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राजनीतिः समानता की तलाश में एकल महिला

लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि जीवन में विवाह के परे भी बहुत कुछ है। हमारे देश में कितने ही ऐसे उदाहरण हैं जब एकल महिला ने समाज व देश का मान बढ़ाया है और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हर क्षेत्र में अपने को स्थापित किया है। इसलिए एकलता को लोकतंत्र, संस्कृति, अर्थ प्रणाली और राजनीति के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए। वह स्वयं में एक पूर्ण इकाई ही तो है।

Author May 17, 2018 4:57 AM
वह अकेली नहीं है अपितु खुद के लिए और दूसरों के लिए भी सामूहिकता का प्रतिनिधत्व करती हैं।

ज्योति सिडाना

एकल होने का अर्थ ‘अकेला’ होना कदापि नहीं है, बल्कि एकल से तात्पर्य ‘एक इकाई’ या ‘एक व्यक्ति’ से है और यह जरूरी नहीं कि वह अकेला है। अनेक बार परिवारों या समूहों में रहने वाले व्यक्ति अधिकांशत: अकेले नजर आते हैं। उनके पास अपनी बातों को साझा करने वालों का अभाव होता है, जरूरत के समय उन्हें अपने आसपास कोई नजर नहीं आता। क्यों? अगर देखा जाए तो वे अकेले ही तो हैं।

यह एक तथ्य है कि अब तक के किसी भी समाज में महिला के अकेले रहने के फैसले को सकारात्मक अर्थ में नहीं लिया जाता। आपके सहकर्मी, रिश्तेदार और परिचित सब एक ही तर्क देते नजर आते हैं कि शादी करना जरूरी है, जीवन में किसी का साथ होना जरूरी है, जीवन में एक समय ऐसा आता है जब आपको खालीपन या अकेलापन नजर आता है, अस्वस्थ होने या वृद्धावस्था में किसी की कमी बहुत खलती है….आदि आदि। ऐसे ढेरों तर्क हैं। पर ‘मैं सिंगल हूं और मैं ऐसे ही खुश हूं’, कुछ लोग इस बात को अच्छी तरह समझते हैं, जबकि कुछ के लिए इस तरह के तर्क अजीब होते हैं। देखा जाए तो कोई भी व्यक्ति कभी अकेला नहीं होता, क्योंकि हम चारों तरफ जीवन से घिरे हैं। हमें यह पता होना चाहिए कि जीवन क्या है? मेरे पास एक जीवन है, एक आशा है और मैंने भय से डरना बंद कर दिया है। मैं बिना किसी चिंता के भविष्य की ओर देखती हूं, क्योंकि मैं जानती हूं कि वर्तमान का लाभ कैसे उठाया जा सकता है, जीवन में खुश कैसे रहा जा सकता है, अपनों से और अपने आप से प्यार कैसे किया जाता है।

इसलिए प्रश्न यह है कि एकल महिला के प्रति समाज में नकार क्यों है, जबकि एकल पुरुष के लिए तो ऐसा नहीं होता। ऐसा होना इस बात का प्रमाण है कि भारत में ‘अदृश्य दमन / प्रतिबंध’ संकुचित और रूढ़िवादी मानसिकता के कारण एक स्वाभाविक प्रक्रिया बन गई है। यह मानसिकता समाजीकरण की प्रक्रिया का सामान्य रूप से और लैंगिक समाजीकरण का विशिष्ट रूप से एक नियमित अपितु प्रभावी उपकरण है। उदाहरण के लिए, जब कोई एकल महिला अपने कार्य क्षेत्र में प्रगति करती है, पुरस्कार अथवा सम्मान अर्जित करती है, सौंपे गए सारे कार्य प्रतिबद्धता के साथ पूरे करती है, तब वह कार्यस्थल पर अनेक बार ‘अदृश्य दमन’ का सामना करती है। लोग सरलता से उसकी सफलता को स्वीकार नहीं कर पाते। उन्हें लगता है कि वह यह सब इसलिए कर पा रही है क्योंकि उसके पास कोई जिम्मेदारी नहीं है, अकेली है, कोई और काम नहीं है, किसी तरह का कोई तनाव या चिंता नहीं है, किसी के प्रति जवाबदेही नहीं है…। यहां तक तो ठीक है। लेकिन हद तो तब होती है जब उसके कार्य क्षेत्र में उसे हरा नहीं पाते या उसकी बराबरी नहीं कर पाते तो उसका मनोबल तोड़ने के लिए उसके चरित्र पर कटाक्ष या टिप्पणी करना शुरू कर देते हैं।

आखिर समाज में यह दोहरापन क्यों है? समाज क्यों किसी को, विशेष रूप से महिला को, अपनी इच्छा से जीवन जीने का हक नहीं देना चाहता? विवाह करना या न करना किसी की भी इच्छा का हिस्सा होना चाहिए। आंकड़े बताते हैं कि एकल महिला का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में व्यापक योगदान है। अधिकांश एकल महिलाओं ने कार्यशील दिवसों में प्रतिबद्धता के साथ अपना योगदान किया है। वे बिना किसी दबाव के अपना कार्य पूरा करती हैं और एकल होने के कारण लगातार इनकी कार्यकुशलता बढ़ती जाती है। दूसरी तरफ जो (महिला और पुरुष दोनों) स्वयं अनुशासनहीन हैं, प्रतिबद्ध नहीं हैं, वे अपनी निराशा और कुंठा इन एकल महिलाओं पर निकालते हैं और उनका चरित्र हनन करने में, उनके व्यक्तित्व पर टीका-टिप्पणी करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। पुरुष सत्ता में उस एकल महिला को कोई स्थान नहीं दिया गया, इसलिए संभवत: वह सबके लिए सबसे आसान निशाना होती हैं। समाज में, कार्यस्थल पर और अन्य स्थानों पर भी एकल महिलाओं के विरुद्ध झूठे किस्से गढ़े जाते हैं जिनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता। इसमें कोई दो राय नहीं कि एकल महिला भावनात्मक तनाव से पृथक रहती है, इसलिए उनमें तार्किकता और यथार्थता अधिक होती है। उनका अपना सांस्कृतिक विश्व भिन्न तरह का है।

अधिकांश लोग काम के प्रति प्रतिबद्धता न रख पाने के लिए परिवार के ढांचे को जिम्मेदार ठहराते हैं। वे हमेशा घर-परिवार, बच्चों, ससुराल या बीमारी का सहारा लेकर कार्यस्थल की जिम्मेदारियों से बचने का प्रयास करते रहते हैं। जबकि एकल महिला के सामने किसी भी प्रकार का भूमिका संघर्ष, तनाव या संकट नहीं होता। लोग सोचते हैं कि एकल होने का मतलब जिम्मेदारी से मुक्त होना है। जबकि सच तो यह है कि उनकी जिम्मेदारियां असीमित होती हैं, क्योंकि उनका दायरा व्यापक होता है। फिर क्यों एकल महिला को एक नागरिक के रूप में मान्यता नहीं है? क्यों महिला को संकीर्ण अस्मिताओं के परे नहीं देखा जाता? हर बार उनकी सफलताओं और प्रगति को संदेहास्पद ढंग से क्यों देखा जाता है? क्यों एकल महिला को अपने अस्तित्व को बनाए रखने और सामाजिक पूर्वाग्रहों से निरंतर संघर्ष करना पड़ता है?

जनगणना के आंकड़ों के अनुसार 2001 से 2011 के बीच भारत में एकल महिलाओं की आबादी में उनतालीस प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यानी भारत में सात करोड़ एकल महिलाएं ऐसी हैं जिन्होंने या तो कभी शादी नहीं की या फिर तलाकशुदा, विधवा का जीवन जी रही हैं या फिर अलग रह रही हैं। यह आंकड़ा हमारी कुल महिला आबादी का लगभग बारह प्रतिशत है। एकल महिलाओं के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे राष्ट्रीय फोरम ने देश के सात राज्यों- केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में व्यापक सर्वेक्षण में यह पाया कि दक्षिण के मुकाबले उत्तर भारत के राज्यों में एकल महिलाओं की स्थिति ज्यादा खराब है।

यह भी एक तथ्य है कि समाज में विवाह को एक प्रतिमान के रूप में देखा जाता है। लड़कियों के लिए तो जैसे एक आयु विशेष पर विवाह करना ही उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य बना दिया जाता है। विवाह कोई कर्तव्य नहीं, बल्कि जिम्मेदारियों के साथ एक ‘प्रतिबद्धता’ है, लोग इस बात को नहीं समझते। इसलिए वर्तमान में विवाह विच्छेद जैसी घटनाओं में वृद्धि देखी जा सकती है। लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि जीवन में विवाह के परे भी बहुत कुछ है। हमारे देश में कितने ही ऐसे उदाहरण हैं जब एकल महिला ने समाज व देश का मान बढ़ाया है और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हर क्षेत्र में अपने को स्थापित किया है। इसलिए एकलता को लोकतंत्र, संस्कृति, अर्थ प्रणाली और राजनीति के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए। वह स्वयं में एक पूर्ण इकाई ही तो है।

वह अकेली नहीं है अपितु खुद के लिए और दूसरों के लिए भी सामूहिकता का प्रतिनिधत्व करती हैं। उदाहरण मौजूद हैं। लता मंगेशकर ने अपना पूरा जीवन निस्वार्थ भाव से संगीत को अर्पित किया, ऐसा संगीत जो हर पीढ़ी के लोगों को तनाव से मुक्ति दिलाता है, प्यार करना सिखाता है। सुष्मिता सेन जिन्होंने अनाथ बच्चियों को गोद लेकर उनकी जिंदगी संवारने के प्रयासों में कोई कमी नहीं रखी, वह उन बच्चों के लिए स्वयं में एक संस्था ही तो हैं। इस तरह की महिलाएं अपनी योग्यताओं और क्षमताओं के कारण ही समाज को दिशा दे रही हैं। इसलिए यह एक तथ्य है कि ‘एकल’ का मतलब सदैव एकाकी नहीं होता, सामूहिकता भी होता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप इस अवधारणा को कैसे लेते हैं।
सवाल यह है कि क्यों पुरुष सत्ता एकल महिला के गुणों और तार्किक विचारों पर प्रहार करती है? क्या पुरुष सत्ता इसलिए भयभीत है कि एकल महिला पुरुषों के दमन और शोषण का विरोध करती है और अस्वीकार करती है? इन सवालों के उत्तर देने से पहले गंभीर अकादमिक चिंतन की आवश्यकता है।

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