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राजस्थान: नदियों की बिगड़ती सेहत और करोड़ों के ‘चंबल रिवर प्रोजेक्ट’ से छवि सुधारने की पहल

हमारे पूर्वज नदियों के संरक्षण के महत्त्व को समझते थे। इसीलिए नदियों को पूज्य माना और ऐसी मान्यताओं को प्रसारित किया गया, जिनसे उन्हें प्रदूषित करते हुए आमजन डरें। मगर विकास के नाम पर हम नदियों को प्रदूषित करते रहे। फिर नदियां कब तक हमें अपना प्रेम लुटा सकेंगी?

water pollution
प्रतीकात्‍मक तस्‍वीर। (फोटो- इंडियन एक्‍सप्रेस)।

अतुल कनक

राजस्थान के कोटा शहर को चंबल नदी का वरदान कहा जा सकता है। इन दिनों कोटा में चंबल के किनारे ‘रिवर फ्रंट’ बन रहा है। जबसे लोगों की जरूरत का पानी नलों के माध्यम से घरों तक पहुंचने लगा है, अधिकांश नदियों के घाटों का आमजन से नाता टूट गया है और नदियों के प्राचीन घाट उपेक्षा के शिकार हो रहे हैं। जिन घाटों के किनारे प्रसिद्ध तीर्थ हैं, वे अवश्य लोगों की जरूरत का हिस्सा बने हुए हैं और इसलिए जिम्मेदार एजंसियां उनके रखरखाव की ओर ध्यान देती हैं। कोटा में चंबल के पुराने घाटों को ऐसा सुख हासिल नहीं था। बहरहाल, करीब डेढ़ हजार करोड़ रुपए की लागत से बन रहे ‘चंबल रिवर प्रोजेक्ट’ ने अब नदी किनारे की रौनक बढ़ा दी है। योजना के मुख्य वास्तुकार ने पिछले दिनों एक पत्रकार वार्ता में कहा कि डाकुओं के कारण चंबल की छवि बहुत खराब हो गई थी, वे इस छवि को सुधारना चाहते हैं। उल्लेखनीय है कि लंबे समय तक चंबल के बीहड़ दुर्दांत डाकुओं की आश्रय स्थली रहे हैं।

महाकवि कालीदास ने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘मेघदूतम्’ में चंबल को ‘रंतिदेवस्य कीर्तिम्’ कहा है

बेशक चंबल के बीहड़ों में दुर्दांत दस्युओं की गतिविधियों ने इस नदी को भय और त्रासदी की अनेक कहानियों से जोड़ा है। एक कवि ने अपनी कविता में कहा भी है- ‘मौत से टकराना इसकी शर्त पुरानी है/ सोच-समझ कर पीना, यह चंबल का पानी है।’ लेकिन चंबल सिर्फ दस्युओं की गतिविधियों का स्मरण नहीं कराती। वह पौराणिक राजा रंतिदेव का भी स्मरण कराती है, जिन्हें प्राचीन वांग्मय में परम दानी और अत्यंत प्रतापी बताया गया है। महाकवि कालीदास ने तो अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘मेघदूतम्’ में चंबल को ‘रंतिदेवस्य कीर्तिम्’ यानी राजा रंतिदेव की कीर्ति कह कर संबोधित किया है।

वांग्मय में चर्मण्यवती यानी चंबल भले राजा रंतिदेव की कीर्ति की वाहक मानी गई हो, लेकिन लोक में तो चंबल डाकुओं की कर्मस्थली होने के लिए ही दुर्दांत है और इसीलिए प्रसिद्ध कवि नरेश मेहता जब अपनी एक कविता में इस बात पर दुख प्रकट करते हैं कि सब नदियों के नाम पर बेटियों के नाम रखे जाते हैं, लेकिन चंबल के नाम पर कोई अपनी बेटी का नाम क्यों नहीं रखता, तो फूलनदेवी से लेकर मोहरसिंह डाकू तक अनेक दस्युओं के किस्से कारण बनकर सामने आ खड़े होते हैं।

नदियों के सहज प्रवाह को तो बांधा, लेकिन अपशिष्ट पदार्थों को प्रवाह नहीं रोका

मगर ऐसा भी नहीं है कि बीहड़ों का रिश्ता नदी के लिए सभी अर्थों में नुकसानदेह रहा हो। चंबल के किनारे के बीहड़ों में दस्युओं की गतिविधियों के कारण बीहड़ वाले इलाकों में कथित तौर पर सभ्य और संभ्रांत कहे जाने वाले समाज की बसावट नहीं हुई और इसका सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि सभ्यता के कथित सोपान बीहड़ वाले इलाकों में नदी के पानी को प्रदूषण की पीड़ा नहीं दे सके। महत्त्वपूर्ण है कि जिन-जिन नदियों के किनारे घनी आबादी की बसावट हुई है, उन नदियों का प्रवाह आज प्रदूषण से उबरने को छटपटा रहा है। एक मान्यता है कि बहता जल कभी अशुद्ध नहीं होता। हमने नदियों के सहज प्रवाह को तो कई स्तरों पर बांध लिया, लेकिन उसमें अपशिष्ट पदार्थों को प्रवाहित करना बंद नहीं किया। यही कारण है कि जिस गंगा नदी के बारे में माना जाता है कि उसका स्पर्श तक मनुष्य के पापों को धो देता है, उसी पवित्र गंगा नदी का पानी कई स्थानों पर इतना प्रदूषित हो गया है कि उन स्थानों पर नदी के पानी का आचमन अनेक बीमारियों का कारक हो सकता है।

शोधकर्ताओं ने पाया है कि गंगा और यमुना के किनारे की कई औद्योगिक इकाइयां उनमें रासायनिक अपशिष्ट मिलाकर पानी को जहरीला कर रही हैं। भारतीय पारंपरिक ज्योतिष की कुछ मान्यताएं कहती हैं कि जो व्यक्ति अपने घर की गंदगी किसी नदी में डालता है, वह मातृऋण का भागी होता है और उसका सारा परिवार इस कारण सुखी नहीं रह पाता। इन मान्यताओं के मूल में कोई और वैज्ञानिक तर्क हो या न हो, लेकिन ये मान्यताएं मनुष्य को नदियों के प्रति संवेदनशील बनाती हैं। बहरहाल, जब पानी में सामान्य गंदगी प्रवाहित करने का फल इतना बुरा माना जा सकता है, तो उन लोगों की पीढ़ियों के दुख के बारे में सोचा जा सकता है जो पानी में जहरीले रसायन मिला रहे हैं। नदियों के प्रवाह में हानिकारक रसायन प्रवाहित करना नहीं रोका गया तो किसी व्यक्ति विशेष की पीढ़ियां नहीं, सारा समाज इसका खमियाजा भुगतेगा।

हमारे यहां नदी जल को पवित्र और शुद्ध माना जाता है

कुछ समय पहले एक रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ था कि कुछ दवा बनाने वाली कंपनियों के कारखानों के अपशिष्ट के कारण और कुछ शहरों में रह रहे लोगों द्वारा अनुपयोगी दवाइयां नदियों में फेंके जाने के कारण कई बड़े शहरों के किनारे स्थित नदी-जल में मधुमेह, रक्तचाप और गर्भ निरोध के काम में आने वाली दवाइयों के तत्त्व पानी में बुरी तरह घुले हुए हैं, जिसका इस्तेमाल किसी स्वस्थ आदमी को भी बीमार कर सकता है। आज भी हमारे यहां नदी जल को पवित्र और शुद्ध माना जाता है और जो लोग आज भी बिना किसी अतिरिक्त शोधन के उस पानी का इस्तेमाल करने को विवश हैं, वे अनजाने में ही वैसे ही हानिकारक रसायनों को उदरस्थ कर रहे हैं जैसे सड़क पर चलता एक पैदल व्यक्ति वाहनों के कारण हवा में घुलने वाले विषैले रासायनिक कणों को अपनी सांस के साथ ग्रहण करने पर विवश होता है। परीक्षण में पता चला है कि नदियों के पानी में मिलने वाला रासायनिक जहर लोगों के फेफड़ों, किडनी और हृदय पर प्रतिकूल असर डालने के साथ-साथ संपूर्ण स्नायु तंत्र को प्रभावित कर एक बड़ी आबादी को कई असाध्य रोग बांट रहा है।

जल जीवन की बुनियादी जरूरत है

बीहड़ों की नकारात्मकता किसी भी नदी की शाश्वत पहचान नहीं हो सकती। मध्यप्रदेश के भिंड, मुरैना जिलों या राजस्थान के धौलपुर जिले के लिए चंबल के बीहड़ भले अपराधियों या समाज के सताए लोगों के आक्रोश को थामे हुए रहे, लेकिन चंबल नदी के लिए बीहड़ों की यह नकारात्मक छवि वरदान बनी रही। जैसे कोरोना काल में पूर्णबंदी के कारण देश की अधिकांश नदियों का पानी बहुत साफ हो गया था और वायुमंडल में प्रदूषण की मात्रा बहुत कम हो गई थी। नदियों ने मानवजाति को दिल खोलकर अपना स्रेह दिया है। संसार की अधिकांश प्राचीन सभ्यताएं किसी न किसी नदी के किनारे या नदी घाटी में विकसित हुई हैं। इसका कारण यह है कि जल जीवन की बुनियादी जरूरत है और मानव सभ्यता की शुरुआत में मनुष्य के पास अपनी आवश्यकता का पारिस्थितिकी तंत्र निर्बाध रूप से सतत पाने का नदियों के अलावा कोई अन्य स्रोत नहीं था। मगर बदले में मानव ने नदियों को क्या दिया।

पंचतंत्र की एक कहानी कहती है कि एक किसान के पास सोने का अंडा देने वाली मुर्गी थी। वह रोज सोने का एक अंडा देती थी। किसान रोज उसे बाजार में बेचता और अपनी जरूरत पूरी करता। किसान के बेटे ने एक दिन सोचा कि यह रोज-रोज अंडे का इंतजार करने से तो अच्छा है कि मुर्गी का पेट चीर कर सारे अंडे एक साथ निकाल लिए जाएं। उसने मुर्गी का पेट चीर दिया। मुर्गी मर गई। अंदर तो कोई खजाना था नहीं। किसान के बेटे के पास पछताने के अलावा कोई चारा नहीं था।

कहीं हम नदियों के साथ भी वैसा ही व्यवहार तो नहीं कर रहे। हमारे पूर्वज नदियों के संरक्षण के महत्त्व को समझते थे। इसीलिए नदियों को पूज्य माना और ऐसी मान्यताओं को प्रसारित किया गया, जिनसे उन्हें प्रदूषित करते हुए आमजन डरें। मगर विकास के नाम पर हम नदियों को प्रदूषित करते रहे। फिर, नदियां कब तक हमें अपना प्रेम लुटा सकेंगी?

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First published on: 04-03-2023 at 05:46 IST
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