इसको बचाने की आवश्यकता है। वन्यजीव और वनस्पति प्रजातियों और पारिस्थितिकी तंत्र से पर्यावरण सेवाओं के साथ-साथ उनके संरक्षण की भी जिम्मेदारी न केवल वैश्विक स्तर पर होनी चाहिए, अपितु क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर भी आवश्यक हैं। हिमालय की रक्षा के अभियान को अगर गंभीरता से लेना है तो यह जरुरी होगा कि इसे स्थानीय लोगों के जनजीवन से जोड़ कर देखा जाए। उनकी बेहतरी से ही हिमालय बेहतर होगा, क्योंकि इनका जीवन अपने जल, जंगल और जमीन से जुड़ा है। स्थानीय संसाधनों पर आधारित रोजगार की व्यवस्था भी हिमालय को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। जहां संसाधन बचेंगे, वहीं पारिस्थितिकी तंत्र भी सुधरेगा और नए रोजगारों का सृजन भी होगा।

हिमालय की त्रासदी से जुड़ी एक घटना यह भी है कि हिमालय जनविहीन हो रहा है। रोजगार और शहरी सुविधाओं के लिए स्थानीय लोग अब घर-गांव छोड़ने को विवश हैं। ऐसे में आने वाले समय में हिमालय एक बंजर पहाड़ होकर रह जाएगा। हिमालयी क्षेत्र की अनदेखी का मतलब अपने जीवन को संकट में डालना है। इसलिए सबसे पहले सरकारों को विकास के संदर्भ में अपनी सोच को दुरुस्त करना होगा। विकास ऐसा होना चाहिए कि उसमें पर्यावरण की चिंता का भी समाधान किया जाए।

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