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बारिश केरल में होती है, छाता कश्मीर में खुलता है…

अनंतनाग के आतंकी हमले के बाद देश के गृहमंत्री का यह बयान - ‘कश्मीरियत अभी जिंदा है’।

Author July 15, 2017 1:33 AM
कश्मीर में प्रदर्शन (फाइल फोटो)

अनंतनाग के आतंकी हमले के बाद देश के गृहमंत्री का यह बयान – ‘कश्मीरियत अभी जिंदा है’। लेकिन जिस ‘कश्मीरियत’ की आज बात हो रही है क्या वाकई उसे देश का नेतृत्व समझ पा रहा है? अगर हां तो कश्मीर में मौत का यह मंजर क्यों? घाटी के लोगों के बीच अमन की कोशिश में लगे लोगों का कहना है कि कश्मीर को समझने वाले बहुत कम हैं… उनका ऊंचा बौद्धिक स्तर, उनकी अतिसंवेदनशीलता, उनका विद्रोही स्वभाव और इस्लाम के सूफीवाद, बौद्ध और शैव के मिश्रण से बनी कश्मीरियत। इन्हें समझे बगैर कोई समाधान नहीं। लेकिन राजनीतिज्ञों की अपनी वोट बैंक और संकुचित समझ की मजबूरी, सेना का अपना सख्त रवैया और नागरिक समाज का सेमिनारों में हल ढूंढ़ने की कवायद ने सभी को इस मोर्चे पर नाकाम साबित किया है।

सरहद फाउंडेशन के माध्यम से देश के सीमावर्ती प्रांतों में अमन के काम में लगे संजय नाहर कश्मीर के मिजाज और समस्या को समझने के लिए 1947 से कई सदी पहले जड़ों तक जाने की बात करते हैं और कश्मीरी इतिहासकार कल्हण की 12वीं सदी की रचना ‘राजतरंगिणी’ का जिक्र करते हैं। नाहर कहते हैं कि इस महाकाव्य की रचना उस वक्त हुई जब इस्लाम नहीं था, इस्लाम तो लगभग 1350 ई. के करीब रिंचन शाह (कश्मीर के पहले मुसलिम शासक) के समय आया। बकौल नाहर, ‘राजतरंगिणी में एक जगह लिखा है, ‘कश्मीरी महिला मंदिर में जितने उत्साह से नाचेगी, अवसर आने पर उतने ही आवेश में वह राजा के खिलाफ विद्रोह करेगी। तो जो विद्रोह का जज्बा है कश्मीरियों के अंदर, उसे समझने की जरूरत है। उनका यह आक्रोश इसलिए भी है कि घाटी के लोग हमेशा भुक्तभोगी रहे हैं। कश्मीर को अन्य प्रदेशों की तरह नहीं देखा जा सकता और न ही कभी उन्हें सैन्य या पुलिस बल से दबाया जा सकता है’।
कश्मीर समस्या से हर दशक जुड़ते एक नए आयाम और इस क्रम में युवाओं का गुस्सा मुद्दे पर संजय नाहर कहते हैं, ‘कश्मीरी युवा पानी की तरह है, सुबह पत्थर फेकेंगे तो शाम को सेना में भर्ती होने के लिए भी तैयार रहेंगे। छोटी-छोटी बातों को लेकर गुस्सा और छोटी-छोटी बातों को लेकर खुश हो जाते हैं, ऐसे में उनसे प्यार से बातचीत की जाए तो पत्थर फेंकना भूल जाएंगे। लेकिन हमारी सरकारें हमेशा नाकामयाब रही हैं। युवाओं को अलगाववादियों से अलग नहीं समझा, अलगाववादियों को उग्रवादियों से अलग नहीं समझा और उग्रवादियों को आतंकवादियों से अलग नहीं समझा और इस आतंक को दुनिया के अन्य हिस्सों में फैले खौफ के मंजर से अलग नहीं समझ पा रहे हैं’।

बकौल नाहर, ‘1990 के आसपास और उसके बाद जो पीढ़ी घाटी में पैदा हुई उन्होंने कभी सिनेमा हॉल नहीं देखा, कविता नहीं देखी, अच्छे स्कूल-कॉलेज नहीं देखे, चिकित्सा सुविधाएं नहीं देखीं, जो देखा वो था सेना और अर्द्धसैनिक बलों की रोक-टोक। सरकार और नागरिक समाज के पास इन युवाओं के लिए कोई एजंडा नहीं है। 12-19 साल के बच्चों के लिए कोई कार्यक्रम नहीं, ऐसे में उनकी ऊर्जा रोशनी फैलाएगी या आग लगाएगी? कश्मीरियों का बौद्धिक स्तर काफी ऊंचा है। वे उर्दू से ज्यादा अंग्रेजी पढ़ते हैं और दुनिया को जानते हैं, गूगल, वाट्सऐप हैंडल करते हैं, लेकिन आए दिन इंटरनेट बंद कर दिया जाता है। ऐसे में पाकिस्तान इसका फायदा तो उठाएगा ही। उस पर सेना के नेतृत्व का बयान आग में घी का काम करता है। हालांकि, बकौल नाहर कश्मीरियों में पाकिस्तान के खिलाफ भी उतना ही गुस्सा है क्योंकि 1948 में अगर पाकिस्तान हमला नहीं करता तो हालात कुछ और होते। लेकिन, नाहर का कहना है कि कश्मीरी किसी भी हालत में धार्मिक कट्टरपंथ के पक्ष में नहीं हैं।

अमरनाथ जा रहे श्रद्धालुओं पर हमले को विशेषज्ञ एक ऐसी कोशिश मानते हैं जो समुदायों के बीच खाई बनाने और कश्मीर के मुद्दे को मजहबी रंग देने की दिशा में हैं। यह हमला एक प्रतिक्रिया है देश के अन्य हिस्सों में जारी एजंडा विशेष के इर्द-गिर्द ध्रुवीकरण के खिलाफ।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर एसडी मुनी ने कहा, ‘यह आतंकी हमला जान कर किया गया कि यह धार्मिक सुमदाय है, यह दिल्ली को डराने का हमला है। यह उस बात की भी प्रतिक्रिया है कि केंद्र की सरकार हिंदुत्व के एजंडे को आगे बढ़ा रही है, अल्पसंख्यकों पर दबाव बना रही है’। उन्होंने कहा कि यह केंद्र का दबदबा है जिसकी वजह से घाटी की पूरी राजनीति बिगड़ी है। नाहर का भी मानना है कि कश्मीर की घटनाएं देश के अन्य हिस्सों में हिंदुत्व, गोमांस के इर्द-गिर्द घूमती राजनीति की प्रतिध्वनि हैं क्योंकि कश्मीरियों की संवेदनशीलता ऐसी है कि बारिश अगर केरल में हो रही है तो छाता कश्मीर में खुलता है। हालांकि, नाहर ने कहा कि अनंतनाग हमले के खिलाफ घाटी में गुस्सा है, जो एक अच्छा संकेत है।

सेंटर फॉर डायलॉग एंड रिकंसिलेशन की सुशोभा ब्रेव का भी कहना है कश्मीरियों ने इस हमले की कड़ी निंदा की है। उनका मानना है कि अटल बिहारी वाजपेयी के प्रयासों और उसे यूपीए सरकार द्वारा आगे बढ़ाने से घाटी में जो हालात सुधरे थे वह वर्तमान सरकार की किसी स्पष्ट नीति के अभाव में बिगड़ रहे हैं। केंद्र द्वारा भारत-पाकिस्तान और दिल्ली-श्रीनगर के बीच बातचीत और राजनीतिक पहल के अभाव में चरमपंथी ताकतों को बल मिल रहा है और कुछ लोग जाकिर मूसा जैसी ताकतों से प्रभावित हो रहे हैं, लेकिन उनकी संख्या काफी कम है। सुशोभा ने कहा कि 2008 में कश्मीरी बंदूक से पत्थरबाजी पर आए, जो कि तुलनात्मक रूप से विरोध का एक अहिंसात्मक तरीका है और प्रयास कर इन्हें मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है।
संजय नाहर भी कहते हैं कि सेना के खिलाफ 200-400 लोग होते तो बात अलग थी, जब हजारों लोग पत्थर लेकर सड़क पर आ रहे हैं तो समझना होगा कि इस मॉडल से कैसे निपटना है। यह एक नागरिक मुद्दा है जिससे सेना नहीं निपट सकती। कश्मीरियों की बहुत छोटी-छोटी बातें हैं जिन्हें मिलाकर बहुत बड़ा आंदोलन करना होगा। एक सकारात्मक आंदोलन जो सेना और पुलिस का काम नहीं, सेना दुश्मनों से निपटने और पुलिस कानून-व्यवस्था के लिए है।

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