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बेबाक बोलः राहुल की राह

गुजरात विधानसभा के चुनाव 2019 के आम चुनाव को ध्यान में रख कर लड़े गए। राजनीतिक विश्लेषक दावा करते रहे कि इस चुनाव के नतीजे भाजपा को आईना दिखाने वाले होंगे। कांग्रेस ने वहां अपनी सारी ताकत झोंक दी। राहुल गांधी अपने नए अवतार में उभर कर आए। नोटबंदी और जीएसटी की खामियों को तो मुद्दा बनाया ही गया, जाति और वर्ग के समीकरण भी खूब ध्यान से बनाए और हल किए गए। निस्संदेह वहां भाजपा के लिए रास्ता आसान नहीं लग रहा था, पर कांग्रेस को ऐसा कुछ हासिल नहीं हुआ, जिससे केंद्र का उसका रास्ता कुछ आसान हो सके। अब राहुल गांधी पार्टी की कमान संभाल चुके हैं, पर उनका प्रभाव देश के परिदृश्य पर कितना और कैसा पड़ा है, यह वक्त बताएगा। पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पार्टी में जान फूंकने और राजनीतिक ताकत अर्जित करने के लिए उन्हें अभी बहुत कुछ करना है। 2019 के चुनाव में राहुल को किन चुनौतियों से पार पाना होगा इसी पर इस बार का बेबाक बोल।
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जजों के प्रेस कांफ्रेंस के बाद आने आवास पर पार्टी नेताओं की बैठक बुलाई थी (फाइल फोटो)

गुजरात विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व, उसके चुनाव प्रबंधन और कामयाबी को लेकर भरपूर विश्लेषण किया जा चुका है। पर इन सबके बीच कांग्रेस और उसको मिले जन के आदेश या संदेश का जिक्र न के बराबर ही रहा। माना जा रहा है कि यह चुनाव परिणाम भाजपा के लिए खतरे की घंटी है, तो कांग्रेस के लिए उज्ज्वल भविष्य की झलक। मगर अब जबकि परिणाम के बाद गूंजती ढोल-मजीरों की आवाज मद्धिम पड़ चुकी है, तो इन नतीजों के कांग्रेस पर असर की बात भी हो जाए। यह सच है कि इस चुनाव में कांग्रेस ने देश के राजनीतिक परिदृश्य में शानदार वापसी की है। उसने गुजरात में 1985 से अब तक का बेहतरीन प्रदर्शन किया है, जबकि यह चुनाव देश और प्रदेश में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बना हुआ था। दोनों ही प्रमुख दल साम, दाम, दंड, भेद का इस्तेमाल करते हुए प्रचार कर रहे थे।

पर अब बड़ा प्रश्न यह है कि क्या कांग्रेस के लिए इतना काफी है? शायद नहीं। क्योंकि गुजरात में दोनों ही पार्टियों की एक दर्जन से ज्यादा सीटें ऐसी हैं, जो बहुत कम मतों के अंतर से जीती गई हैं। लिहाजा अगर किसी तरह यह अंतर काम भी आ जाता, तो दोनों की स्थिति पर खास फर्क नहीं पड़ता। यानी जीत भारतीय जनता पार्टी की ही होती। ज्यादातर चुनाव विश्लेषक इस जीत-हार में 2019 की सूरत तलाश रहे हैं। लेकिन यहां भी पेच है। जब बात पूरे देश की आएगी, तो कांग्रेस को वही स्थितियां भुनाने को नहीं मिलेंगी, जो गुजरात में मिली हुई थीं। गुजरात में भाजपा बाईस वर्षों से सत्तासीन थी, इसलिए उससे लोगों में जो कुछ नाराजगी थी, कांग्रेस को उसका लाभ मिलना था। पर वही स्थिति देश के स्तर पर नहीं है। क्योंकि केंद्र में सरकार के अभी साढेÞ तीन वर्ष हुए हैं।

इतना ही नहीं, इन साढ़े तीन वर्षों में नोटबंदी और जीएसटी जैसे विवादास्पद फैसलों के बावजूद कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी की लोकप्रियता पर कोई खास चोट कर पाने में विफल रही है। गुजरात का परिणाम इसका ज्वलंत उदाहरण है। चुनाव सर्वेक्षण जो भी कहते हों, पर सच यह है कि गुजरात जाकर आए ज्यादातर वरिष्ठ पत्रकारों और चुनावी पंडितों का यही आकलन था कि वहां भाजपा को कड़ी टक्कर का सामना करना पड़ रहा है और नतीजे हैरान कर देने वाले हो सकते हैं, लेकिन ऐसा हुआ नहीं और ऐसा न होने की सूरत में सबने ‘जो जीता वही सिकंदर’ की तर्ज पर बात करनी शुरू कर दी। माना जा रहा था कि जीएसटी की सबसे ज्यादा मार सूरत में पड़ी है, लेकिन वहां भाजपा को भरपूर समर्थन मिला। यानी यह आशंका निर्मूल साबित हुई कि शहरों में जीएसटी ने भाजपा की कमर तोड़ दी है। कम से कम गुजरात के चुनाव यह आभास नहीं दे रहे। ऐसे में यह कयास लगाना बेजा नहीं कि देश के स्तर पर भी व्यापारी वर्ग में जिस नाराजगी की बात की जा रही है, वह आम चुनाव में सही न निकले।

कांग्रेस, जो इस समय अपने सबसे कमजोर दौर से गुजर रही है, गुजरात में अपनी ताकत चार गुना बढ़ाने के बाद भी सत्ता से दूर रही। ध्यान रहे, गुजरात में कांग्रेस को पाटीदार नेता हार्दिक पटेल और दो अन्य युवा नेताओं- जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर का समर्थन भी मिला। भाजपा को प्रदेश में ज्यादा चोट ग्रामीण इलाकों में झेलनी पड़ी और पटेल, अल्पेश और जिग्नेश के प्रचार का बड़ा केंद्र शहरी इलाके ही थे। आधुनिक सोशल मीडिया के जिन संसाधनों का ये युवा इस्तेमाल कर रहे थे उनकी पहुंच गांवों तक इतनी नहीं है। यहां कांग्रेस को अपेक्षित लाभ मिला। लेकिन यहीं से भाजपा के लिए भी यह सबक मिला है कि आइंदा उसके प्रचार का पूरा झुकाव ग्रामीण इलाकों में होने जा रहा है। ये तीनों नेता, जो कांग्रेस के साथ हुए, बिल्कुल स्थानीय हैं। और 2019 में जब कांग्रेस देश की सत्ता के लिए मैदान में उतरेगी, तब वह इन नामों के प्रभाव का कोई इस्तेमाल नहीं कर पाएगी। राष्ट्रीय स्तर पर पिछड़ों और दलितों के वोट बटोरने के लिए और बहुत से दल आगे बढ़ आते हैं। ऐसे में कांग्रेस पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा क्या नया समीकरण बना पाती है, जिससे भाजपा और दूसरे दलों के वोट बैंक में सेंध लगा पाए, यह देखना होगा।

राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व में बदलाव होने के बाद दावा किया जा रहा है कि कांग्रेस में नया जोश आएगा। पर इसका पार्टी को कितना लाभ मिलेगा, यह वक्त बताएगा। जबकि भाजपा में ऐसी स्थिति नहीं है। आलम यह है कि गुजरात में मतदाताओं पर पार्टी के सीधे प्रभाव के चलते ही वहां पार्टी की जीत संभव हो सकी। राष्ट्रीय स्तर पर लोग सरकार की कुछ नीतियों से असहमत होने के बावजूद चट्टान की तरह उसके साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। लोगों को सरकार से शिकायत हो सकती है, पर यह वोटों पर परिलक्षित नहीं हो रही है। और यह जगजाहिर है कि 2019 का चुनाव भारतीय जनता पार्टी प्रधानमंत्री की अगुआई में ही लड़ेगी। ऐसे में यह दावा करना मश्किल है कि राहुल गांधी देश के स्तर पर भी अपने प्रतिद्वंद्वी को वैसी ही टक्कर दे पाएंगे, जैसी गुजरात में दी थी।

2014 का चुनाव भी, जिसमें कांग्रेस के सत्तर साल के शासन की चूलें हिला कर भाजपा सत्ता पर काबिज हुई, राहुल गांधी के नेतृत्व में लड़ा गया था। हालांकि तब संगठन के शीर्ष पर उनकी मां सोनिया गांधी थीं, लेकिन इस बार सारा दारोमदार उन पर होगा। देखना यह होगा कि क्या राहुल गांधी इस चुनौती के लिए तैयार हैं। इसके लिए उन्हें चुनाव या राजनीतिक विश्लेषकों की टिप्पणियों में नतीजे तलाशने के बजाय हर जगह आम जनता की नजरों में झांकना होगा, उनकी इच्छाओं, आकांक्षाओं और जरूरतों को जानना-समझना होगा। तभी कांग्रेस को कुछ राजनीतिक नतीजे हासिल हो पाने की संभावना बनेगी, वरना दस-बीस सीटें आगे-पीछे होकर ही अपनी पीठ खुद थपथपानी या धूल चाटनी पड़ेगी। यह सच है कि राहुल गांधी के आम जनता के सामने आने के अंदाज में फर्क आया है। उनकी संवाद-शैली भी पहले से बेहतर हुई है। सोशल मीडिया पर भी वे ‘गब्बर सिंह’ का अवतार ढूंढ़ लाए हैं। लेकिन चुनाव और उसके परिणाम उससे कहीं आगे बढ़ कर होते हैं।

कांग्रेस के अब तक के प्रचार-प्रसार और चुनावी तैयारियों को देखें तो वह कहीं से भाजपा के मुकाबले की नहीं ठहरतीं। वह देश के राजनीतिक फलक पर जनता और उससे जुड़ी समस्याओं का कोई सार्थक आख्यान रचने में विफल रही है। कांग्रेस अगर चाहती है कि वह देश में, कम से कम मजबूत विपक्ष की तरह ही, उभर कर आए, तो उसे नारों से आगे निकलना होगा। नारों से हो-हल्ला तो हो सकता है, पर कोई सार्थक नतीजा नहीं निकल सकता। देश की समस्याओं को उछाल देने से लोगों का शोर-शराबा तो हासिल हो सकता है, लेकिन उनके वोट नहीं। पार्टी के नीतिकारों को कुछ ठोस करना होगा। महज नारेबाजी या मुद्दों की आतिशबाजी चलाने से अस्थायी लाभ तो निश्चित हैं, लेकिन उसका कोई स्थायी नतीजा हासिल होने वाला नहीं है।

उसके लिए जरूरी है कि पार्टी महज समस्याएं नहीं, उनका समाधान भी पेश करे। वरना समस्याओं और उनके लिए मौके की सरकार को दोषी ठहरा कर कुछ नहीं होने वाला। राजनीति और उसका हासिल ट्विटर पर चुटीले संवादों से आगे निकल कर ही हासिल किया जा सकता है। अभी तक के हालात में पार्टी की स्थिति में जो रुझान दिखाई दे रहा है उसको आगे ले जाने की जरूरत है और यह तभी संभव है जब पार्टी अपनी नीति और नेतृत्व दोनों पर कुछ ध्यान दे। देश में इस समय महज पांच राज्यों में कांग्रेस की सरकार है। अगर पार्टी कुछ अपेक्षित परिवर्तन करने में नाकाम रही तो कहीं ऐसा न हो कि कर्नाटक खो जाने की सूरत में उसके पास बस एक ही बड़ा राज्य रह जाए- पंजाब। लोग विश्लेषकों की वह राय अभी भूले नहीं हैं, जब पंजाब की जीत का श्रेय भी कैप्टन अमरिंदर सिंह को ही दिया गया, पार्टी के आला कमान को नहीं।

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