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राजनीतिः महामारी से जंग

वैज्ञानिकों का मानना है कि कोरोना के टीके को बाजार में उतारने के काम में कम से कम छह महीने से लेकर एक साल का समय लग सकता है। जाहिर है, वर्ष 2021 से पहले दुनिया को कोरोना का टीका नहीं मिल सकेगी। किसी बीमारी की रोकथाम और बचाव के लिए उसका टीका बनाने में लंबा वक्त, भारी पूंजी और मेहनत लगती है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि कोरोना के टीके को बाजार में उतारने के काम में कम से कम छह महीने से लेकर एक साल का समय लग सकता है।

अभिषेक कुमार सिंह

इंसान ने जब से चिकित्सा विज्ञान के बल पर बीमारियों के इलाज का एक निजाम बनाया था, तभी से माना जाने लगा था कि कोई रोग अब उसे भयभीत नहीं कर सकेगा और दवाओं-इलाज की मदद से असमय मौत को टाला जा सकेगा। कई मामलों में ऐसा हुआ भी है। बीमारियों का समय रहते पता लगा कर, दवाओं और शल्य क्रिया के बल पर बुखार से लेकर कैंसर और दिल-किडनी तक की कई समस्याओं को इंसान ने अपने काबू में कर लिया है। लेकिन इन्हीं के बीच कोरोना जैसे वायरसों ने साबित किया है कि इलाज के चाहे कितने माकूल इंतजाम कर लिए गए हों, पृथ्वी पर मानव सभ्यता के लिए चुनौतियां शायद कभी खत्म नहीं होंगी। कोरोना से जुड़ी सबसे बड़ी चुनौती फिलहाल यह सामने आई है कि दुनिया के पास इससे लड़ने की कोई कारगर दवा और खासकर वैसा कोई टीका (वैक्सीन) नहीं है, जैसे फ्लू, हैजा, चेचक और पोलियो तक के लिए उपलब्ध हैं। अगर ऐसा कोई टीका हमारे पास होता, तो यह बात बेहिचक कही जा सकती थी कि कोरोना संकट को चुटकियों में हल कर लिया जाएगा और दुनिया आज जिस तरह इससे आतंकित है, उसकी नौबत शायद नहीं आती।

चीन के वुहान शहर से बीते साल दिसंबर में फैलना शुरू हुआ कोरोना वायरस (कोविड-19) अब दुनिया के अस्सी से ज्यादा देशों को चपेट में ले चुका है। चीन में जहां इसके असर से तीन हजार से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं और दुनिया में करीब एक लाख लोग इससे संक्रमित बताए जा रहे हैं, वहीं भारत में अब तक इसके तीस से ज्यादा मामलों की तस्दीक हो चुकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ)भी कोरोना को लेकर स्वास्थ्य आपातकाल घोषित कर चुका है। इस आपातकाल के तहत भारत सहित कई देशों में हवाई अड्डों, बंदरगाहों पर बाहर से आने वाले व्यक्तियों में संक्रमण की जांच को अनिवार्य कर दिया गया है और कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित चीन के हर तरह के दौरों को रोक दिया गया है। ऐसे उपायों को देखें तो कह सकते हैं कि पूरी दुनिया कोरोना की रोकथाम के लिए चाक-चौबंद हो चुकी है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कोरोना का इलाज क्या है। इस बारे में सच्चाई यह है कि फिलहाल दुनिया के स्वास्थ्य तंत्र के पास कोरोना से निपटने की कोई सटीक दवा या टीका उपलब्ध नहीं है। ऐसे में कोरोना के मरीजों का इलाज उनमें दिखने वाले लक्षणों के आधार पर किया जा रहा है, संक्रमित लोगों को अस्पतालों में अलग कमरों में रखा जा रहा है और बुखार व दर्द की दवाएं देकर ये लक्षण कम करते हुए उम्मीद की जा रही है कि वक्त के साथ तापमान बढ़ने से कोरोना का असर कम हो जाएगा और मरीज स्वस्थ हो सकेंगे। उम्मीद है कि ये उपाय कारगर होंगे और कोरोना का खौफ कुछ कम हो सकेगा। इसे मानने से इनकार नहीं है कि जिस प्रकार दुनिया में साधारण सर्दी-जुकाम के खिलाफ वैक्सीन मौजूद हैं, उसी तरह यदि कोरोना वायरस के हमले की धार कम करने वाले टीके उपलब्ध होते तो आज हालात विकट नहीं होते। टीका लगाने के पीछे मूल मकसद यही है कि किसी व्यक्ति या जीव में वांछित बीमारी के बिना ही उसके शरीर में ऐसे जीवाणु विकसित कर दिए जाएं जो उसकी प्रतिरक्षा प्रणाली को इस तरह उत्तेजित कर दे, ताकि शरीर में उस बीमारी के खिलाफ ताकत पैदा हो जाए। चेचक की बीमारी के खात्मे के पीछे ऐसे ही टीकाकरण की अहम भूमिका रही थी। अब तो कई ऐसी संक्रामक बीमारियां हैं, जिनमें इंजेक्शन या मुंह से दी जाने वाली दवा यानी टीका बेहद आम हो गया है। इन टीकों की उपयोगिता यह है कि इन्हें लगाने के बाद कोई व्यक्ति या तो जीवन भर या फिर एक निश्चित समयसीमा तक संबंधित बीमारी के असर से सुरक्षित हो जाता है।

एक दौर था जब दुनिया टीकों के बारे में नहीं जानती थी। चेचक, प्लेग, फ्लू और पोलियो जैसी बीमारियों ने दुनिया में कहर बरपा रखा था। लेकिन जब फ्रांस के एक जीव विज्ञानी लुई पाश्चर ने हैजे का टीकातैयार किया, तो दुनिया को बीमारियों की रोकथाम का एक रास्ता मिल गया। पाश्चर ने मुर्गियों को होने वाले हैजे के अलावा एंथ्रेक्स और रेबीज आदि के टीके भी विकसित किए थे। पाश्चर के दिखाए रास्ते पर ही विश्व में टीकाकरण अभियानों की शुरुआत हुई थी। लुई पाश्चर के बाद एक उल्लेखनीय काम एडवर्ड जेनर ने किया था, जिन्होंने चेचक के टीके का विकास किया था। एडवर्ड जेनर ने चेचक के टीके पर एक शोध पत्र लिखा था, जिससे असल में वैक्सीन या टीका शब्द दुनिया में प्रचलित हुआ। जहां तक पोलियो के टीके का सवाल है, तो यह पिछली सदी के छठे दशक में सामने आया था। अमेरिका के पिट्सबर्ग विश्वविद्यालय में वैज्ञानिक जोनास सॉल्क ने 1952 में पहले प्रभावी पोलियो टीके के विकास का दावा किया था। इस घोषणा के साल भर बाद मार्च, 1953 को उन्होंने अमेरिकी रेडियो- सीबीएस पर एलान किया कि एक साल की अवधि में उन्होंने पोलियो के टीके का बच्चों पर परीक्षण किया है और कारगर पाया है। यह टीका पोलियो के तीनों प्रकार (टाइप-1, 2 और 3) पर असरदार पाई गई थी। वर्ष 1954 में तत्कालीन अमेरिका के चवालीस राज्यों के अठारह लाख बच्चों पर पोलियो के टीके का परीक्षण किया गया और इसके नतीजे 12 अप्रैल, 1955 को घोषित किए गए। इन नतीजों के आधार पर सॉल्क टीके को 1955 में लाइसेंस (पेटेंट) दिया गया और अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों में पोलियो टीकाकरण अभियान शुरू कर दिया गया। भारत में पोलियो टीकाकरण अभियान की सक्रिय शुरुआत काफी बाद में वर्ष 1995 से हुई थी।

किसी भी संक्रमण का टीका बनाने की शुरुआत उस वायरस के जेनेटिक कोड का पता लगाने से होती है। जेनेटिक कोड बताता है कि इस बीमारी का उद्भव क्या है, किन हालात में यह संक्रमण बढ़ सकता है और जीवित रख सकता है और इसका खात्मा कैसे मुमकिन है। इस बारे संतोष की बात यह है कि इस साल दस जनवरी को चीन ने कोरोना वायरस का जेनेटिक कोड दुनिया के साथ साझा कर दिया है। जेनेटिक कोड साझा करने का अभिप्राय यह है कि इसके तहत वायरस का आनुवंशिक क्रम बताया गया है जिससे वायरस में आने वाले बदलावों और इसके उस व्यवहार व तरीकों का अंदाजा लगता है जो इसे एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति और एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य में फैलने की ताकत देता है। इससे यह जानकारी भी मिलती है कि यह वायरस तेजी से फैलेगा या धीमी गति से। वैज्ञानिक इस कोशिश में हैं कि सोलह हफ्तों के भीतर कोरोना वैक्सीन का परीक्षण शुरू कर दिया जाए, ताकि यह टीका जल्द से जल्द प्रभावित देशों में पहुंचाया जा सके।

वैज्ञानिकों का मानना है कि कोरोना के टीके को बाजार में उतारने के काम में कम से कम छह महीने से लेकर एक साल का समय लग सकता है। जाहिर है, वर्ष 2021 से पहले दुनिया को कोरोना का टीका नहीं मिल सकेगी। किसी बीमारी की रोकथाम और बचाव के लिए उसका टीका बनाने में लंबा वक्त, भारी पूंजी और मेहनत लगती है। अगर कोरोना वायरस का टीका बना भी लिया गया तो यह उम्रदराज लोगों की कोई ज्यादा मदद नहीं कर पाएगा। लेकिन इसकी वजह टीका नहीं, बल्कि बुजुर्गों की रोग प्रतिरोधक क्षमता है। अधिक आयु होने से व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम होती जाती है। ऐसे में दवाएं और टीके ज्यादा कारगर नहीं रहते हैं।

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