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गर्भपात कानून से उठे सवाल

समानता, स्वतंत्रता और स्वायत्तता सर्वांगीण विकास के महत्त्वपूर्ण तत्व हैं।

यदि अमेरिका में मौजूदा प्रवृत्ति बनी रहती है तो सुरक्षित और कानूनी सेवाओं तक पहुंच न रखने वाली महिलाओं के लिए अवैध गर्भपात अंतिम विकल्प होगा और ऐसे गर्भपात के भयानक परिणाम होंगे। कुछ लोगों के लिए यह मृत्यु और गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं का एक प्रमुख कारण बन जाएगा।

समानता, स्वतंत्रता और स्वायत्तता सर्वांगीण विकास के महत्त्वपूर्ण तत्व हैं। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य यह है कि विश्व के अधिकांश हिस्सों में इस पर पितृसत्तात्मक व्यवस्था का एकाधिकार है। अमूमन यह माना जाता है कि विकसित राष्ट्र न केवल सहिष्णु दृष्टिकोण रखते हैं, अपितु आधी आबादी के अधिकारों के संरक्षण के प्रति भी संवेदनशील रहते हैं। पर इतिहास के पन्नों को पलटते हुए वर्तमान पृष्ठ भी इस तथ्य को नकार देते हैं। इसका जीवंत उदाहरण विश्व की महाशक्ति होने का दावा करने वाला संयुक्त राज्य अमेरिका है जहां के सुप्रीम कोर्ट ने बीते दिनों अपने एक फैसले में गर्भपात को कानूनी तौर पर स्वीकृति देने वाले पांच दशक पुराने निर्णय को पलट दिया।

उल्लेखनीय है कि 1971 में गर्भपात करवाने में असफल रही एक महिला की ओर से अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी। इस मुकदमे को ‘रो बनाम वेड’ नाम से जाना जाता है। इस याचिका में गर्भपात की सुविधा तक आसान पहुंच की गुहार लगाई गई थी और कहा गया था कि गर्भधारण और गर्भपात का निर्णय महिला का क्षेत्राधिकार होना चाहिए, न कि सरकार का। अंतत: 1973 में महिलाओं को गर्भपात का कानूनी अधिकार मिला। लेकिन यह फैसला कट्टरपंथियों को नागवार गुजरा। इस मुद्दे पर डेमोक्रेटिक पार्टी और रिपब्लिकन पार्टी के विचार अलग-अलग थे। वर्ष 1980 तक यह मुद्दा ध्रुवीकरण का कारण बनने लगा और अंततोगत्वा रिपब्लिकन पार्टी और चर्च की विचारधारा की जीत हुई, जो वास्तविकता में आधी आबादी की सबसे बड़ी हार है।

परंतु जितना चौंकाने वाला यह फैसला है, उतनी मजबूत रूढ़िवादी पृष्ठभूमि अमेरिका की रही है। 1979 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने ‘कन्वेंशन आन द एलिमिनेशन आफ द आल फार्म्स आफ डिस्क्रिमेशन अगेंस्ट विमेन’ (सीईडीएडब्ल्यू) नामक दस्तावेज प्रस्तावित किया था, जो दुनिया भर में महिलाओं के अधिकारों और उनके मुद्दों पर केंद्रित था। यह महिलाओं के अधिकार का अंतरराष्ट्रीय बिल और एजेंडा दोनों था। संयुक्त राष्ट्र के एक सौ चौरानवे सदस्य देशों में से एक सौ सत्तासी देशों ने इस संधि को स्वीकार किया, लेकिन सूडान, सोमालिया, ईरान के साथ-साथ अमेरिका ने संधि की पुष्टि नहीं की। कारण चाहे जो भी हो ‘महिला समानता’ के प्रस्ताव पर टालमटोल रवैया भीतर बैठी असमानता की जड़ों के तुष्टीकरण को उजागर करता है।

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से वहां की लाखों महिलाओं की स्वायत्तता छिन गई है, विशेष रूप से उन महिलाओं की जिनकी आय कम हैं और जो नस्लीय व जातीय अल्पसंख्यक समुदायों से संबंध रखती हैं। यह स्थिति उनके बुनियादी अधिकारों के भी विरुद्ध है। उल्लेखनीय है कि अमेरिका में गर्भपात एक नियमित और सुरक्षित स्वास्थ्य देखभाल प्रक्रिया रही है और इसका उपयोग हर चार में से एक महिला करती है। साल 2021 में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक अस्सी फीसद अमेरिकियों ने सभी या ज्यादातर मामलों में गर्भपात का समर्थन किया था। पैन अमेरिकन हैल्थ आर्गनाइजेशन (पीएएचओ) ने वर्ष 2006 में यह स्वीकारा था कि ‘चिकित्सकीय गर्भपात तक पहुंच एक सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत सिद्धांत है, जो सांस्कृतिक मतभेदों, धार्मिक पंथों और राजनीतिक विचारधाराओं से ऊपर है।’

गर्भपात पर कानूनी रोक लगाने के पीछे महत्त्वपूर्ण तर्क ‘जीव हत्या’ के विरुद्ध खड़ा होना है। लेकिन इसे विद्रूपता नहीं तो और क्या कहा जाए। जो अजन्मा है उसके जीवन के संरक्षण के लिए जो जीवित है, उसे मौत के मुंह तक पहुंचा देना। इसमें किंचित भी संदेह नहीं कि कोई भी महिला बिना किसी कारण के गर्भपात का फैसला नहीं करती। कारणों की चर्चा से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण यह जानना है कि गर्भपात पर कानूनी रोक गर्भपात के चिकित्सकीय दरवाजों को तो अवश्य बंद कर सकती है, परंतु अवैध रूप से हो रहे गर्भपात को रोकना आसान नहीं होगा।

अलबत्ता यह महिलाओं के जीवन के लिए बेहद खतरनाक साबित होगा। इस तथ्य पर मोहर लगाते हुए हावर्ड की प्रोफेसर और महिला और सार्वजनिक स्वास्थ्य पहल की समन्वयक एना लैंगर कहती हैं कि यदि अमेरिका में मौजूदा प्रवृत्ति बनी रहती है तो सुरक्षित और कानूनी सेवाओं तक पहुंच न रखने वाली महिलाओं के लिए अवैध गर्भपात अंतिम विकल्प होगा और ऐसे गर्भपात के भयानक परिणाम होंगे। कुछ लोगों के लिए यह मृत्यु और गंभीर स्वास्थ्य जटिलताओं का एक प्रमुख कारण बन जाएगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन और संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर के कुल गर्भपातों में से पैंतालीस फीसद असुरक्षित होते हैं और इन प्रक्रियाओं को अपनाने वाली महिलाओं की मौत की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती है। संयुक्त राष्ट्र एजंसियों के मुताबिक जैसे-जैसे राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सरकारों द्वारा प्रतिबंध बढ़ाए जाएंगे, और ज्यादा महिलाओं की मौत होगी। अवांछित गर्भावस्था का महिलाओं के जीवन पर के प्रभाव विषय अध्ययन भी इस विषय पर रोशनी डालता है। यह अध्ययन एक हजार गर्भवती महिलाओं पर निरंतर पांच वर्षों तक किया गया था। इस अध्ययन में स्पष्ट रूप से यह तथ्य सामने आया कि गर्भपात से वंचित होने से वित्तीय स्वास्थ्य और पारिवारिक परिणाम खराब होते हैं।

ऐसे ही अन्य कई अध्ययन यह स्पष्ट करते हैं कि गर्भपात समाज में महिलाओं की समान भागीदारी के लिए महत्त्वपूर्ण रहा है। यह उनके स्वस्थ जीवन और आगे बढ़ने की क्षमता से प्रत्यक्ष रूप से संबंधित है। यह समझना बेहद जरूरी हो जाता है कि अगर महिलाओं और उनके परिवारों को अवांछित बच्चों को स्वीकारने और जन्म देने के लिए विवश किया जाएगा तो एक संकटपूर्ण जीवन और अंधेरे भविष्य के मार्ग प्रशस्त होंगे जो कि सामाजिक आर्थिक विकास की गति को बाधित करेंगे।

‘द पब्लिक कास्ट्स आफ बर्थ रिजल्टिंग फ्रॉम अनिंटेंडेड प्रिगेंसीज’ और ‘नेशनल एंड स्टेट लेवल एस्टमिनेट्स- 2011’ शीर्षक वाले अध्ययन दो महत्वपूर्ण तथ्यों को उजागर करते हैं। पहला तो यह कि अवांछित बच्चे नकारात्मक मनोवैज्ञानिक और शारीरिक स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त होते हैं और स्कूली शिक्षा को माध्यमिक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते छोड़ देते हैं। साथ ही ऐसे बच्चों में किशोरावस्था के दौरान अपराधी व्यवहार देखने को मिलता है। दूसरा तथ्य यह उजागर होता है कि अनपेक्षित गर्भावस्था सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के सामने सबसे महत्त्वपूर्ण चुनौतियों में से एक है और समाज पर वित्तीय और सामाजिक भार डालती है।

‘रिप्रोडक्टिव गवर्नेंस इन लेटिन अमेरिका- 2012’ शोध बताता है कि अनचाही गर्भावस्था पर अमेरिका में हर साल बारह अरब डालर से अधिक खर्च होते हैं। अगर अर्थव्यवस्था पर अनचाहे गर्भावस्था के नकारात्मक परिणामों की अवहेलना करने का प्रयास किया भी जाए, तो कैसे उन परिणामों की अनदेखी की जा सकती है जो अनचाही गर्भावस्था के फलस्वरुप मां और बच्चे के हिस्से आते हैं।

रॉनी कोहेन अपने शोध ‘डेनियल आफ अबार्शन लीड्स टू इकोनामिक हार्डशिप फार लो इनकम वुमन’ में इस तथ्य को उदघाटित करती हैं कि अवांछित गर्भावस्था को समाप्त करने के लिए एक नई मां और उसके बच्चे के गरीबी रेखा से नीचे रहने की संभावना दोगुनी हो जाती है। ऐसी महिलाओं में आत्महत्या और अवसाद की दर सामान्य महिलाओं की अपेक्षाकृत अधिक देखने को मिलती है, साथ ही ऐसी महिलाएं शारीरिक और मनोवैज्ञानिक हिंसा का अनुभव करती हैं।

तमाम अध्ययन और शोध यह स्पष्ट संकेत कर रहे हैं कि अनचाहे शिशु को जन्म देना जन्मदात्री, परिवार, समाज और देश किसी के भी हित में नहीं है और गर्भपात पर कानूनी रोक महिलाओं के जीवन में वे तमाम बाधाएं उत्पन्न करेगी, जिससे उनका सामाजिक-आर्थिक विकास पिछड़ जाएगा। परंतु क्या आधी दुनिया को पीछे धकेल कर कोई राष्ट्र स्वयं उन्नति कर पाएगा?

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