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जनसत्ता बारादरीः बदल गई है देशद्रोह की परिभाषा

पिछले आम चुनाव और फिर इस बीच हुए अधिकतर विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को पराजय का मुंह देखना पड़ा।

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला

पिछले आम चुनाव और फिर इस बीच हुए अधिकतर विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को पराजय का मुंह देखना पड़ा। संसद में वह विपक्ष के लिए तय सीटें भी नहीं हासिल कर सकी। मगर पिछले दिनों पांच राज्यों में हुए चुनावों और हाल के उप-चुनावों के नतीजों को देखते हुए कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला का कहना है कि कांग्रेस धीरे-धीरे अपनी स्थिति बेहतर कर रही है। उनका कहना है कि नरेंद्र मोदी कांग्रेस-युक्त भाजपा का निर्माण कर रहे हैं। वह भगोड़ों की पार्टी बन गई है। भगाए हुए लोगों के बल पर सत्ता पाई जा सकती है, राष्ट्र की संरचना नहीं की जा सकती। वे मोदी को उन्हीं की बात याद दिलाते हुए कहते हैं कि सत्ता आखिरी पड़ाव नहीं, परिवर्तन का माध्यम है। जनसत्ता बारादरी में उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस जल्द ही नई सोच और नीति के साथ जनता के सामने आएगी। बातचीत का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।

मनोज मिश्र : उपचुनावों के ताजा नतीजों को आप किस तरह देखते हैं?
रणदीप सिंह सुरजेवाला : ये दर्शाते हैं कि विपक्षमुक्त भारत का नक्शा जो भाजपा बनाने चली थी, उसे देश की जनता ने सच का आईना दिखाया है। कर्नाटक में एक सीट कांग्रेस और एक भाजपा के पास थी। इसमें कांग्रेस के एक विधायक ने इस्तीफा दिया और भाजपा में चले गए। कांग्रेस ने भाजपा में गए उस भगोड़े को हराया और दोनों सीटें कांग्रेस ने ज्यादा अंतर से जीतीं। दिल्ली में राजौरी गार्डन सीट पर 2015 में हुए चुनाव में कांग्रेस का वोट करीब साढ़े ग्यारह फीसद था और अब करीब साढ़े तैंतीस फीसद है। जो आम आदमी पार्टी पूरे देश में कांग्रेस का विकल्प बनना चाहती थी, उसकी हकीकत सामने आ गई, जब उसकी जमानत जब्त हो गई। तो, ये नतीजे दिखाते हैं कि कांग्रेस उभार पर है।

सूर्यनाथ सिंह : तो इन नतीजों में आप जनता को कांग्रेस के पक्ष में पा रहे हैं?
रणदीप सिंह सुरजेवाला : हालांकि दस-बारह विधानसभा सीटों के आधार पर रुझान तय नहीं किया जा सकता, पर पांच राज्यों के चुनाव के बाद भी देश के मिजाज का यह एक छोटा-सा नमूना है। इससे यही साबित हो रहा है कि अभी देश विपक्ष-मुक्त भारत की तरफ नहीं जा रहा है।

मनोज मिश्र : कांग्रेस लगातार सिकुड़ रही है, इसके क्या कारण हैं और इस स्थिति में बदलाव के लिए वह क्या प्रयास कर रही है?
रणदीप सिंह सुरजेवाला : जब क्षेत्रीय दल बढ़े, जिनकी शुरुआत साठ और सत्तर के दशक में हुई तब कांग्रेस ने क्षेत्रीय दलों की वजह से अपना धरातल खोया। इस देश में एक बार फिर कई दशक बाद क्षेत्रीय दलों से राष्ट्रीय दलों की तरफ मुहिम चली है। रही बात बदलाव की, तो संगठनात्मक और राजनीतिक दोनों परिदृश्य हमें बदलने की जरूरत है। व्यापक संगठनात्मक बदलाव, नए नेतृत्व का पदार्पण और दस साल यूपीए में जो अधिकारों पर आधारित समन्वय और जनता को समायोजित करने की राजनीति थी, वह कामयाब थी। लगता है कि उसकी प्रासंगिकता कम हो गई है। जो पार्टी बैंकों के राष्ट्रीयकरण से उदारीकरण तक आई, उसे समाज के उन हिस्सों के लिए, जो अपने को उदारीकरण की नीति से महरूम पाते हैं, और नए समाज में नई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, उनके लिए एक नए आर्थिक-सामाजिक नीति के निर्माण की आवश्यकता है। जनता के सामने हम बहुत जल्द नए नजरिए से आएंगे।

अनिल बंसल : हरियाणा के चुनाव में कांग्रेस के लोगों ने ही आलाकमान के फैसले को उलट दिया। मगर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो पाई। क्यों?
रणदीप सिंह सुरजेवाला : हरियाणा में जो कुछ हुआ, वह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण था। धोखाधड़ी हुई, जालसाजी हुई, दिनदहाड़े भाजपा द्वारा प्रजातांत्रिक बहुमत को लूटा गया। दुर्भाग्य से आपराधिक मामलों की जांच स्वयं भाजपा के लोग कर रहे हैं। जहां तक उसे कानूनी चुनौती देना था, वह अदालत के विचाराधीन है। फैसला आने के बाद पार्टी को जो कठोर कदम उठाना होगा, वह जरूर उठाएगी।

अनुराग अन्वेषी : मौजूदा दौर में कांग्रेस और भाजपा नेतृत्व की तुलना कैसे करेंगे?
रणदीप सिंह सुरजेवाला : हरियाणा में कांग्रेस की पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी कतार का नेतृत्व है। भाजपा के पास वह नहीं है। वहां वह भगोड़ों की पार्टी है। गोवा में भाजपा का एक भी मंत्री नहीं है। उत्तराखंड में भी यही हाल है। वहां करीब साठ फीसद मंत्री बाहरी हैं। किसी अखबार ने लिखा भी कि मोदीजी कांग्रेस-मुक्त भारत नहीं, कांग्रेस-युक्त भाजपा का निर्माण कर रहे हैं। सवाल है कि क्या प्रजातंत्र में भगोड़ों के बल पर सत्ता हासिल कर लेना ही आखिरी लक्ष्य है? या फिर आमूल-चूल बदलाव? परिवर्तन और जवाबदेही के मुद्दे पर कांग्रेस को हरा कर मोदीजी को इतना बड़ा बहुमत मिला था, उन्हें इस बात का निर्णय करना पड़ेगा, वरना जनता ने हमें नकारा, उन्हें नकारने में भी देर नहीं लगाएगी।

राजेंद्र राजन : ईवीएम को लेकर कांग्रेस की तरफ से विरोधाभासी बयान आ रहे हैं? क्या इसे लेकर कोई पार्टी लाइन नहीं है?
रणदीप सिंह सुरजेवाला : ईवीएम की शुरुआत कांग्रेस सरकार के समय हुई थी, तब भाजपा के प्रवक्ता जीवीएल नरसिंह ने पुस्तिका लिख कर बताया था कि इल्केट्रॉनिक वोटिंग मशीन जनतंत्र में सबसे बड़ा धोखा हैं। उसकी भूमिका लालकृष्ण आडवाणी ने लिखी थी और उसका अनावरण भी किया था। उसके बाद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने ईवीएम की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी चिप आधारित मशीन की विश्वसनीयता कायम रखने के लिए वेरीफाइवल पेपर ट्रेल- वी-पैट- लगाना अनिवार्य है। उसी फैसले के आधार पर उन्हें निर्देश दिया गया। मगर किसी कारण से चुनाव आयोग तीन साल से उस फैसले को भूला बैठा है। भाजपा सरकार ने वी-पैट लगाने के लिए पैसा दिया ही नहीं। आज फिर सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है। हमारा बस इतना कहना है कि चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता बरकरार रहनी चाहिए।

मुकेश भारद्वाज : कांग्रेस पर एक बड़ा इल्जाम है कि वहां एक परिवार का आधिपत्य है। राहुल गांधी को लेकर कांग्रेस की क्या मजबूरी है, जबकि देश उनके नेतृत्व को नकार चुका है?
रणदीप सिंह सुरजेवाला : यह सही है कि 2014 के बाद हम कई चुनाव हारे हैं, मगर राहुल गांधी जबसे कांग्रेस के महासचिव और फिर उपाध्यक्ष बने हैं, तबसे कुल चुनावों का आंकड़ा देखें तो कांग्रेस की स्थिति बेहतर हुई। दूसरी बात कि 1989 के बाद से गांधी-नेहरू परिवार का कोई सदस्य प्रशासनिक पद पर नहीं है, न सत्ता में है। 2004 में जरूर सोनिया गांधी को मौका मिला था, पर उन्होंने उसे अस्वीकार कर दिया था। 2009 में खुद मनमोहन सिंह ने राहुल गांधी से कहा था कि अब आप जिम्मेदारी संभाल लीजिए, मैं अपने सेहत आदि को देखते हुए अपना पद छोड़ देता हूं। इससे कम से कम एक बात साबित हो जाती है कि केवल सत्ता की लोलुपता या पद की दौड़ में गांधी परिवार के दोनों सदस्य नहीं हैं। दो बार हम उनके नेतृत्व में चुनाव जीते भी हैं। लेकिन 2014 के बाद बताया जाने लगा है कि देश के इतिहास की शुरुआत 15 अगस्त, 1947 से नहीं, 26 मई, 2014 से हुई है। जैसे उससे पहले कोई जनतंत्र था नहीं, उसकी शुरुआत भी उसी समय से हुई है। हमने बहुत सारे चुनाव हारे और बहुत सारे चुनाव जीते। जब जीते तो उसका घमंड नहीं और जब हारे तो उसकी हताशा नहीं। हां, कांग्रेस को अपने वैचारिक बहाव के बारे में नए सिरे से सोचने की आवश्यकता है। संगठन में एक नए नेतृत्व का चुनाव करने की आवश्यकता है। ये दोनों चीजें हम करेंगे।

पारुल शर्मा : संचार तकनीक के उपयोग के मामले में कांग्रेस कमजोर क्यों साबित हो रही है?
रणदीप सिंह सुरजेवाला : कांग्रेस का मानना है कि लोगों का मन इश्तहार, सोशल मीडिया पर भ्रामक प्रचार के माध्यम से नहीं जीता जाएगा। कामों से दिल जीतेंगे, बातों से नहीं। उसका मकसद अपने आप को लोगों से जोड़ने, उनके लिए काम करने और उनके लिए दूरदृष्टि वाला विजन तैयार करने और उसका जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन का है। अब सूचना माध्यम भी वाणिज्यिक होते गए हैं। वे निष्पक्ष नहीं रह गए हैं। इसके अलावा फेसबुक, वाट्स ऐप, ट्विटर आदि के जरिए सूचना के प्रसार को बढ़ावा मिला है, पर एक ताजा सर्वे में बताया गया है कि वाट्स ऐप पर जो सूचनाएं प्रसारित की जाती हैं उनमें बयालीस फीसद गलत होती हैं। सूचना क्रांति का फायदा कांग्रेस को उठाना पड़ेगा। लेकिन कांग्रेस कभी सूचना क्रांति का इस्तेमाल अपने विपक्षी को गाली देने, झूठा प्रचार करने के लिए नहीं करेगी, यह हमारा एकतरफा निर्णय है।

मृणाल वल्लरी : कांग्रेस में विपक्ष की ऊर्जा नहीं दिखती, इसकी क्या वजह है?
रणदीप सिंह सुरजेवाला : कांग्रेस को जमीनी स्तर पर और मेहनत करने की आवश्यकता है, इस बात से मैं सहमत हूं। नौजवानों से लेकर किसानों तक, महिलाओं से लेकर दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों तक उनकी आवाज हमें नए तरीके से और बुलंद करने की आवश्यकता है। हम अपनी गलतियों को सुधारेंगे, कमियों को दूर करेंगे, हम उस दौर से गुजर रहे हैं।

सूर्यनाथ सिंह : आपको ऐसा क्यों लगता है कि मीडिया दबाव में काम कर रहा है। क्या कांग्रेस में कोई भय है या दूसरा कोई कारण है?
रणदीप सिंह सुरजेवाला : देखिए, जब वाणिज्यिक हित पत्रकारिता से बड़े हो जाएंगे तो कलम की ताकत कम होगी ही। कांग्रेस को इससे भय नहीं है, एक नागरिक के तौर पर यह मेरी चिंता है। मीडिया के तीन स्वरूप हैं- प्रिंट, टेलीविजन और सोशल मीडिया। कुछ पत्रकार-समूहों को छोड़ दें तो ज्यादातर के मालिक वे हैं जो पत्रकारिता और व्यवसाय दोनों को चलाते आए हैं। अगर मैं कहूं कि देश के पांच औद्योगिक घराने देश के पचासी फीसद मीडिया के मालिक हैं-तीनों तरह के, तो क्या यह चिंता का विषय नहीं होना चाहिए? बहुत सारे अखबार और दूसरे माध्यम सरकारी विज्ञापनों पर आश्रित हो गए हैं, जिसका फायदा केंद्र और प्रांतीय सरकारें उठाती रही हैं। उनकी संपादकीय नीति को मोड़ने का प्रयास करती है। क्या यह चिंता का विषय नहीं है?
विष्णु मोहन : मोदी सरकार के तीन साल पूरे हो रहे हैं। उसने जो वादे किए थे, वे पूरे होते नहीं दिख रहे। लेकिन कांग्रेस इसके खिलाफ पुरजोर माहौल नहीं बना पा रही है?
रणदीप सिंह सुरजेवाला : हम अपनी बात जनता के सामने और पुरजोर तरीके से कैसे रखें, यह सवाल हमारी पार्टी के सामने भी खड़ा रहता है। हम उसके लिए मीडिया का उपयोग करते रहे हैं। उसे और कैसे पुरजोर तरीके से उठाया जा सके, इसका जवाब मैं भी ढंूढ़ रहा हूं। अब हमें इंटरनेट के इस्तेमाल पर बल देना होगा, क्योंकि वहां बगैर संसाधनों के भी अपनी बात पुरजोर तरीके से रख सकते हैं।

दीपक रस्तोगी : क्या वजह है कि भाजपा आपकी पार्टी में सेंधमारी करने में सफल हो पा रही है। इसकी वजह कांग्रेस की कार्य-संस्कृति का कमजोर होना तो नहीं?
रणदीप सिंह सुरजेवाला : जब राजनीति में से सिद्धांत खत्म हो जाएंगे, जब तटस्थता खत्म हो जाएगी, जब दायित्व का आभास और जनता के प्रति जवाबदेही मात्र सत्ता की लोलुपता बन जाएगी, जब दलों की प्रतिबद्धता और नीतियों के प्रति कर्तव्यपरायणता को कपड़ों की तरह बदलने लग जाएंगे, तो फिर आपको राजनीति में नहीं रहना चाहिए। राजनीतिक पार्टी कहीं न कहीं मां के समान होती है। जो लोग अपने मां-बाप रोज बदलते हैं, माफ कीजिए, उन पर केवल दया की जा सकती है, क्योंकि वे अनाथ बन जाते हैं। और जो दूसरों के बच्चों को भगा कर अपने परिवार को बढ़ाने का स्वप्न देखता है, उसका भी विनाश जरूर होता है। यह सही है कि परिवार का कोई सदस्य- चाहे वह अच्छा हो या बुरा, उसके जाने से दुख होता है, पर कांग्रेस को ऐसे लोगों के जाने से आहत होने की आवश्यकता नहीं। क्योंकि जो सच्चाई आपके पास रह गई, झूठ भाजपा के पास चला गया।

मृणाल वल्लरी : अभी इतिहास लेखन पर संघ का बहुत जोर है। नेहरू मॉडल के बरक्स मोदी मॉडल खड़ा किया जा रहा है, इसे आप कैसे देखते हैं?
रणदीप सिंह सुरजेवाला : भाजपा और संघ चूंकि इतिहासविहीन हैं, इसलिए वे एक झूठे इतिहास की संरचना में लगे हैं। जब कांग्रेस ब्रिटिश सरकार के साथ संघर्ष कर रही थी, तब सावरकर जी उस समय अंग्रेज सरकार से बातचीत कर रहे थे। उनके पास इतिहास नहीं है, इसलिए वे इतिहास का पुनर्लेखन कर रहे हैं। इस चुनौती का सामना अकेले कांग्रेस को नहीं करना है। क्योंकि जो कौमें अपना इतिहास भूल जाती हैं या अपना इतिहास लिखने की इजाजत फासीवादी ताकतों को दे देती हैं, उनका भविष्य धूमिल हो जाता है। इसलिए पूरे देश को इससे लड़ना है।

मुकेश भारद्वाज : आपकी नजर में आज देशद्रोह क्या है?
रणदीप सिंह सुरजेवाला : मोदी और संघ का विरोध ही देशद्रोह है।

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