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राजनीतिः सिमटती सिसकती नदियां

नदियां अपने साथ अपने रास्ते की मिट्टी, चट्टानों के टुकड़े और बहुत सारा खनिज बहा कर लाती हैं। पहाड़ों और नदियों के मार्ग पर अंधाधुंध जंगल कटाई, खनन, विस्फोटकों के इस्तेमाल आदि के चलते थोड़ी-सी बारिश में ही बहुत सारा मलबा बह कर नदियों में गिर जाता है। नतीजतन नदियां उथली हो रही हैं, उनके रास्ते बदल रहे हैं और थोड़ा-सा पानी आने पर ही वे बाढ़ का रूप ले लेती हैं।

नदियां अपने साथ अपने रास्ते की मिट्टी, चट्टानों के टुकड़े और बहुत सारा खनिज बहा कर लाती हैं।

पंकज चतुर्वेदी

सावन तो सामान्य ही था, पर भादों जो झमक कर बरसा तो एक-एक बूंद पानी के लिए तरसने वाला देश प्रकृति की इस अनमोल देन को आफत कहने लगा। घर-गांव-बस्ती पानी से लबालब हो गए। सब जानते हैं कि बरसात की ये बूंदें सारे साल के लिए अगर सहेज कर नहीं रखीं, तो सूखे की संभावना बनी रहती है। हर बूंद को सहेजने के लिए हमारे पास छोटी-बड़ी नदियों का जाल है। तपती धरती के लिए बारिश महज ठंडक नहीं लेकर आती, वह समृद्धि, संपन्नता की दस्तक भी होती है। मगर यह भी हमारे लिए चेतावनी है कि अगर बरसात औसत से ज्यादा हो गई, तो हमारी नदियों में इतनी जगह नहीं है कि वे इसके उफान को सहेज पाएं। नतीजतन, बाढ़ और तबाही के मंजर उतने ही भयावह हो सकते हैं, जितने कि पानी के लिए तड़पते बुंदेलखंड या मराठवाड़ा के। सन 2015 की मद्रास की बाढ़ बानगी है कि किस तरह शहर के बीच से बहने वाली नदियों को जब समाज ने उथला बनाया, तो पानी उनके घरों में घुस गया था। बंबई तो हर साल अपनी चार नदियों को लुप्त करने का पाप भोगती है। दूर भारत की बात क्या की जाए, राजधानी दिल्ली में यमुना नदी टनों मलबा उड़ेले जाने के कारण उथली हो गई है। एनजीटी ने दिल्ली मेट्रो सहित कई महकमों को चेताया, इसके बावजूद निर्माण से निकली मिट्टी और मलबे को यमुना नदी में खपाना आम बात हो गई है।

यह सर्वविदित है कि पूरे देश में कूड़ा बढ़ रहा है और कूड़े को खपाने के स्थान सिमट रहे हैं। विडंबना है कि चलती ट्रेन की रसोई के कूड़े से लेकर स्थानीय निकाय भी अपना कूड़ा अपने शहर-गांव की नदियों में ढकेलने से बाज नहीं आ रहे हैं। इसका ही कुप्रभाव है कि नदियां मर रही और उथली हो रही हैं। नदियों के सामने खड़े हो रहे संकट ने मानवता के लिए भी चेतावनी की घंटी बजा दी है। जाहिर है कि बगैर जल के जीवन की कल्पना संभव नहीं। हमारी नदियों के सामने मूल रूप से तीन तरह के संकट हैं- पानी की कमी, मिट्टी का आधिक्य और प्रदूषण।

धरती के तापमान में हो रही बढ़ोतरी के चलते मौसम में बदलाव हो रहा है और इसी का परिणाम है कि या तो बारिश अनियमित हो रही है या फिर बेहद कम। मानसून के तीन महीनों में बमुश्किल चालीस दिन पानी बरसना या फिर एक सप्ताह में ही अंधाधुंध बारिश हो जाना या फिर बेहद कम बरसना, ये सभी परिस्थितियां नदियों के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर रही हैं। बड़ी नदियों में ब्रह्मपुत्र, गंगा, महानदी और ब्राह्मणी के रास्तों में पानी खूब बरसता है और इनमें न्यूनतम बहाव 4.7 लाख घनमीटर प्रति वर्ग किलोमीटर होता है। वहीं कृष्णा, सिंधु, तापी, नर्मदा और गोदावरी का पथ कम वर्षा वाला है, इसलिए इसमें जल बहाव 2.6 लख घनमीटर प्रति वर्ग किमी रहता है। कावेरी, पेन्नार, माही और साबरमती में तो बहाव 0.6 लाख घनमीटर ही रह जाता है। सिंचाई और अन्य कार्यों के लिए अधिक दोहन, बांध आदि के कारण नदियों के प्राकृतिक स्वरूप के साथ छेड़छाड़ हुई और इसके चलते नदियों में पानी कम हो रहा है। भारतीय नदियों के मार्ग से हर साल 1645 घन किलोलीटर पानी बहता है, जो सारी दुनिया की कुल नदियों का 4.44 प्रतिशत है। आंकड़ों के आधार पर हम पानी के मामले में पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा समृद्ध हैं, लेकिन चिंता का विषय यह है कि पूरे पानी का कोई पचासी फीसद बारिश के तीन महीनों में समुद्र में बह जाता है और नदियां सूखी रह जाती हैं।

नदियां अपने साथ अपने रास्ते की मिट्टी, चट्टानों के टुकड़े और बहुत सारा खनिज बहा कर लाती हैं। पहाड़ों और नदियों के मार्ग पर अंधाधुंध जंगल कटाई, खनन, विस्फोटकों के इस्तेमाल आदि के चलते थोड़ी-सी बारिश में ही बहुत सारा मलबा बह कर नदियों में गिर जाता है। नतीजतन नदियां उथली हो रही हैं, उनके रास्ते बदल रहे हैं और थोड़ा-सा पानी आने पर ही वे बाढ़ का रूप ले लेती हैं। यह भी खतरनाक है कि सरकार और समाज इंतजार करता है कि नदी सूखे और वह उसकी छोड़ी हुई जमीन पर कब्जा कर ले। इससे नदियों के पाट संकरे हो रहे हैं, उनके करीब बसावट बढ़ने से प्रदूषण बढ़ रहा है। कल-कारखानों का कचरा, घरों की गंदगी, खेतों की रायायनिक दवा और खादों का हिस्सा, भूमि कटाव, और भी कई ऐसे कारक हैं, जो नदी के जल को जहर बना रहे हैं। अनुमान है कि जितने जल का उपयोग किया जाता है, उसके मात्र बीस प्रतिशत की खपत होती है, शेष अस्सी फीसद पानी कचरा समेटे बाहर आ जाता है। भले हम कारखानों को दोषी ठहराएं, लेकिन नदियों की गंदगी का तीन-चैथाई हिस्सा घरेलू मल-जल ही है।

आज देश की सत्तर फीसद नदियां प्रदूषित और मरने के कगार पर हैं। इनमें गुजरात की अमलाखेड़ी, साबरमती और खारी, हरियाणा की मारकंडा, मप्र की खान, उप्र की काली और हिंडन, आंध्र की मुंसी, दिल्ली की यमुना और महाराष्ट्र की भीमा मिलाकर दस नदियां सबसे ज्यादा प्रदूषित हैं। हालत यह है कि देश की सत्ताईस नदियां नदी के मानक पर खरे नहीं उतरती हैं। वैसे गंगा हो या यमुना, गोमती, नर्मदा, ताप्ती, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी, ब्रह्मपुत्र, झेलम, सतलुज, चिनाब, रावी, व्यास, पार्वती, हरदा, कोसी, गंडगोला, मसैहा, वरुणा हो या बेतवा, ढौंक, डेकन, डागरा, रमजान, दामोदर, सुवर्णरेखा, सरयू हो या रामगंगा, गौला हो या सरसिया, पुनपुन, बूढ़ी गंडक हो या गंडक, कमला हो या फिर सोन, भगीरथी या इसकी सहायक, कमोबेश सभी प्रदूषित हैं और अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही हैं। दरअसल, पिछले पचास बरसों में अनियंत्रित विकास और औद्योगीकरण के कारण प्रकृति के तरल स्नेह को संसाधन के रूप में देखा जाने लगा, श्रद्धा-भावना का लोप हुआ और उपभोग की वृत्ति बढ़ती चली गई। चूंकि नदी से जंगल, पहाड़, किनारे, वन्य जीव, पक्षी और जन जीवन गहरे तक जुड़ा है, इसलिए जब नदी पर संकट आया, तब उससे जुड़े सजीव-निर्जीव सभी प्रभावित हुए बिना नहीं रहे।

जान कर आश्चर्य होगा कि नदियों की मुक्ति का एक कानून पिछले चौंसठ सालों से किसी लाल बस्ते में बंद है। संसद ने सन 1956 में रिवर बोर्ड एक्ट पारित किया था। इस कानून की धारा चार में प्रावधान है कि केंद्र सरकार एक से अधिक राज्यों में बहने वाली नदियों के लिए राज्यों से परामर्श कर बोर्ड बना सकती है। इस बोर्ड के पास बेहद ताकतवर कानून का प्रावधान है, जैसे कि जलापूर्ति, प्रदूषण रोकने आदि के लिए स्वयं दिशा-निर्देश तैयार करना, नदियों के किनारे हरियाली, बेसिन निर्माण और योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी आदि करना।

नदियों के संरक्षण का इतना बड़ा कानून उपलब्ध है, लेकिन आज तक किसी भी नदी के लिए रिवर बोर्ड बनाया ही नहीं गया। संविधान के कार्यों की समीक्षा के लिए गठित वेंकटचलैया आयोग ने तो अपनी रिपोर्ट में इसे एक ‘मृत कानून’ करार दिया था। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने भी कई विकसित देशों का उदाहरण देते हुए इस अधिनियम को गंभीरता से लागू करने की सिफारिश की थी। यह बानगी है कि हमारा समाज अपनी नदियों के अस्तित्व के प्रति कितना लापरवाह है।
दुर्भाग्य है कि विभिन्न कारणों से नदियों के उथला होने, उनकी जल-ग्रहण क्षमता कम होने और प्रदूषण बढ़ने से सामान्य बरसात का पानी भी उसमें समा नहीं रहा है और जो पानी जीवनदायी है, वह आम लोगों के लिए त्रासदी बन रहा है।

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